…पर हार जाना कोई उपाय नहीं होता

जनसंदेश टाइम्स एक आंदोलन की तरह शुरू हुआ था। आप सबके आंदोलन की तरह। एक अनहद शब्दयात्रा जैसा। आप ने इसे पसंद किया, अपना प्यार दिया। अनायास ही नहीं। हमने भी आप का ध्यान रखा। आप की रुचि का, आप की पसंद का, आप की जरूरतों का। कुछ थोपा नहीं। अगर कभी भटकाव के लम्हे आये भी तो अधिकारपूर्वक आप ने कंधे पर हाथ रखा, रास्ता दिखाया। इतना अपनापन अपनों को ही मिलता है, किसी अजनबी को नहीं।

जनसंदेश टाइम्स को आप ने हमेशा यह अपनापन दिया। हम साथ-साथ सफर में थे, एक ऐसे सफर में, जो केवल सफर ही रहना था। मंजिल की चिंता नहीं, निरंतर नयी चमक, नयी पहचान, नया अपनापा, ऐसे सफर की कोई मंजिल न ही हो तो अच्छा। सफर का आनंद मंजिल पाने में नहीं चलते रहने में होता है। हम चलते रहे। रास्ते भी हमेशा सुगम और साफ-सुथरे नहीं होते। और जब चलने वाला ही रास्ता बना रहा हो तब तो पता नहीं कब कोई ऐसा बीहड़ आ जाये, अवरोध आ जाये कि किधर बढ़ें, यह सूझे ही नहीं। जनसंदेश टाइम्स ने भी ऐसा वक्त देखा, ऐसी परिस्थितियाँ देखीं पर हार जाना कोई उपाय नहीं होता, हताश होना कोई अर्थ नहीं रखता। ठहरकर देखें, रुककर सोचें तो कोई न कोई दिशा मिल ही जाती है। सो जनसंदेश टाइम्स ने हमेशा अपने सफर का, अपने रास्तों का मूल्यांकन किया और वक्त-वक्त पर सही फैसले किये। एक मोड़ पर मेरा जनसंदेश टाइम्स से जाना और एक नये मोड़ पर फिर जनसंदेश टाइम्स के साथ आना कुछ इसी तरह के फैसले थे। मैं एक बार फिर इस आंदोलन के साथ जुड़ गया हूँ।

मैं कैसे भूल सकता कि आप ने कितना भरोसा मुझ पर जताया था, मेरी प्रामाणिकता पर कितना यकीन जाहिर किया था। मैंने आप में जिस भावुकता और नेहातिरेक का दर्शन किया, वह विलक्षण और हृदयस्पर्शी था। उससे मुझे अनवरत एक अनजानी ताकत का अनुभव होता था। कई बार धारा के खिलाफ तैरने का साहस भी मैंने उसी से हासिल किया था। मैंने कभी भी आप को ग्राहक की तरह नहीं देखा। पाठक समझा, अपना समझा। अपनों से कोई सौदा नहीं होता, अपनों के साथ कोई दुकानदारी नहीं चलती। आप ने मुझे देखा, परखा और खुद ही आवाज दी। आवाजों पर आवाजें। मैं आप के साथ था। जनसंदेश टाइम्स आप के साथ था। एक संपूर्ण अखबार की तरह। प्राडक्टवादी मानस को चुनौती देता हुआ। शब्द और वस्तु में फर्क होता है। वस्तु का मूल्य होता है, वस्तु की खरीद-बेंच भी होती है। वस्तु का मूल्य बेचने वाला तय करता है। शब्द का मूल्य बेचने वाला तय कर भी दे तो बेमतलब है, क्योंकि उसका असली मूल्य उसे पढ़ने वाला तय करता है। आप जो कुछ पढ़ते हैं, उसे पढ़ने के बाद तय कर सकते हैं कि वह कितना कीमती है, उसका क्या मोल है। यह निरर्थक है, यह सार्थक है, यह अनमोल है, यह हमारे पास होना चाहिए, यह नहीं होना चाहिए, ये सारे फैसले करने का अधिकार आप को ही है। सभी जानते हैं कि इस अधिकार का प्रयोग पाठक बहुत संजीदा और बेमुरव्वत होकर करता है। कोई लालच, कोई चालाकी, कोई दबाव काम नहीं करता।

मौजूदा समय थोड़ा कठिन है। राजनीति से लोगों की उम्मीदें कम हुई हैं। धोखा, छल, पाखंड बढ़ा है। आदमी आत्मकेंद्रित होता गया है। ज्यादातर लोग सिर्फ अपनी चिंता करते हैं, दूसरों के दुख से, पीड़ा से कोई मतलब नहीं। ऐसे लोगों की तादात बढ़ी है, जिनके पास कोई समाज-दृष्टि नहीं है, जीवन-दृष्टि नहीं है। रौशनी झपट लेने वालों से जगह-जगह दर्द के अंधेरे में पड़े लोग संघर्ष कर रहे हैं। बदलाव की आकांक्षा बलवती हुई है लेकिन बदलाव का कोई चक्रवात दूर-दूर तक नजर नहीं आता। ऐसी स्थिति में उन सभी लोगों की जिम्मेदारियाँ बढ़ गयी हैं, जो मनुष्यता के पैरोकार हैं। मैं भरोसे के साथ कह सकता हूँ कि जनसंदेश टाइम्स ने ऐसी जनपक्षधर ताकतों का हमेशा साथ दिया है, आगे भी देता रहेगा। एक दिन बदलाव की ताकतें कामयाब होंगी। सादर अभिवादन।

वरिष्ठ पत्रकार डा. सुभाष राय ने एक वर्ष बाद फिर दैनिक समाचारपत्र जनसंदेश टाइम्स के प्रधान संपादक के रूप में कार्यभार ग्रहण कर लिया। इस अवसर पर बुधवार को समाचारपत्र के सभी संस्करणों में प्रथम पृष्ठ पर प्रकाशित डा. राय का अग्रलेख।

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