पश्चिम में एक चलन है, आप सेलेब्रिटी हैं तो आपका एक सेक्स वीडियो होना मांगता, है तो उसको लीक होना मांगता

यश जी प्रणाम, कैसे हैं. भइ, जब भरी दुपहरी में किरकिट खेल रहे हैं तो ठीक ही होंगे. बढ़िया. बढ़िया. हमने सोचा चलो हमई खटखटा लें. सिद्ध तो व्यस्त हैं. तो सिद्ध महोदय निर्मल बाबा की आपने अच्छी ऐसी-तैसी करवा दी. बेचारा ठीक ठाक कमा खा रहा था, आपने सब चौपट कर दिया. वैसे ये आदमी बाबा बनने के लायक नहीं है. बहुत कमजोर निकला. अब पट्ठे को समझ में आएगा के बेटा महीन काटना चाहिए, इतना मोटा नहीं. वर्ना तो देखिये कितने बाबा हुए और हैं जो डटे हुए हैं और अपनी पूरी पारी खेल के ही विदा हुए और होंगे.

 मैंने पढ़ा के मनु भाई की कल्लोल गाथा पे आपको दया आई. आप करुणा के सागर हैं. वैसे दया आपको वीडियो देखने के बाद ही आई होगी. यकीनन. ऐसे ही वो वीडियो हर किसी को देखना मांगता ताकि हर कोई मनु भाई पे दया कर सके. पश्चिम में एक चलन है. आप सेलेब्रिटी हैं तो आपका एक सेक्स वीडियो होना मांगता. है तो उसको लीक होना मांगता. हम विकासशील देश हैं. विकसित होने के लिए ऐसा करना मांगता.आपका वीडियो नहीं है मतलब साफ़ है, आप सेलेब्रिटी नहीं हैं. अपन भी नहीं हैं. लेकिन जो हैं, उनका वीडियो लीक होना मांगता. मनु भाई का हुआ, बुरा नहीं. लोग देखें. जानें. कुकर्म कानून के साए में ही पलते हैं. हम इसे मुकीलीक्स कह सकते हैं. बदले की चाह ने मुकेश लाल को ड्राईवर से खोजी पत्रकार बना दिया. यही है असली ऐन्टरटेनमेंट पत्रकारिता…….
 
यश जी मज़ाक से इतर. एक बात मेरे ज़हन में है. ये जो अपनी राष्ट्रपति हैं. प्रतिभा ताई. इनका भी एक मसला आजकल मीडिया में छाया हुआ है. इस वृद्धा को सेवानिवृत्ति के बाद ऐशोआराम के लिए एक मकान चाहिए. कहानी तो सब जानते ही हैं के ये वृद्धा अपनी लिप्सापूर्ति के लिए क्या कर रही है. कुछ नया भी नहीं है. जो भी, किसी भी रूप में सक्षम है, वो यही कर रहा है. ऐसे लोगो की कुचेष्टाओं को आप महसूस कर सकते हैं. मैं कर सकता हूँ. अपन किराये के मकान में रहते हैं.
 
अगर हम The President's Pension Rules, 1962, का अध्ययन करें तो हम पाएंगे के राष्ट्रपति सेवानिवृत्ति के बाद अपने इच्छित स्थान पर रहने का अधिकारी है. परन्तु नियमों में कहीं भी ये नहीं लिखा, और ये बहुत महत्त्वपूर्ण बात है, के उसके लिए नए घर का निर्माण किया जायेगा. और हमने समाचारों में देखा के वृद्धा के लिए पुणे के खडकी में निर्माण कार्य चल रहा है. इस सन्दर्भ में कुछ बातें विचारणीय है.
 
उक्त नियम शायद इसलिए बनाये गए होंगे के चलो भाई गरीब देश है, शायद राष्ट्रपति ऐसा व्यक्ति हो जिसके पास अपना निजी आवास ना  हो. तो  चलो ऐसे व्यक्ति के  लिए प्रावधान कर दो. ऐसा करना शायद बुरा भी नहीं. पर इस वृद्धा के पास तो पहले से ही नव कांग्रेस हाऊसिंग सोसाइटी, अमरावती, में 417.3 sq.mt. का आवास है जो इसने 1985 में खरीदा था. यही नहीं अमरावती में ही 3.20 Hts का एक फार्महाउस भी है. और ये माल असबाव तो वो है जो सिर्फ इस माननीय वृद्धा के नाम है. इनके एक पति, एक पुत्री और एक पुत्र भी है. उनकी जागीरों का ब्यौरा नहीं मिल सका.
 
तो अब सवाल ये है के भाई जब पहले से ही तुम्हारे पास ज़मीनें हैं तो और क्यों? यदि तुम पहले स्वर्गवासी होगी तो तुम्हारे प्यारे पतिदेव को भी देश की जनता केंद्र सरकार के मार्फ़त पालेगी-पोसेगी. तो भाई दिक्कत क्या है. देश की ज़मीन तो बढ़ नहीं रही है. जितनी थी उतनी ही है. अब अगर हर व्यक्ति ऐसा करता चला जायेगा तो फिर देश का एक बड़ा हिस्सा तो ताउम्र सड़को पे ही कटेगा. तो हे! वृद्धे अगर तुझे सरकारी बंगले में ही रह रहना है तो पहले अपनी ज़मीनें सरकार को देदे. और चिंता मुक्त रहो पतिदेव को इस देश की जनता ही पालेगी. रही बात बच्चा लोग की तो उन्हें अपना घोंसला खुद बनाए दो. उनका चिंता हम लोगों की कीमत पे ना करो.
 
अधिनियम बना 1951 में, नियम बने 1962 में, तत्पश्चात संशोधन होते रहे. 'residence' शब्द को इन लोगों ने बहुत विस्तृत अर्थ दिया है. इसका अर्थ जो हम लोग लगाते हैं उससे भिन्न है. ‘residence’ includes the staff quarters and other buildings apartment thereto, and the gardens thereof, and ‘maintenance’ inrelation to a residence includes the payment of local rates taxes and to provision of electricity and water.
 
यश जी इन लोगों को सब फ्री है. मकान, कुर्सी-टेबल, ऑफिस,चपरासी, पानी, बिजली, डॉक्टर, पेट्रोल….और ना जाने क्या क्या अटरम-सटरम. वहां इंग्लैंड में तो एक ही महारानी और उसका कुनबा है. यहाँ तो ऐसी महारानियों-महाराजाओं और उनके कुनबों की एक फौज ही खड़ी हो गयी है. पैसा और रसूख होने का अर्थ ये कदापि नहीं हो सकता के आप सीमित संसाधनों को कब्जाना शुरू कर दें. संसाधन सीमित हैं. हम लोग बहुत अधिक हैं पहले ये तो फैसला कर लो के सबको या अधिकतर को थोड़ा-थोड़ा कैसे मिले. इस यूटोपिया के अभाव में लोकतंत्र एक मज़ाक एक अंधविश्वास बन चला है. सर पे पल्लू धरने से, झक सफ़ेद कपडे पहनने से कोई सुसंस्कृत नहीं होता. हम इन चिकने चुपड़े चेहरों के पीछे कितने हिंसक चित्त का निर्माण कर रहे हैं हमें इसका भान भी नहीं.
 
यश जी मैं क्या कहता हूँ, निर्मल बाबा तो ऐवें ही था. आइये इस वृद्धा को धिक्कारें. दुत्तकारें. देखें सोशल मीडिया के असर को. लिख मारिये एक लेख और शुरू हो एक सिलसिला जैसा बाबा के विरोध में हुआ था और जारी है. इसे मजबूर करें के ये नियमों की अवहेलना ना करे. और साकार भी ये जवाब दे के भाई इस देश में जो के बहुत जल्द ही चीन को पछाड़ देगा. जनसँख्या में. उस देश में किस आधार पे माननीयों को हजारों वर्ग गज के मकान देने के प्रवधान बना रखें हैं…..तो आइये मट्ठा डालना शुरू करें. आप कहेंगे अपन क्या कर रहे हैं. तो हे! सिद्ध अपन ने शुरुआत कर दी है. अपन हबीब जालिब को गुनगुना रहे हैं………'ऐसे दस्तूर को, सुबह बे-नूर को, मैं नहीं मानता मैं नहीं जानता..'
 
बाकी मौज है…….आजकल मुझ पे किसी की किरपा बरस रही है. मैं निकम्मा तो था अब पूरी तरह से हो चला हूँ……सब कुछ बहुत अच्छा लग रहा है. आप पे गुस्सा भी नहीं आ रहा, तभी तो इतना लिख गया….समझ गए तो ठीक वर्ना POGO चैनल देखिये….या फिर गाने सुनिए….

आपका

कुशल

बरेली

kpvipralabdha@gmail.com

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