पहले सेतिया, अब रावत : उत्तराखंड का दुर्भाग्य

सेवानिवृत्त नौकरशाह एस.एस. रावत ने छठे सूचना आयुक्त के तौर पर कल (17 जनवरी 2014 को) शपथ ली. एस.एस. रावत की सूचना आयुक्त के तौर पर नियुक्ति से कई सवाल खड़े होते हैं. एक तो यह कि जब सूचना आयोग में 6 आयुक्तों के लायक काम ही नहीं है तो यह नियुक्ति क्यूँ की गयी? जिस समय भाजपा राज में रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ मुख्यमंत्री थे तो राजनाथ सिंह की सिफारिश पर वे अजय सेतिया को सूचना आयुक्त बनाना चाहते थे. मुख्य सूचना आयुक्त के यह बताये जाने के बाद कि पांचवें आयुक्त की जरूरत नहीं है, सेतिया सूचना आयुक्त ना बनाए जा सके.

इसी बीच भाजपा में चल रही कुर्सी की धींगामुश्ती में भुवन चन्द्र खंडूड़ी एक बार फिर मुख्यमंत्री पद पा गए. राजनाथ सिंह के वचन जितने निशंक के लिए अनमोल थे, खंडूड़ी जी के लिए उससे अधिक बाध्यकारी तो हो सकता थे पर कम कतई नहीं. अजय सेतिया सूचना आयुक्त नहीं बनाये जा सके, सो खंडूड़ी जी ने अपनी 6 महीने की सत्ता में उन्हें बाल संरक्षण आयोग का अध्यक्ष बना दिया. सेतिया आज भी उस पद पर काबिज हैं. लगता है विजय बहुगुणा अपने फुफेरे भाई की राजनीतिक मजबूरियों को ढोते हुए अपने भ्रातृधर्म का निर्वाह कर रहे हैं. अन्यथा तो कांग्रेस की सरकार के दूसरे साल में प्रवेश करने की ओर अग्रसर होने के बावजूद उत्तराखंड से जिन सेतिया का कोई लेना-देना नहीं, उन्हें पद पर बनाये रखने का क्या औचित्य है?

बहरहाल सूचना आयुक्त प्रकरण पर वापस लौटते हैं. जिस सूचना आयोग में निशंक के जमाने में चार आयुक्त काफी थे, उसमें विजय बहुगुणा ने पांचवें सूचना आयुक्त के रूप में वरिष्ठ अधिवक्ता राजेन्द्र कोटियाल की नियुक्ति कर दी. 2000 के दशक के शुरुआती वर्षों में उत्तराखंड उच्च न्यायालय द्वारा देहरादून के अतिक्रमण हटाने के लिए नियुक्त हुए कोटियाल ने कोर्ट कमिश्नर के रूप में रसूख वालों के अतिक्रमण तुडवाने में काफी ख्याति अर्जित की थी. बताया जाता है कि कोटियाल काफी अरसे से सूचना आयुक्त बनाना चाहते थे, लेकिन मेहरबान उन पर विजय बहुगुणा ही हुए.

यह भी विडम्बना ही है कि सूचना आयोग में पांचवें आयुक्त के लिए काम नहीं होने की बात कहने वाले मुख्य सूचना आयुक्त एन.एस.नपलच्याल ने छठे आयुक्त के रूप में सेवानिवृत्त नौकरशाह एस.एस.रावत को शपथ दिलवाई. उलटबांसी तो यह भी है कि कार्मिक सचिव रहते हुए जिन एस.एस.रावत ने सूचना आयोग के अधिकारों पर कतरब्यौंत करने वाली नियमावली बनायी, नौकरी के बाद गाडी-घोड़ा, रौब-दाब कायम रखने के लिए विजय बहुगुणा ने उन्हें ही सूचना आयुक्त बना दिया. जो व्यक्ति सूचनाओं के खुलासे और पारदर्शिता चाहने वालों से डाह रखता था, सूचनाओं का सुगम प्रवाह और पारदर्शिता उसका पोस्ट-रिटायरमेंट कर्तव्य होगा. सौ चूहे खा कर बिल्ली हज गयी या नहीं, ये तो किसी ने नहीं देखा, लेकिन सरकारी सेवा के दौरान सूचना आयोग के परम विरोधी रहे रावत का सूचना आयोग की ‘सेवा’ में लगना,बिल्ली के हज जाने से कुछ कम तो नहीं है.

इस नियुक्ति से एक बार फिर यह बात सिद्ध हुई कि उत्तराखंड की सत्ता में पार्टियों और व्यक्तियों के चेहरे बदलने से, नौकरशाहों के प्रति उनकी संजीदगी नहीं बदलती. सरकार से बाहर होने पर नौकरशाहों के हावी होने का आरोप लगाने वाली कांग्रेस-भाजपा, सेवानिवृत्त होने वाले नौकरशाहों के लिए, रिटायरमेंट से पहले सरकारी ‘सेवा’ का बंदोबस्त करने में एक दूसरे से होड़ लेते नजर आती हैं. मुख्य सचिव रहे डा.आर.एस.टोलिया सेवानिवृत्त होते ही पहले मुख्य सूचना आयुक्त के पद से नवाजे गए. मुख्य सचिव के ही पद से सेवानिवृत्त होने वाले सुरजीत किशोर दास को उत्तराखंड लोकसेवा आयोग का अध्यक्ष बनाया गया था तो एक अन्य मुख्य सचिव इंदु कुमार पांडेय सेवानिवृत्ति के बाद राज्य वित्त आयोग के अध्यक्ष बनाए गए. वर्तमान में मुख्य सूचना आयुक्त के पद पर आसीन एन.एस.नपलच्याल भी सेवानिवृत्त नौकरशाह हैं और मुख्य सचिव पद से उनके रिटायर होते ही,उनकी दूसरी ‘सेवा’ का इंतजाम उत्तराखंड सरकार ने कर दिया था.

उच्च पदों पर नियुक्ति के मामले में भी जैसी तेजी नौकरशाहों के प्रकरण में देखने में आती है, वैसे अन्य पदों पर नहीं दिखाई देती है. एक समय देश के प्रतिष्ठित कृषि विश्वविद्यालयों में शुमार गोविन्दबल्लभ पन्त कृषि विश्वविद्यालय में डेढ़ वर्ष से अधिक समय से अधिक बीत जाने के बावजूद कुलपति नहीं है. लेकिन वहाँ कुलपति नियुक्त करने की फुरसत राज्य सरकार नहीं निकाल पा रही है. उच्च विशेषज्ञता वाले इस विश्वविद्यालय को भी राज्य सरकार नौकरशाहों से ही चलवा रही है. सुभाष कुमार मुख्य सचिव पद से हटाये गए तो उन्हें जी.बी.पन्त कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति का चार्ज दे दिया गया. फिर सरकार सुभाष कुमार पर मेहरबान हुई और उन्हें पुनः मुख्य सचिव बनाया गया तो उनकी जगह पद से हटाये गए आलोक कुमार जैन को यहाँ के कुलपति पद का चार्ज दे दिया गया. जैन के बारे में बताया जाता है कि बीते 6 महीने में वे एक-आध बार ही विश्वविद्यालय में नजर आये हैं. उत्तराखंड तकनीकी विश्वविद्यालय भी कई महीनों से कुलपति विहीन है. दून विश्वविद्यालय के कुलपति को यहाँ का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया है. नौकरशाहों के लिए रिटायरमेंट के तत्काल बाद पदों का इंतजाम करने वाली सरकार के पास विश्वविद्यालयों के कुलपति का इंतजाम करने की फुर्सत ही नहीं है.

एस.एस.रावत और उनके साथ सेवानिवृत्त हुए दो अन्य नौकरशाहों का मामला तो कुछ ज्यादा ही विशेष मालूम होता है. एस.एस.रावत, आर.सी.पाठक और सुवर्द्धन विगत वर्ष जून में सेवानिवृत्त हुए. उस समय उत्तराखंड भीषण आपदा की चपेट में था. आपदा के दौरान राहत, बचाव और पुनर्वास कार्यों को ठीक से अंजाम ना देने के लिए विजय बहुगुणा सरकार चौतरफा निंदा झेल रही थी. लेकिन इस बीच में रिटायर होने वाले इन तीन नौकरशाहों को राहत पहुंचा कर उनका पुनर्वास करने के लिए सरकार बेहद मुस्तैद थी. एस.एस.रावत, आर.सी.पाठक और सुवर्द्धन को सेवानिवृत्त होते ही, 6 महीने का सेवा विस्तार दे दिया गया. तत्पश्चात सुवर्द्धन राज्य के मुख्य चुनाव आयुक्त बना दिए गए और अब एस.एस.रावत सूचना आयुक्त के पद से नवाजे गए हैं.

इतनी ही संजीदा यदि राज्य सरकार आपदा पीड़ितों के पुनर्वास के प्रति होती तो शायद जनता के काफी बड़े हिस्से को राहत पहुँच सकती थी. लेकिन पुनर्वास की हालत यह कि 2013 की आपदा के मारे ही नहीं बल्कि जो गाँव नब्बे के दशक में आपदा की दृष्टि से संवेदनशील होने के चलते पुनर्वास के लिए चिन्हित किये गए थे, उनमें से कई अभी भी पुनर्वास की बाट जोह रहे हैं. नौकरशाहों का पुनर्वास नहीं भी होगा तो भी उनका जीवन चल जाएगा पर आपदा के मारों का पुनर्वास ना होना उनके जीवन को ही संकट में डाल देगा. पर जिन सरकारों के एजेंडे से जनता चुनाव के बाद बाहर है और नौकरशाह जिनके कंठहार, उन्हें यह कौन समझाएगा? उनके लिए तो नौकरशाहों का पुनर्वास ही सर्वाधिक प्राथमिकता का कार्य है. ऐसा लगता है कि ये संविधान, पद और गोपनीयता की शपथ नहीं लेते हैं,बल्कि नौकरशाहों को पदारूढ़ रखने और उनके पुनर्वास की शपथ ले कर ही सत्तासीन होते हैं.

देहरादून से इन्द्रेश मैखुरी की रिपोर्ट.

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