पिंजरे में बंद ‘तोते’ पर सवाल!

उच्चतम न्यायालय की एक बहुचर्चित टिप्पणी से देश की आला जांच एजेंसी, सीबीआई की दशा और दिशा को लेकर तेज बहस छिड़ गई है। अदालत की पहल से ही सरकार ने पिंजरे में बंद इस ‘तोते’ को आजाद करने की रूप-रेखा बनाने की कवायद तेज कर दी है। प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने इस जांच एजेंसी को स्वायत्ता देने के लिए कानूनी प्रक्रियाओं का नए ढंग से नियमन कराने के लिए एक मंत्रिसमूह (जीओएम) का गठन कर दिया है।

वित्त मंत्री पी. चिदंबरम के अध्यक्षता में गठित किए गए, इस जीओएम में नए कानून मंत्री कपिल सिब्बल, गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे, प्रधानमंत्री कार्यालय के राज्यमंत्री वी. नारायण सामी व विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद हैं। इस मंत्रिसमूह को जिम्मेदारी दी गई है कि वह सीबीआई की स्वायत्ता के लिए नए नियमन का मसौदा तैयार करे। शुरुआती दौर से ही कई मंत्रियों की ‘निष्ठा’ पर सवाल उठाए जाने लगे हैं। चर्चित आंदोलनकारी अरविंद केजरीवाल ने खुलकर आरोप लगाए हैं कि इस जीओएम के कई मंत्री खुद अनेकों मामलों में ‘कानून तोड़क’ भूमिका में रहे हैं। ऐसे में, भला कैसे ये लोग सीबीआई को सचमुच स्वतंत्र करने के लिए कारगर कानून बनाने का मसौदा तैयार कर पाएंगे? खासतौर पर जबकि सीबीआई दशकों से केंद्र की सरकार का एक बड़ा राजनीतिक हथियार रही है। सो, आसानी से कोई सरकार अपने इस कारगर हथियार की धार क्यों कुंद करना चाहेगी?

लेकिन, कोयला घोटाले की जांच के मामले में सीबीआई की भूमिका से बात काफी आगे तक चली गई है। उल्लेखनीय है कि चर्चित कोयला घोटाले की जांच उच्चतम न्यायालय की निगरानी में सीबीआई कर रही है। लेकिन, विपक्ष ने संसद से लेकर सड़क तक हुंकार भरी कि केंद्र सरकार के दबाव में सीबीआई जांच के नाम पर लीपा-पोती ही कर रही है। यहां तक कि कई बड़े गुनाहगारों को बचाने की कोशिश हो रही है। इन बातों का संज्ञान न्यायालय ने भी लिया था। उसने सीबीआई पर दबाव बढ़ाने के लिए जांच की स्टेटस रिपोर्ट मांग ली थी। यह खास हिदायत भी दी थी कि इस रिपोर्ट को एजेंसी, सरकार से साझा न करे। मार्च में जांच की प्रगृति रिपोर्ट सीबीआई ने अदालत में दाखिल भी कर दी थी। लेकिन, अगले महीने मीडिया में खबर आई कि न्यायालय की मनाही के बावजूद सीबीआई निदेशक ने स्टेटस रिपोर्ट, कानून मंत्री के साथ साझा की थी। इतना ही नहीं, इस रिपोर्ट में सरकार के अनुकूल कई बदलाव भी कराए गए थे।

सीबीआई ने पहले हलफनामे में कुछ जरूरी तथ्य छिपा लिए थे। जब इन पर बहस तेज हुई, तो अदालत ने फटकार लगाते हुए सीबीआई से दूसरा हलफनामा मांग लिया। इसमें सीबीआई ने विस्तार से सारे तथ्य बता दिए। फेर-बदल का पूरा ब्यौरा भी अदालत को दे दिया गया। इन तथ्यों को देखकर अदालत ने तीखी नाराजगी जताई। सवाल किया कि अदालत के निर्देश के बावजूद सरकार ने इस रिपोर्ट में हस्तक्षेप कैसे किया?

सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में अपने ऐतिहासिक फैसले के दौरान सीबीआई के बारे में तीखी टिप्पणियां भी कर डालीं। इस मामले की सुनवाई करने वाली पीठ ने यहां तक कह दिया कि सीबीआई की स्थिति पिंजरे में बंद उस तोते जैसी हो गई है, जो कि अपने मालिकों की ही बोली बोलता है। यह भी कहा गया कि इस जांच एजेंसी की जो स्थिति है, उससे इसकी निष्पक्षता पर कोई कैसे विश्वास कर सकता है? जरूरी है कि इस एजेंसी को स्वायत्त करने के लिए जल्द से जल्द पहल हो। अदालत ने सरकार से भी पूछा है कि क्या सीबीआई को स्वायत्त बनाने के लिए उसके पास कोई कानूनी कार्य योजना है? इस बारे में वह 10 जुलाई तक अदालत को हलफनामा पेश करे। अदालत ने यह भी साफ कर दिया था कि यदि सरकार के पास इस जांच एजेंसी को स्वायत्त करने की कोई कार्य योजना नहीं होगी, तो ऐसी स्थिति में अदालत को ही इस दिशा में कोई पहल करनी होगी।

जाहिर है कि देश की सबसे बड़ी अदालत की इस निर्णायक पहल के बाद सरकार के पास हीला-हवाली करने की गुंजाइश भी नहीं बची। न्यायालय में हुई इस किरकिरी के बाद सरकार के रणनीतिकारों ने अब अपना चेहरा बचाने की राजनीतिक कवायद तेज कर दी है। अदालत की नाराजगी और लोकलाज के दबाव में प्रधानमंत्री ने कानूनी मंत्री अश्विनी कुमार से इस्तीफा ले लिया है। रेल मंत्रालय के चर्चित रिश्वतकांड को लेकर रेलमंत्री पवन बंसल की भी विदाई कर दी गई है। इस कांड से सीबीआई के चेहरे का कुछ ‘मेकओवर’ करने की कोशिश हुई है। दरअसल, सरकार के पास लोकपाल का विधेयक लंबे समय से लंबित है। इसके तहत ही प्रस्ताव किया गया है कि सीबीआई निदेशक की नियुक्ति को कैसे और पारदर्शी बनाया जाए? कुछ ऐसे भी प्रस्ताव किए गए हैं, जिनसे कि एजेंसी की जांच प्रणाली में सरकारी हस्तक्षेप न हो पाए।

राज्यसभा की प्रवर समिति ने लोकपाल विधेयक के मसौदे पर अपनी रिपोर्ट भी दे दी है। इसमें सिफारिश की गई है कि सीबीआई निदेशक का कार्यकाल दो साल का हो। निदेशक की नियुक्ति प्रधानमंत्री, नेता विपक्ष, चीफ जस्टिस व सतर्कता आयुक्त का पैनल करे। एजेंसी का अभियोजन विंग अलग कर दिया जाए। राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरुण जेटली कहते हैं कि यदि सरकार की नीयत ठीक रहती, तो लोकपाल का प्रस्तावित विधेयक पास हो जाता। जाहिर है कि इस कानून के बन जाने से सीबीआई की स्वायत्ता का रास्ता अपने आप साफ हो जाता। अब अदालत की फटकार के बाद सरकार ने जो कवायद तेज की है, यह प्रक्रिया कितनी ईमानदारी से संपन्न की जाएगी? इसके बारे में सबके मन में कुछ न कुछ संदेह हैं।

सीबीआई के राजनीतिक दुरुपयोग के तमाम आरोप लगते रहे हैं। यूपीए सरकार की इस दूसरी पारी में इस तरह के आरोप कुछ ज्यादा ही चस्पां हुए हैं। मुख्य विपक्षी दल, भाजपा का नेतृत्व तो यह लगातार कहता आया है कि कांग्रेस नेतृत्व का सबसे विश्वसनीय राजनीतिक ‘हथियार’ सीबीआई ही बन गई है। क्योंकि, कई बड़े राजनीतिक क्षत्रपों को सीबीआई का डर दिखाकर कांग्रेस नेतृत्व वाली सरकार समर्थन लेती आई है। इस संदर्भ में खास तौर पर सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव और बसपा प्रमुख मायावती के नाम का जिक्र होता आया है। सपा प्रमुख मुलायम सिंह तो पिछले दिनों कह भी चुके हैं कि कांग्रेस के हजारों हाथ हैं। इनके पास सीबीआई है। ये अपने किसी भी राजनीतिक विरोधी को इसके जरिए फंसा देते हैं। जरूरत पड़ने पर जेल भी भिजवा देते हैं। ऐसे में, कांग्रेस से पंगा लेना किसी के लिए आसान नहीं रहा। राजनीतिक हल्कों में मुलायम की इस टिप्पणी से एक नई बहस शुरू हुई थी। इसको लेकर कांग्रेस नेतृत्व बचाव की मुद्रा में भी आया था। इस संदर्भ में मायावती ने भी कहा था कि सीबीआई का दुरुपयोग उनके खिलाफ भी हो चुका है। लेकिन, इस तरह का काम भाजपा नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के दौर में भी हुआ था। वे तो इसकी खुद भुग्तभोगी रही हैं।
    
यूपीए के एक बड़े सहयोगी दल डीएमके ने श्रीलंका के तमिल मुद्दे पर सरकार से समर्थन वापस ले लिया था। इस समर्थन वापसी के अगले दिन ही डीएमके प्रमुख एम. करुणानिधि के बेटे एम. के स्टालिन के घर एक मामले में सीबीआई ने छापे डाल दिए थे। इस मौके पर सीबीआई के दुरुपयोग को लेकर केंद्र सरकार की खासी किरकिरी हुई थी। सीबीआई निदेशक रंजीत सिन्हा उम्मीद जाहिर कर रहे हैं कि शायद जल्द ही उनकी एजेंसी स्वायत्ता की आजादी पा लेगी। फिलहाल, उन्हें ‘तोते’ के कटाक्ष से भी कोई बड़ा ऐतराज नहीं है। कहते हैं कि बड़े बदलाव के लिए वे ऐसे तमाम कटाक्ष सहने और झेलने को तैयार हैं। कम से कम नई स्थिति में सीबीआई की जांच पर राजनीतिक ‘बमबारी’ तो बंद हो जाएगी!

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क virendrasengarnoida@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।

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