पिजड़े का शेर है ‘राष्ट्रीय अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति आयोग’

बाबा साहब डा0 भीम राव अम्बेदकर भारतीय संविधान के प्रधान शिल्पकार है। उन्हें सामाजिक न्याय के प्रतीक और फादर आफ सोशल रिवोल्यूशनस के नाम से भी जाना जाता है। वे एक विश्वविख्यात कानूनदा के साथ-साथ पक्के लोकतंत्रवादी भी थे । उनका लोकतंत्र केवल राजनीतिक लोकतंत्र तक सीमित नहीं था बल्कि वे सामाजिक आर्थिक लोकतंत्र को भी साथ-साथ चलाने के हिमायती थे । तभी लोकतंत्र टिकाउ रह सकता है उन्होंने सामाजिक-शैक्षणिक रुप से वंचित तबके के लिए राज्य की ओर से सकारात्मक भेदभाव के सिद्वान्त को प्रतिपादित किया ।

इसके लिए वंचित तबकों को सामाजिक न्याय दिलवाने, लोकतांत्रिक संस्थाओें को स्वतंत्र निष्पक्ष और मजबूत करने के लिए संविधान में विविध अनुच्छेदों का आविष्कार एवं प्रावधान किया । अनुच्छेद 338 के तहत अनुसूचित जातियों/जनजातियों के लिए विशेष अधिकारी(एक सदस्यीय आयोग) की नियुक्ति का प्रावधान करना उनमें से एक था, जो राजनीतिक दबावों से परे होकर एकाग्रचित स्वतंत्र और निष्पक्षतापूर्वक इन वर्गों के सर्वांगीण विकास, अत्याचार निवारण आदि के कार्यो की देखरेख कर सके । आज बाबासाहब के इन परिकल्पनाओें की क्या स्थिति है, उनके जयन्ती पर इसकी विवेचना करना प्रासंगिक होगा ।

भारतीय संविधान के मूल अनुच्छेद 338 के तहत अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लिए एक विशेष अधिकारी की नियुक्ति का प्रावधान किया गया जो उनकी सामाजिक एवं आर्थिक विकास, सरकारी सेवा का संरक्षण एवं अत्याचार निवारण के कार्यो की देख-रेख और जाँच पड़ताल करता था और राष्ट्रपति को अपनी वार्षिक रिपोर्ट अथवा बीच में भी कोई रिपोर्ट प्रस्तुत करता था उसपर संसद के दोनों सदनों में विचार विमर्श होता था और राज्य के मामलों को राज्य के विधान मंडलों के पटल पर रखा जाता था और चर्चायें होती थी । वह विशेष अधिकारी एक सदस्यीय आयोग था, जिसे अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति के आयुक्त के नाम से पदनामित किया गया था । इसका कार्यकाल पाँच वर्ष का होता था और इस पर सामान्यतः तत्कालीन सेवानिवृत कल्याण सचिव, भारत सरकार अथवा सार्वजनिक क्षेत्र के किसी बड़ी हस्ती को आयुक्त (एक सदस्यीय आयोग का अध्यक्ष) बनाया जाता था । इनकी नियुक्ति प्रत्येक पाच वर्ष पर 1951 से लगातार 1992 तक होती रही ।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद-148, 324 और 338 के तहत तीन स्वतंत्र शक्तिशाली आयोग/संस्था का गठन किया गया । इसके अतिरिक्त और भी संस्थाओं/आयोग का गठन किया गया। (1) 148 अनुच्छेद के तहत नियंत्रक-महालेखा परीक्षक जो केन्द्र और राज्यों के वित्तीय मामलों की जाच करता है । (2) अनुच्छेद 324 के तहत निर्वाचन आयोग के मुख्य निर्वाचन आयुक्त जो संसद, राज्य के विधान मंडलों के सदस्य, राष्ट्पति, उपराष्ट्पति के चुनाव का अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण करता है। (3) अनुच्छेद 338 के तहत अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लिए विशेष अधिकारी जो इन वर्गो के लिए उपबंधित रक्षोपायों से संबंधित सभी विषयों का अन्वेषण एवं निगरानी करता है। इन तीनों संस्थाओें के प्रमुख यथा 148 के तहत नियंत्रक-महालेखा परीक्षक, भारत, अनुच्छेद 324 के तहत निर्वाचन आयोग के अध्यक्ष मुख्य निर्वाचन आयुक्त और 338 अनुच्छेद के तहत अनुसूचित जाति एवं जनजाति के एक सदस्यीय आयोग के अध्यक्ष (आयुक्त) को पाच वर्ष के अंतराल पर राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किया जाता था । संविधान में तीनों संस्थाओें को राजनीतिक दबावों से मुक्त किया है। दो संस्थाओें यथा- नियंत्रक-महालेखा परीक्षक तथा मुख्य निर्वाचन आयुक्त ने अपने पदों का इस्तेमाल देश और समाज के बेहतरी के लिये किया । एक समय तो ऐसा आया जब मुख्य निर्वाचन आयुक्त श्री टी0 एन0 शेषण अपने कारनामों के चलते लोकप्रियता एवं न्यायप्रियता में प्रधान मंत्री से उपर हो गये ।जिसकी स्वीकारोक्ति स्वयं प्रधानमंत्री श्री नरसिंह राव ने समाचार पत्रों को दिये गये साक्षात्कार में की थी ।

सन् 1951 से अनुसूचित जाति/जनजाति एक सदस्यीय आयोग(आयुक्त) ने अच्छा काम किया था । लेकिन जैसे ही उसने और अच्छा काम करना शुरु किया केन्द्र सरकार ने उसे पंगु बनाते हुए कार्यकारी आदेश के तहत सन् 1978 में बिना संविधान संशोधन किये राष्ट्रीय अनुसूचित जाति एवं जनजाति बहुसदस्यीय आयोग का गठन किया । इसके प्रथम अध्यक्ष श्री भोला पासवान शास्त्री बनाये गये, जिन्हें संवैधानिक अधिकार प्राप्त नहीं था । यह केन्द्र सरकार के कार्यकारी आदेश के तहत किया गया था । इस तरह एक कार्य के लिए दो आयोग भिन्न नामों से कार्य करता रहा:- आयोग एवं आयुक्त ।इससे भ्रान्तियाँ फैलती रही ।आयोग की गरिमा/इकबाल में गिरावट आई । इसपर स्वयं तत्कालिन आयुक्त श्री शिशिर कुमार (एक सदस्यीय आयोग के अध्यक्ष कार्यकाल 1976-81 जो अगले आदेश तक एक वर्ष और कार्य किये ) ने इंडियन एक्सप्रेस समाचार पत्र के दिनांक-09.09.82 को दिये साक्षात्कार ”आल टाक एण्ड नो वर्क फार एसी.सी. एस.टी.’’ में विस्तारपूर्वक दिया था।

सन् 1990 में 65वें संविधान संशोधन द्वारा राष्ट्रीय अनुसूचित जाति एवं जनजाति आयोग को संवैधानिक दर्जा प्राप्त हुआ जो 12.03.1992 से  प्रभावी किया गया और एक सदस्यीय आयोग के अध्यक्ष(आयुक्त) का पद विलोपित हो गया । अनुसूचित जाति एवं जनजाति आयोग को वर्ष 1992 में संवैधानिक दर्जा प्राप्त हुआ । इसे बहुसदस्यीय बनाया गया तथा इसके अध्यक्ष को केन्द्रीय कैबिनेट मंत्री का दर्जा दिया गया । एक सदस्यीय आयोग(आयुक्त) का पद किसी जाति विशेष के लिए आरक्षित नहीं था । पर बहुसदस्यीय आयोग में अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का पद इसी समुदाय के लिए आरक्षित किया गया ।केवल एक सदस्य गैर-आरक्षित कोटे के लिए रखा गया, जिसका कार्यकाल पाच वर्षो का था ।इसके बाद इस आयोग में केवल राजनीतिक नियुक्तियाँ होने लगी और अपने दल के हारे हुए नेताओें, कठपुतली नेताओें और नौकरशाहों को समायोजित करने की प्रवृति बढ़ी । इस कारण इस आयोग की स्वतंत्रता विश्वसनीयता एवं कार्य शैली पर गम्भीर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा । 1992 में इस आयोग के अध्यक्ष श्री रामधन बनाये गये     उनका तत्कालीन प्रधान मंत्री श्री नरसिंह राव और कल्याण मंत्री श्री सीताराम केशरी से आयोग की कार्य प्रणाली तय करने में गम्भीर मतभेद हुआ । लम्बे पत्राचार हुए, जिस कारण आयोग का कार्यकाल 3 वर्ष करके उन्हें हटाया गया । तबसे बहुसदस्यीय आयोग का कार्यकाल तीन वर्ष हीं है। पुनः 89वाँ संविधान संशोधन अधिनियम-2003 द्वारा अनुसूचित जातियों के लिये अलग तथा अनुसूचित जनजातियो के लिये अलग आयोग बनाया गया जो 20.02.2004 से प्रभावी हुआ । दोनों के अधिकार और कर्तव्य एक ही जैसे हैं जो संविधान के अनुच्छेद 338 और 338 बी0 के रुप में उल्लेखित हैं।

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 338 इस प्रकार है-(राष्ट्ीय अनुसूचित जाति आयोग)- अनुसूचित जातियों के लिये एक आयोग होगा, जो राष्ट्ीय अनुसूचित जाति आयोग के नाम से ज्ञात होगा ।

2. संसद द्वारा इस निमित्त बनायी किसी विधि के उपबन्धों के अधीन रहते हुए आयोग एक अध्यक्ष,एक उपाध्यक्ष और तीन अन्य सदस्यों से मिलकर बनेगा और इस प्रकार नियुक्त किये गये अध्यक्ष,उपाध्यक्ष और सदस्यों की सेवा की शर्ते और पदावधि ऐसी होगी, जो राष्ट्रपति नियम द्वारा अवधारित करें ।)

3.राष्ट्रपति अपने हस्ताक्षर और मुद्रा सहित अधिपत्र द्वारा आयोग के अध्यक्ष,उपाध्यक्ष और अन्य सदस्यों की नियुक्त करेगा ।

4. आयोग को अपनी प्रक्रिया स्वयं विनियमित करने की शक्ति होगी ।

5.आयोग का यह कर्तव्य होगा कि वहः-

(क) अनुसूचित जातियो के लिए इस संविधान या तत्समय प्रवृत किसी अन्य विधि या सरकार के किसी आदेश के अधीन उपबंधित रक्षोपायों से संबंधित सभी विषयों का अन्वेषण करे और उन पर निगरानी रखे तथा ऐसे रक्षोपायोें के कार्यकरण का मूल्यांकन करें ।

(ख) अनुसूचित जातियो को उनके अधिकारों और रक्षोपायों से वंचित करने की बाबत विनिर्दिष्ट शिकायतों की जाच करें ।

(ग) अनुसूचित जातियो के सामाजिक-आर्थिक विकास की योजना प्रक्रिया में भाग लें और उन पर सलाह दें तथा संध और किसी राज्य के अधीन उनके विकास की प्रगति का मूल्यांकन करें ।

(ध) उन रक्षोपायों के कार्यकरण के बारे में प्रतिवर्ष और ऐसे अन्य समयों पर, जो आयोग ठीक समझे, राष्ट्पति को प्रतिवेदन दें ।

(ड़) ऐसे प्रतिवेदनों में उन उपायों के बारे में जो उन रक्षोपायों के प्रभावपूर्ण कार्यान्वयन के लिए संध या किसी राज्य द्वारा किए जाने चाहिए, तथा अनुसूचित जातियो के संरक्षण, कल्याण और सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए अन्य उपायों के बारे में सिफारिश करें ।

 

(च) अनुसूचित जातियो के संरक्षण, कल्याण, विकास तथा उन्नयन के संबंध में ऐसे अन्य कृत्यों का निर्वहन करे जो राष्ट्पति, संसद द्वारा बनाई गई किसी विधि के उपबंधों के अधीन रहते हुए, नियम द्वारा विनिर्दिष्ट करें ।

(6) राष्ट्पति ऐसे सभी प्रतिवेदनों को संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष रखवाएगा और उसके साथ संध से संबंधित सिफारिशों पर की गई या किए जाने के लिए प्रस्थापित कार्रवाई तथा यदि कोई ऐसी सिफारिश अस्वीकृत की गई है तो अस्वीकृति के कारणों को स्पष्ट करने वाला ज्ञापन भी होगा ।

(7) जहाँ कोई ऐसा प्रतिवेदन या उसका कोई भाग किसी ऐसे विषय से संबंधित है जिसका किसी राज्य सरकार से संबंध है तो ऐसे प्रतिवेदन की एक प्रति उस राज्य के राज्यपाल को भेजी जाएगी जो उसे राज्य के विघान मंडल के समझ रखवाएगा और उसके साथ राज्य से संबंधित सिफारिशों पर की गई या किए जाने के लिए  प्रस्थापित कार्रवाई यथा यदि कोई ऐसी सिफारिश अस्वीकृत की गई है तो अस्वीकृति के कारणों को स्पष्ट करने वाला ज्ञापन भी होगा ।

(8 आयोग को खंड(5) के उपखंड (क) में निर्दिष्ट किसी विषय का अन्वेषण करते समय या उपखंड(ख) में निर्दिष्ट किसी परिवाद के बारे में जाँच करते समय, विशिष्टतया निम्नलिखित विषयों के संबंध में,वे सभी शक्तियाँ होगी जो वाद का विचारण करते समय सिविल न्यायालय को है, अर्थातः-

(क) भारत के किसी भी भाग से किसी व्यक्ति को समन करना और हाजिर कराना तथा शपथ पर उसकी परीक्षा करना ।

(ख) किसी दस्तावेज को प्रकट और पेश करने की अपेक्षा करना

(ग) शपथ-पत्रों पर साक्ष्य ग्रहण करना

(ध) किसी न्यायालय या कार्यालय से किसी लोक अभिलेख या उसकी प्रति की अपेक्षा करना

(ड़) साक्षियों और दस्तावेजों की परीक्षा के लिए कमीशन निकालना

(च) कोई अन्य विषय जो राष्ट्पति,नियम द्वारा,अवधारित करें

(9) संध और प्रत्येक राज्य सरकार अनुसूचित जातियो को प्रभावित करने वाले सभी महत्वपूर्ण नीतिगत विषयों पर आयोग से परामर्श करेगी।

(10) इस अनुच्छेद में, अनुसूचित जातियो के प्रति निर्देश का यह अर्थ लगाया जाएगा कि इसके अंतर्गत ऐसे अन्य पिछड़े वर्गो के प्रति निर्देश,जिनको राष्ट्पति अनुच्छेद 340 के खंड(1) के अधीन नियुक्त आयोग के प्रतिवेदन की प्राप्ति पर आदेश द्वारा विनिर्दिष्ट करें, और अंग्ल-भारतीय समुदाय के प्रति निर्देश भी है।ष्       कार्यकारी आदेश द्वारा आयोग का कार्यकाल 2 वर्ष कम करके और राजनीतिक नियुक्ति द्वारा आयोग की शक्ति को क्षीण कर दिया गया । इसकी स्वतंत्रता और निष्पक्षता प्रभावित हुई । इसमें आने वाले सदस्य आधे-अधूरे मन से आयोग का कार्य करते हैं। वे सत्तारुढ दल की गोटी लाल करते रहते हैं और उसका पारिश्रमिक पाते रहते हैं जबकि  नियंत्रक-महालेखा परीक्षक तथा निर्वाचन आयोग का कार्यकाल पूर्ववत पाच वर्ष बना रहा । नियंत्रक-महालेखा परीक्षक और निर्वाचन आयोग में राजनीतिक नियुक्ति और उसके सदस्यों को राजनीति करने से रोक के कारण आयोग ने अपनी निष्पक्षता, विश्वसनीयता और धार को न केवल बरकरार रखा बल्कि उसे उत्तरोत्तर आगे बढा़ती रही जबकि अनुसूचित जाति आयोग की विश्वसनीयता तथा धार उत्तरोतर कम होती गई और अब बिना धार जैसी है । उसकी स्वतंत्रता और स्वायत्ता समाप्त हो गई । यह एक विचारणीय विन्दु है। ऐसा क्यों हुआ, कैसे हुआ, और इस पर राजनीतिक दलों की इतनी चुप्पी क्यों है?

मजे की बात यह है कि कानून द्वारा राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की स्थापना की गई जिसके अध्यक्ष सेवानिवृत मुख्य न्यायाधीश, सर्वोच्च न्यायालय होते हैं ।  इनका कार्यकाल भी 5 वर्ष निर्धारित किया गया । दोनों के धाक और स्तर का एक दृष्टान्त देना प्रासंगिक होगा कि अक्टूबर 2003 में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष श्री रंगनाथ मिश्र जब पटना दौरे पर आये तो उनकी आगवानी करने के लिए मुख्य सचिव, बिहार स्वयं गये । दूसरी तरफ राष्ट्रीय अनुसूचित जाति/जनजाति आयोग के अध्यक्ष श्री विजय सोनकर शास्त्री उनके दो सप्ताह बाद पटना आये, जिन्हें केन्द्रीय कैबिनेट मंत्री का दर्जा भी प्राप्त था, की आगवानी (स्वागत) बिहार प्रशासनिक सेवा के एक कनिष्टतम पदाधिकारी डिप्टी कलक्टर द्वारा किया गया । आयोग के अध्यक्ष द्वारा बैठक आहूत करने की बात हुई। मुख्य सचिव बैठक में नहीं आये । जबकि मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष को अधिकारियों ने बड़ी गम्भीरता पूर्वक हाथों-हाथ लिया । इस संबंध में जब मैंने स्वयं राष्ट्रीय अनुसूचित जाति एवं जनजाति आयोग के अध्यक्ष श्री सोनकर से चर्चा की आप के साथ ऐसा क्यों होता है, तो वे चुप्पी साध गये । उनके एक सहयोगी ने मुझसे कहा आप अनुभवी है, कुछ आप ही बतायें ।मैंने उन्हें जब दो टूक लहजे में कहा कि आपके अध्यक्ष राजनीतिक व्यक्ति हैं, भारतीय जनता पार्टी के सदस्य हैं, और उसके राजनीतिक सम्मेलनों-बैठकों में जाते है, इसलिए उनमें इतना दम नहीं है कि वे किसी पर अधिकार रहते हुए भी कलम चला सकें । उन्हें राजनीतिक पद प्रतिष्ठा ज्यादा प्यारी है, जबकि मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष दोषियों के विरुद्व कलम चला सकते हैं । अपने आदेश का अनुपालन करवा सकते हैं । मानवाधिकार आयोग ने अपने शासन की ऐसी प्रतिष्ठा, यश और धाक पैदा किया है। यदि अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष कलम चला भी दे तो उसका अनुपालन विभिन्न दबावों के चलते नहीं करवा सकते हैं । आप के शासन का भय और प्रतिष्ठा दोनों समाप्त हो गया है। ऐसी स्थिति में आप को कौन सुनेगा ? कोैन इज्जत देगा ? आप की स्थिति दलित सांसद/विधायक जैसी है जो प्रतिनिधित्व तो दलितों का करता है पर वह उनके लिए लड़ नहीं सकता, केवल बयानबाजी कर सकता है। प्रत्येक आरक्षित चुनाव क्षेत्र में गैर दलितों की संख्या और प्रभाव चुनाव के लिए निर्णायक होता है। अतः उसे हमेशा सवर्ण के पक्ष में जाना पड़ता है, अन्यथा अगले चुनाव में वह जीत नहीं सकता है। उन्होंने हॅसते हुए हमारी बातों पर सहमति व्यक्त की कि यही कटु सत्य है ।

वास्तव में राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष एवं अन्य पदों पर सतारुढ़ दल वैसे व्यक्ति को बैठाता है जो उनके इशारे पर चले । ऐसी स्थिति में ये बेचारे सिवाय समय बिताने और अपना भविष्य सॅवारने के और क्या कर सकते हैं? वे आयोग में रहकर अपने निर्वाचन क्षेत्र की सेवा करते हैं, अपना निर्वाचन क्षेत्र बनाते हैं, और समय-समय पर अपने राजनीतिक पार्टी के अनुशासित सिपाही जैसा आचरण और बयान देते हैं। स्थिति यहाँ तक बदतर हो गयी है कि राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयेाग के उपाध्यक्ष श्री राजकुमार ने कांग्रेस के टिकट पर पंजाब विधान सभा  2012 का चुनाव लड़ा । उसे हटाने और अयोग्य करार देने की माग किसी ने नहीं की । न कोई अदालत में याचिका दायर की । आयेाग के वत्र्तमान अध्यक्ष श्री पी0एल0पुनिया ने भी अपने दल कांग्रेस के लिए न केवल चुनाव प्रचार किया बल्कि कागे्रस के प्रतिनिधि के रुप में उत्तर प्रदेश में मायावती सरकार के उखाड़ने में लगे रहे और आयोग की ऐसी बदनामी की कि उत्तरप्रदेश की सरकार ने आयोग के अध्यक्ष के रुप में उन्हें कोई तवज्जों नहीं दी, वे केवल कागजी बयानबाजी करते रहे ।

केन्द्र सरकार की देखा-देखी विरोधी दल की कुछ राज्य सरकारों ने सस्ती लोकप्रियता बटोरने के लिए अपने हारे हुए राजनेताओें,चहेतों को समायोजित करने के ख्याल से कार्यकारी आदेश के तहत राज्य अनुसूचित जाति जनजाति आयोग का गठन किया जिसके अध्यक्ष एवं सदस्यों को सुख सुविधा मिली वाह-वाही बटोरी गई । सरकारी खजाने पर बोझ बढ़ा पर जनता को राहत नहीं मिली ! राज्य सरकारों को प्रादेशिक स्तर पर आयोग बनाने की आवश्यकता हीं नहीं है क्योंकि संविधान के प्रावाधानों के तहत राष्ट्रीय आयोग ही प्रदेश के मामलों को देखता है जैसा कि नियंत्रक महालेखा-परीक्षक और निर्वाचन आयोग केन्द्र और राज्य के मामले को भी देखता है। राज्य आयोग में कुछ ऐसे ऐसे व्यक्तियों को बैठाया जाता है जिन्हें अपने अधिकार और कत्र्तव्य का भी ज्ञान नहीं होता है और वे सिर्फ अपने आवास, सरकारी सुविधा आदि के लिए दौड़ते-दौड़ते आधा से ज्यादा समय गुजार देते हैं, बाकी आधा समय लम्बी चैड़ी बाते करने तथा अपना निर्वाचन क्षेत्र सुधारने में तीन साल का कार्यकाल व्यतीत हो जाता है।

आयोग के कार्यकलापों में सरकारी गैर-सरकारी सेवाओें की सुरक्षा सामाजिक आर्थिक विकास और अत्याचार निवारण सम्बन्धी मामलों की जाच करना और पीड़ित को राहत दिलाने का है।

सरकारी सेवाओें एवं अत्याचार से सम्बन्धित लाखों मामले राष्ट्रीय आयोग के समक्ष लाये जाते रहें हैं । लोग इस उम्मीद से आयेाग के पास आते हैं कि उन्हें तुरंत राहत मिल जायेगी । पर वहाँ जाने पर महीनों बाद सम्बन्धित विभाग को एक पत्र भेजा जाता है जिसमें 30 दिनों के अन्दर जवाब मांगा जाता है। पर अधिकतर विभाग जवाब देने से कतराते है। कार्यवाही नहीं होने पर प्रार्थी द्वारा आयोग में पुनः शिकायत करने पर स्मार दिया जाता है । विभाग को चेतावनी दी जाती है फिर भी विभाग इसकी चिन्ता नहीं करते । ऐसे मामलों में सम्मन भेजा जाता है। आयोग को इतनी ताकत है कि सम्मन भेजने पर यदि विभाग का पदाधिकारी या सम्बन्धित व्यक्ति नहीं आता है तो उसे गिरफ्तार करके लाया जा सकता है, कार्रवाई की जा सकती है। आयोग को सिविल कोर्ट के अधिकार दिये गये हैं। लेकिन आयोग के आदेश की अवहेलना करने वाले व्यक्तियों/अधिकारियों को शायद ही कभी गिरफ्तार किया गया हो,दंडित किया गया हो । इस प्रकार आयोग लोगों की शिकायतों के निराकरण में कारगर साबित नहीं हो रहा है।

सामाजिक-आर्थिक विकास की योजनाओें, अत्याचार निवारण आदि के मामलों की भी यही स्थिति है। वस्तुतः आयोग में एक-दो प्रतिशत से ज्यादा मामलों में कार्रवाई हीं नहीं हो पाती। इसकी जिम्मेवारी आयोग के सदस्यगण, उसके अधिकारियों एवं कर्मियों पर है। किसी मामले में सम्बन्धित विभाग के जो लोग प्रतिनिधित्व करने आते हैं वे आयोग के सदस्य और अधिकारियों की आँखों में धूल झोकने में सक्षम रहते है। उनके जवाबों को आयोग कमोवेश ज्यों का त्यों स्वीकार कर लेता है। क्योंकि आयोग के अधिकांश सदस्य और अधिकारी को कानून और सरकारी सेवाओें की बारिकियों का ज्ञान नहीं रहता है । वे प्रार्थी के पक्ष को सही तरीके से नहीं रख पाते हैं। यदि किसी मामले में प्रार्थी का पक्ष ठीक से रख दिया गया और फैसला भी पक्ष में आ जाता है तो इस बात की गारंटी नहीं की वह लागू भी हो जायेगा । आयोग ऐसे लोगों के लिए मुसीबत का पहाड़ बन सकता है पर इच्छाशक्ति के अभाव में वह कार्य भी नहीं हो पाता है।

आज आयोग की स्थिति पिजंडे़ में बंद शेर वाली है। पिजडे़ को खोलना होगा । यह खोलेगा कौन ? संविधान के अनुच्छेद 338 में आयोग की स्थिति पिजडे़ में बंद शेर की नहीं है। यह आयोग अर्द्ध-न्यायिक प्रकृति का है। इसे वाद के विचारण में सिविल कोर्ट के अधिकार दिये गये हैं। इसे पिजडे़ में कैद किसने किया ? जाहिर है कि केन्द्र की सरकार ने -मंत्रिमंडल की सलाह पर । उसने संविधान विरुद्ध आयोग को कार्य करने पर मजबूर किया, पिजडे़ में बंद करने वाला नियमावली बनाया । आयोग का कार्यकाल पाँच वर्ष से घटाकर तीन वर्ष करना, आयोग में अपने दल के चहेतों को नियुक्त करना और सदस्यों को राजनीति करने की छूट का नियम बनाना । ऐसा होने से आयोग की स्वतंत्रता, स्वायत्ता, निष्पक्षता, विश्वसनीयता और न्याय दिलवाने की मूल अवधारणा पर ही कुठाराधात हुआ । ऐसा राजनीतिक आयोग कैसे निष्पक्ष और भयमुक्त होकर कार्य कर सकता है। कैसे कमजोर वर्गो को न्याय दिलवा सकता है ? क्या सरकार सी0ए0जी0 और निर्वाचन आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों को भी राजनीति करने और चुनाव लड़ने की छूट देने का नियमावली बनाने की हिम्मत कर सकती है ? और विरोधी दल इस पर चुप रह सकते हैं।

आज राष्ट्रीय अनुसूचित जाति जनजाति आयोग दलितों के लिए किसी भी दृष्टि से मददगार साबित नहीं हो रहा है।आयोग में अधिकारियों एवं कर्मियों को प्रतिनियुक्त/नियुक्त करने का भी कोई माप-दंड नहीं है। कुछ को छोड़कर अधिकतर इन स्थानों पर लोग दंडस्वरुप ही भेजे जाते हैं। आयोग में कर्मियों की बराबर कमी रहती है। राज्य मुख्यालय स्तर पर निदेशक स्तर के अधिकारी रहते है जिन्हें सम्मन और वारंट जारी करने का अधिकार नहीं है। यह अधिकार अध्यक्ष और सदस्यों को है। एक निदेशक के जिम्मे तीन चार प्रदेशों का प्रभार है। अनुसंधान अधिकारी ही वस्तुतः निदेशक का कार्य कर रहे हैं। आयोग को धन और स्टाफ देने का अधिकार सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय का है । लेकिन उसे पूरा करने की कोई चिन्ता नहीं रहती है। शुरू में आयोग का नोडल मंत्रालय गृह मंत्रालय हुआ करता था लेकिन बाद में उसे कल्याण मंत्रालय (अब समाजिक न्याय एवं अधिकारिता) के जिम्मे कर दिया गया। आयोग विशेष रिपोर्ट तैयार करता है और उसे सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के माध्यम से राष्ट्रपति को सौंपता है। यह रिपोर्ट संसद और राज्यों के विधान मंडलों में पेश भी की जाती है पर बिना बहस और उचित कार्रवाई के एक-दो घंटों में इसका निपटारा कर दिया जाता है। दूसरे की कौन कहे इस पर दलित विधायक/सांसद भी विशेष परिचर्चा और वाद विवाद नहीं करते हैं। सरकार को कटघरे में खड़ा नहीं करते हैं। आयोग के किस सदस्य ने कितने मामलों का निपटारा किया उसका भी आकंड़ा उपलब्ध नहीं कराया जाता । सभी का सामूहिक कार्य दर्शाया जाता हैं । सुना तो यह भी जाता है कि आयेाग के कुछ सदस्य तो शायद ही किसी शिकायत का निपटारा करते है। वे सिर्फ राजनीतिक कद और अपना सरोकार बढ़ाने के लिए यहाँ वहाँ का दौरा करते रहे हैं ।

भारत सरकार जिसने आयोग रुपी शेर को पिजड़े में बंद किया है क्या उसे यूं ही खुला छोड़ देगी । पिजड़े को खुलवाने के लिए सशक्त आंदोलन और जनजागरण की आवश्यकता होगी । जनहित याचिकाए दायर करनी होंगी । क्या कारण है कि नियंत्रक-लेखा परीक्षक(सी0ए0जी0), मुख्य निर्वाचन आयुक्त और मानवाधिकार आयोग के कार्यो और कालावधि में कोई कटौती नहीं की गई है? वे पाच वर्षो तक स्वतंत्र रुप से अपने कार्यो का निर्वहन करते हैं और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करने में जंगल के शेर हैं जबकि राष्ट्रीय अनुसूचित जाति /जनजाति आयोग के मामले में सरकार ने प्रतिकूल नियम बनाया ताकि ये पिजडे़ के शेर बने रहे । सभी दल इस आयोग को पिजडे़ में बंद ही देखना चाहते हैं अन्यथा नियंत्रक-महालेखा परीक्षक (सी0ए0जी0) की रिपोर्ट पर बात-बात में हंगामा करने वाले और निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता और निष्पक्षता तथा कड़े चुनाव सुधार की आवाज बुलंद करने वाले, आंदोलन प्रदर्शन करने वाले दलित हित की लंबी-चैड़ी बात करने वाले दल भी दलित सरोकार के इतने महत्वपूर्ण मामले में चुप्पी नहीं साधे रहते । यदि वे आवाज बुलंद करते तो सरकार राष्ट्रीय अनुसूचित जाति/जनजाति आयोग के साथ ऐसी मनमानी और संविधान विरोधी कार्य नहीं करती ।

इस पर दलितों के सामाजिक-राजनीतिक संगठनों की चुप्पी भी आश्चर्य का विषय है। वे न तो इस पर आवाज उठाते हैं और न हीं जनहित याचिका के माध्यम से न्यायालय का ध्यान आकृष्ट कराते हैं । आज इन मुद्दों पर सशक्त आवाज उठाने और जनहित याचिका दायर करने का होना चाहिए तभी आयोग प्रभावशाली और क्रियाशील बन सकता है। इसलिए राष्ट्रीय अनुसूचित जाति/जनजाति आयोग की निष्पक्षता, स्वायत्ता, विश्वसनीयता एवं शीघ्र और निष्पक्ष न्याय दिलवाने की अवधारणा को बहाल करवाने की आवश्यकता है, ताकि यह भयमुक्त होकर कार्य कर सके प्रभावी बन सके ।

इसके लिए यह जरुरी है कि (1)राष्ट्रीय अनुसूचित जाति/जनजाति आयोग के सदस्यों को राजनीति में भाग लेने पर पूर्णतः प्रतिबंध लगाया जाय (2) आयोग में सेवा-निवृत सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश, वरिष्ठ नौकरशाह, ऐसे राजनेता जो आयोग से सेवा-निवृत होने के बाद कोई राजनीतिक पद न लें, प्रख्यात सामाजिक कार्यकत्र्ता आदि को आयोग का सदस्य बनाया जाय ।(3) आयोग का कार्यकाल पुनः पाच वर्ष बहाल किया जाय ।(4)आयोग के सदस्यों का चयन भी सतर्कता आयुक्त के पद की तरह नेता विरोधी दल की सदस्यतावाली कमिटी के माध्यम से किया जाय ।(5) जिस रीति और जिन आधारों पर उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जाता है उसी तरह इन्हें भी हटाने का प्रावधान हो ।(6) आयोग का अपना स्वतंत्र स्टाफ हो तथा इसका बजट भी अलग से बने ताकि वित्तीय मामले में यह पराधीन नहीं हो । इससे न केवल हमारे संविधान निर्माताओें की इच्छा की पूर्ति होगी वरन आयोग स्वतंत्र रुप से अपनी सारी शक्ति समाज के वंचित वर्ग के उत्थान में लगाने में सक्षम होगी ।देखें आने वाले कल में हमारा समाज पिजडे़ में बंद पड़े इस शेर को कब और कैसे छुड़वाता है। हम बाबासाहब के जयन्ती के शुभ अवसर पर उनके शेर (राष्ट्रीय अनुसूचित जाति/जनजाति आयोग) को पिजड़े से मुक्त करवा सकें तो वही उनके प्रति सच्ची श्रद्वाजंलि होगी ।

लेखक राजेन्द्र प्रसाद से संपर्क 09472575206 के जरिए किया जा सकता है.

Comments on “पिजड़े का शेर है ‘राष्ट्रीय अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति आयोग’

  • Kumar Aman says:

    18 जनवरी 2018 को पकरी बरावाँ के धमौल थाना मे किया गया था F.I.R फिर 31 मार्च 2018 को नवादा S.P के द्वारा FIR की घटना को सत्य करार करते हुये धमौल थाना को आदेश दिया गया की उत्क्रमीत मद्य्य विद्यालय बेल्खुन्डा प्रखंड पकरी बरावाँ के प्रधानाध्यापक श्री विजय कुमार को FIR 17/18 के आलोक मे गिरफ्तार करेँ और फरार रहने पर कुर्की जप्ती करे और प्रधानाध्यापक विजय कुमार द्वरा किया गया बेल फाइल को नवादा जज ने 20/4/2018 को बेल को रेजेक्ट कर दिया लेकिन अब तक उत्क्रमीत मध्य विद्यालय बेल्खुन्डा के प्रधाणाध्यपक विजय कुमार को अभी तक गिरफ्तार नही कर रही है धमौल के थाना प्रभारी, please help me

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  • Veerendra kumar says:

    बदलू ।सहतावन ।सुक्खा।जियान।पिसरान।फकीरे ।खेम्मन (जाती जाति धानुक उर्फ कठेरिया निवासी ग्राम की पुस्तयनी भूमि धरि जमीन लखनऊ टू आगरा एक्सप्रेस वे में गई है लेकिन कानूनगो लेखपाल और गांव के कुछ भू माफियाओं ने मिलकर इस गरीब परिवार की जमीन का मुआवजा हड़प लिया है हम विनर्म विनती करते हैं कि इस गरीब परिवार को उसका हक दिलवाने की कृपया करें महान दया होगी ?????

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