पीड़ा और सरोकार का पाखंड रचते लोग (सुभाष राय की कलम से)

भारत पोंगापंथियों और पाखंडियों का देश है। सभी उसी कतार में खड़े हैं। नकल करते हुए, झूठ बोलते हुए, दिखावे की दुनिया रचते हुए। ज्यादातर दोहरे आचरण केशिकार हैं। बड़े दिखना चाहते हैं लेकिन अपना छोटापन, छिछोरापन छोडऩा नहीं चाहते। सब के  सब अवसर की तलाश में हैं पर अवसरवादी कहलाना पसंद नहीं करते। जहाँ कहीं गुंजाइश दिखती है, लाभ की गंध मिलती है, फायदा दिखता है, चुपचाप, बहुत सावधानी से, चालाकी के साथ अपनी जगह बना लेना चाहते हैं लेकिन कोशिश करते हैं कि कोई उनकी चालाकी समझ न पाये। चाहे वाम हों, दक्षिण हों या दिशा-दृष्टि से मुक्त, अनुकूलता हासिल करने के लिए दिशा बदलने में तनिक संकोच नहीं करते। पल भर का दक्षिणावर्त अगर मदद कर सके तो जाता क्या है, कौन देखता है, किसे इतनी फुरसत है कि इस तरह गौर करे। चलेगा। एक क्षण वाम होने में अगर काम बनता है तो क्या, जीवन भर दक्षिणक्रम साधे रहे, कौन संदेह करेगा, कौन ध्यान देगा। जिनकी कोई दिशा नहीं है, जो शुद्ध कलाकार हैं, उनके लिए तो हर दरवाजा खुला हुआ है। वे योगी का प्रसाद भी ले सकते हैं, भोगी के ऐश्वर्य में भी हिस्सा बँटा सकते हैं और अपनी असंगता एवं निर्लिप्ति का खुलेआम डंका भी बजा सकते हैं।

जिनकी समझ बहुत साफ है, जो साहित्य और कला के बड़े सूत्रधार और पारखी लोग हैं, वे जानते हैं कि सिद्धांत, नैतिकता, आदर्श बोधकथाओं की बातें हैं, जीवन में उनका कोई मतलब नहीं। जीवन भिक्षाटन के लिए तो नहीं मिला, गुफा में बैठकर धूनी रमाने के लिए तो नहीं मिला, कंदरानुगमन के लिए तो नहीं मिला। अजाने पथिक की तरह चलते चले जाने का क्या अर्थ है। आदर्श और नैतिकता की बर्फानी धवल भूमि पर ध्वज की तरह गड़ जाने से क्या मिलेगा। कौन देखेगा, कौन पूछेगा, कौन मनायेगा शिखर यात्रा का उत्सव। ऐसा बनो कि चारों तरफ प्रशंसा मिले, ऐसा बनो कि लोग मिलने के लिए लालायित हों, ऐसा बनो कि तुम्हारा दरबार लगे, तुम्हारी हर जगह मांग हो। सबसे ज्यादा पाखंडी हैं बुद्धिजीवी, लेखक, आलोचक, कवि और पत्रकार। वे जीवन की, वर्तमान की और भविष्य की अनुकूलता के अवसरों की अपने अनुसार व्याख्या करते रहते हैं। आप मौका दें तो वे अपनी खास भेष-भूषा, अपनी दाढ़ी, अपनी दारू की जरूरत की भी सटीक व्याख्या कर सकते हैं। एक कलाकार है, लेखक है, सारी दुनिया की चिंता करता है, सारे समाज के बारे में सोचता है, सबकी पीड़ा पर निगाह रखता है, अगर उसे दारू पीनी पड़े तो इतनी रियायत तो उसे देनी पड़ेगी। वह पीता है तो बहुत छिप-छिपाकर नहीं, क्योंकि वह जानता है कि उसका यही खुलापन उसे प्रशंसा दिलायेगा। पर केवल इतने भर से किसी को यह समझने की भूल नहीं करनी चाहिए कि वह समाज का नेतृत्व करने वाला लेखक सचमुच बहुत खुला और पारदर्शी आदमी है। सबसे ज्यादा अस्वीकार, सबसे ज्यादा जिद और सबसे ज्यादा खेमेबाजी अगर कहीं मिलेगी तो इसी समाज में। बड़े-बड़े धुरंधर समझे जाने वाले आलोचकों पर भी न्याय का भरोसा नहीं किया जा सकता। कब, किसकी प्रशंसा कर दें, कब किसका काम तमाम कर दें, उनके मूड पर और लेखक से उनके रिश्ते पर निर्भर करता है। एक बड़े नामवर आलोचक को मैंने स्वयं एक सामान्य और अपरिचित कहानीकार की एक पुस्तक का विमोचन करते हुए उन्हें महान कथाकार और उनकी एक कहानी को स्त्रियों की दुनिया पर लिखी गयी अब तक की सर्वश्रेष्ठ कहानियों में से एक घोषित करते सुना था। वे रातोंरात अपने शहर की कथा हिरोइन बन गयीं। बाद में वे दुर्भाग्य से अपरिचय की कथा बन कर रह गयीं।

सबसे अधिक खेमेबाजी और बनावटीपन भी इन्हीं तथाकथित बुद्धिजीवियों की दुनिया में दिखायी पड़ती हैं। सबके अपने चेले हैं, सबकी अपनी अभंग भंगिमा। चेले गुरु का गुणगान करते हैं, गुरु चेलों को महान बनाने के उपक्रम में जुटे रहते हैं। गुरुओं की कठिनाई यह है कि वे किसी और को अपने समकक्ष नहीं रख सकते, नहीं मान सकते। इसलिए बेहतर तरीका यह है कि कोई अच्छा काम भी कर रहा हो लेकिन वह चेलहाई स्वीकार करने के लिए तैयार न हो तो उसे खारिज कर दो, उसकी उपेक्षा कर दो। होगा वह तोपची, पर किसी को भी तोपची बनाने वाले साहित्य के निर्मल बाबाओं के लिए उसका कोई मतलब नहीं। जब तक उनकी कृपा नहीं पहुंचती, कोई कवि या कहानीकार नहीं बनता। कृपा यूं ही थोड़े मिलती है। गुरुवल के मंच केनीचे तो आना पड़ेगा, उनकी मेधा का ध्वजदंड तो संभालना पड़ेगा। कर सकते हों तो बहुत अच्छा, नहीं कर सकते हों तो भाड़ में जायें। जो चाहें, करें। चाहें तो अपना खेमा बना लें या फिर अकेले अपने जनरंग की कव्वाली का मजा लेते रहें, अपने जनवाद की टोपी पर नयी-नयी रचनाओं का टीनोपाल लगाते रहें, उसे चमकाते रहें।

पद, प्रतिष्ठा, पुरस्कार और पैसा जैसे मूरख मानुस की कमजोरी है, वैसे ही इन बुद्धिमान, मेधावी प्राणियों को भी बेचैन किये रहते हैं। आखिर इसमें गलत क्या है। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, चार पुरुषार्थ कहे गये हैं। जो पुरुषार्थी है, वही महान है। लेखक अपने धर्म का पालन तो करते ही हैं, लिखते रहते हैं, कथा, कविता, उपन्यास। पर केवल धर्म भी अपनी किसी सार्थक परिणति तक कैसे पहुंचेगा, अगर अर्थ न हो। पत्रिका छपवानी है, आयोजन कराना है, पुस्तक छपवानी है। इन सबकेलिए अर्थ चाहिए। अर्थ केलिए व्यर्थ के संबंध बनाने पड़ते हैं क्योंकि अर्थ बड़ी मायावी चीज है। मूल्यहीनता का मूल्य है धन। जो किसी उसूल का पालन नहीं करते, उनके पास धन अपने आप चला आता है और कंचन कला के ऐसे  विशारदों से रचनात्मक काम के लिए धन निकालना बड़ा कठिन काम है। लेकिन अर्थ चाहिए तो लेखक को यह सब संपूर्ण अलिप्तता केसाथ करना पड़ता है।

काम से कौन बचा। जब हजार-हजार साल आंखें मूंद कर बैठने वाले मेनका के घुंघरुओं की झनझनाहट से अचेतन समाधि से बाहर की दुनिया में लौट आये तो एक रचनाकार की क्या औकात। उसकी तो दुनिया ही काम की दुनिया है। यशकाम उसकी सबसे बड़ी कमजोरी है। वर्तमान तो जाने ही, भïिवष्य भी अपने सीने पर संभाल कर रखे। पुरस्कार उसकी एक और बड़ी कामना है। लोग सम्मान करें, संस्थाएं, सरकारें पुरस्कृत करें। वह समाज की विसंगतियों, उसकी पीड़ा से उपजी आकुलता को व्यक्त करने केलिए नहीं, बल्कि उस पीड़ा को अपने यश, पुरस्कार और सम्मान में बदलने की लालसा से ज्यादा संचालित होता है। यही उनका सरोकार है। काम असाधारण वृत्ति है, उससे कोई छूट नहीं सकता। लेखक आखिर किस खेत की मूली। कामनाओं की पूर्ति ही मोक्ष है। जो पूर्णकाम है, वह मुक्त है और जो मुक्त है, वह महान है। इस अर्थ में लेखक, कवि, कलाकार, साहित्यकार, आलोचक, सभी समाज के बीच अपने दायित्वों का निर्वहन करते महापुरुष हैं। उन सबके सच को प्रणाम, उनके झूठ को प्रणाम, उनके छद्म को प्रणाम और उनकी सर्वसंवेद्य कलम को प्रणाम।

लेखक सुभाष राय वरिष्ठ पत्रकार हैं. अमर उजाला समेत कई अखबारों में वरिष्ठ पदों पर रह चुके हैं. इन दिनों लखनऊ में एक हिंदी दैनिक के प्रधान संपादक के रूप में कार्यरत हैं.

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