”पुण्य प्रसून वाजपेयी को ऐसे ब्रांड से नहीं जुड़ना चाहिए जो उनसे कमतर हो”

Yashwant Singh : क्या पुण्य प्रसून बाजपेयी जैसे पत्रकार को विनोद शर्मा जैसे कांग्रेसी नेता और दीपक चौरसिया जैसे बाजारू पत्रकार के नेतृत्व में काम करना चाहिए? यह सवाल मेरे मन में काफी देर से चल रहा है. अगर हां तो क्यों, अगर ना तो क्यों… दोनों पक्षों के अपने अपने तर्क हैं. आप क्या सोचते हैं?

    Dharmendra Gupta : yadi bajpaye aisa karte h to apni hi saakh daanv pe lagayenge…..    Sudhir-jindal case me b aisa hi kuchh hua tha….
     
    Yashwant Singh : Dharmendra Gupta, thanks apni raay dene ke liye. ye link bhi esi sandarbh mei hai… http://www.bhadas4media.com/edhar-udhar/7894-2013-01-13-16-18-55.html
    
    Robin Singh : गोलमाल है भाई सब गोलमाल है..
     
    Harishankar Shahi : भैया यह सवाल तब भी रखना चाहिए था जब पुण्य प्रसून जी के जी न्यूज़ छोड़ने को लोग नैतिकता से जोड़ रहे थे. क्या उस एक शो में लोकतंत्र का हमला बताने को डिलीट किया जा सकता है.
     
    Ankit Muttrija : मैं तो यही सोचता हूं कि हमें फिल्हाल देख लेना चाहिए के पुण्य प्रसून जी इसी कुम्बे में रहकर कैसा काम कर पाते हैं.अगर एकदम साफ़ संस्थान या कर्मचारियों और बढ़े पद पर विराजमान मठाधीशों के कारण नौकरी छोड़नी बन आयी तब तो यहां काफ़ी दिक्कते हैं.महत्वपूर्ण हैं कि आप यहां रहकर भी उस बात को झुठला दें जो कहती हैं-काज़ल की कोठरी में आप घुसेंगे तो कालें तो होंगे ही.फिर, वहां रहकर भी नौकरी की परवाह किए बिन जहां आप की भूमिका बनती हो वहां आवाज उठाएं. |
     
    Yashwant Singh : Robin Singh भाई, हां या ना में स्टैंड लें. गोलमाल वाला जवाब भी गोलमाल टाइप लग रहा है
     
    Hirendra ScriptWriter : करना चाहिए ज्वाइन..अपने आधे घंटे या एक घंटे के प्रोग्राम को वो निष्पक्ष रखने की काबिलियत रखते हैं..और फिलहाल तो कोई और विकल्प भी तो नहीं दिख रहा..
     
    Vibhanshu Yadav : जब देश की सर्वोच्च परीक्षा पास करने के बाद भी एक IAS 10वी तक पढ़े नेताओं के इशारों पर नाच सकता है तो मेरी तरफ से तो हां है…
     
    Vibhanshu Yadav : गुलाब को आप कितना भी छुपा लीजिये, अपनी खुशबू से वो अपना पता बता ही देता है।
     
    Harishankar Shahi : अभी सबसे आखिरी कार्यक्रम में कितनी निष्पक्षता रखी गई थी..वह तो लेख ही बता देंगे….. इस देश में कम पढ़े लिखों को रहने बोलने का अधिकार नहीं है. और केवल विशिष्टता के लिए एक परीक्षा पर निर्भर होना पड़े..तो ऐसे देश में यशवंत भैया कम से कम हम तो नहीं ही रहना चाहेंगे.
     
    Yashwant Singh : Vibhanshu Yadav यह तो छायावादी व्याख्या हो गई… अगर आपकी बात को विस्तार दूं तो ये कि गुलाब कहीं गलत जड़ और खराब खाद पानी से सड़ न जाए…. यह भी तो ध्यान देना पड़ेगा…
     
    Robin Singh : यशवंत सर.. बड़े लोग हैं "ये" इनके बारे में हम जैसे छोटे लोगों को पब्लिक प्लेस पर गोलमाल ही बोलना चाहिये
     
      बी.पी. गौतम : यह ऐसा सवाल है, जिसका जवाब कोई और नहीं दे सकता, देना भी नहीं चाहिए, क्योंकि सिद्धांतों को त्यागने वाला एक मौत मरता है, भले ही बाद में सहज हो जाए … प्रसून जी भी ज्वाइन करने से पहले इसी अवस्था से गुजरेंगे … उसूलों से चूल्हा भी तो नहीं जलता
     
    Yashwant Singh : Robin Singh ha ha ha.. bahut khub… lekin bhayi, sabse bade aap aur ham hain, jis din aap ye maan lenge, us din bade se bade loag dharti pe nazar aayenge..
     
    Vikas Tripathi : bilkul karna chahiye.. patrakar kisi ke neeche kam nahi karta wo sirf patrakarita karta he.
     
    ईश्वर चन्द्र उपाध्याय : यशवंत जी मेरा अपना मानना है की, "बिलकुल नहीं"। हालाँकि आज देश में एक भी ऐसा मीडिया प्रतिष्ठान नहीं है जो "धंधेबाजी का शौक" न रखता हो । ऐसे में मै प्रसून जी के दृष्टिकोण और काबिलियत पर लेश मात्र भी शक किये बिना यही विचार रखता हु की उन्होंने "अंधों में कनवा राजा" वाली थ्योरी के हिसाब से ही ये कदम उठाया होगा अथवा उठाने की सोच रहे होंगे । वैसे उन्हें आपना खुद का न्यूज़ चैनल शुरू करने का प्रयास शुरू कर देना चाहिए । प्रसून जी के लिए मेरे द्वारा व्यक्त की गयी इस राय को "छोटा मुह बड़ी बात" ही समझे।
     
    Robin Singh : सर.. वैसे तो हम हम है बाकि सब पानी काम है.. मगर हरिशंकर भईया जो कह रहे हैं यो ही सही है .. आगे जोड़ने का मन तो है मगर जाने दीजिये..
     
    Vibhanshu Yadav : Yashwant Singh सर गुलाब देखने और सूंघने में बहुत गमकौआ होता है लेकिन साथ में कांटे भी होते हैं, अगर किसी ने गलत खाद या जड़ के साथ छेड़छाड़ की तो कटवा धस जाएगा ना
     
    Yashwant Singh : ईश्वर भाई, स्पष्ट राय रखने के लिए धन्यवाद. बीपी गौतम जी, विकास त्रिपाठी, हरिशंकर शाही, राबिन सिंह, विभांशु, हीरेंद्र, अंकित, धर्मेंद्र को भी दिल से धन्यवाद.
     
    Vibhanshu Yadav : और वाजपेयी जी अब प्लांट नहीं होने जा रहे वो तो गुलाब का वटवृक्ष बन गए हैं, उनकी जड़ों को हिलाने में भूडोल आ जायेगा
     
    Yashwant Singh : Vibhanshu Yadav खुशबू लेने वालों या तोड़ने वालों को गुलाब अपना कंटवा धंसाता है, जड़ सुखाने या उखाड़ने वाले तक कांटा नहीं पहुंच पाता … बड़े बड़े वटवृक्षों को उखड़ते उजड़ते सूखते फिर गमले में उगते देखा है…       
   
    Alok Nandan : पुण्य प्रसूण कहीं भी रहेंगे पत्रकारिता के लिए गंजाइश निकाल ही लेंगे…कहीं न कहीं काम तो करना ही होगा….तो कहीं सही….वैसे डेमोक्रेसी में जाब पकड़ना और छोड़ना पूरी तरह से निजी मसला है….
     
    Yashwant Singh : Alok Nandan सरोकार रखना और न रखना भी निजी मसला हो गया है… कोई क्या कर लेगा… और, पत्रकारिता करना न करना भी निजी मसला है.. इससे आगे, मीडिया को धंधा कहना और धंधा को मीडिया कहना भी निजी मसला है… जाके रही भावना जैसी…

    Alok Nandan : जब तक आपको कोई पागल कुत्ता नहीं काटेगा तब तक आप सरोकारी नहीं हो सकते हैं…इसलिए सरोकारी होना निजी मसला नहीं है….
 
    Yashwant Singh : Alok Nandan ha ha ha… bahut khub.. par aapse sahmat nahi. sarokaari hona ya na hona fitrat hai, mazburi nahi.. kayi loag esko enjoy karte hain, kayi loag esko bhogne ke roop mei lete hain..
 
    Vibhanshu Yadav : लेकिन जो लोग पागल कुत्ते के काटने से सरोकारी बनेंगे वो लोग जरुर भोगेंगे। आज तक जितने भी सरोकारी हुए अगर वो पागल कुत्ते से काटने के बाद हुए तो सदियों पहले जब रेबीज का इंजेक्शन नहीं था उस टाइम लोग सर्वाइव कैसे कर लेते थे
    
    Robin Singh : यशवंत सर.. आपो सर जी बालवा के खाल निकाल लेयिंला… अब देखें न बात कहाँ से सुरु भइल रहल अ कुकुरो एही में लपटाई गइल
     
    Dharmendra Gupta : yashwant bhai, jab 7 jan ko maine bajpaye se poochha ki, kahin join kiya to unka msg aaya ki, "jee abhi kisi channel me nahi hu"….. Mujhe to lagta h punya ki halat b mahabharat ke yudhisthar jaisi ho gayi h…. Kyunki unhone us din sudhir ki achanak hui giraftari aur sarkar ka jindal ke liye soft corner, dono hi cheejo ki taraf ungali uthai thi lekin janta janardan punya ki us chaal ko samajh nahi paayi thi jisme wo sudhir ki hadbadi me giraftari ke kandhe pe bandook se sarkar pe nishana laga rahe the…. Mein to samajh gaya punya ki muskan dekhkar ki kahin pe nazar aur kahin pe nishana h, lekin zyadatar log lage punya ko gariyane… Mujhe lagta h, punya ne ek galti kee ki peeche background pe AAPATKAAL likhwa ke, mujhe ye patanahi ki wo unhone likhwaya ya chandra ne? Yashwant bhai aapko to khabar hogi hi!
    
    Vibhanshu Yadav : अरे आप बाल के खाल निकाले क बात करत बानी इहां त लोग बाल से तेल निकाल देहलन पगला कुक्कुर से कटवा के
     
    Ashish Kumar 'Anshu' : सर जब सभी बाजार में ही खड़े हैं फिर पुन्य से उम्मीद क्यों करते हैं कबीर बनने की?
     
    Yashwant Singh : Ashish Kumar 'Anshu' सही कहा.. पर जिनसे उम्मीदें है, उनसे नाउम्मीद होने में वक्त तो लगता है…
     
    Vibhanshu Yadav : जे बात Anshu Jee
     
    Alok Nandan : अब देखिये सरोकारी कई तरह के होते हैं…मार्क्सवादी सरोकारी, भगवा सरोकारी, डेमोक्रेटिक सरोकारी, महिलावादी सरोकारी, इंसानी सरोकारी….तो ये डिपेंड करता है कुत्ते की वैरायटी पर कि आप को किस तरह का इंफेक्टेट कुत्ते ने काटा है….और इन सब से से जो बच गया वो हो मौकापरस्त, जो हर सरोकार के साथ है और किसी सरोकार के साथ नहीं है…
     
    Pankaj Jha : मुझे इसमें कुछ आश्चर्यजनक जैसा नहीं लगता. ज़ाहिर है नौकरी करनी है तो करनी है. 'जैसी बही बयार पीठ तब तैसी कीजे' जैसे हालात से दो-चार होना पड़ता है सभी पेशेवरों को. घर भी चलाना है और जिस विलासितापूर्ण जीवन के आदी हो गए हैं उसे भी कायम रखना ही है. तब सर्वाइवल को भारी पड़ना ही है सरोकार पर. वैसे भी पुण्य हमेशा मुझे बायस्ड लगे हैं, कोई सरोकारी बात निजी तौर पर तो उनमें मैंने नहीं देखा है. करने दीजिए नौकरी सर. ज्यादा भावुक मत होइए.
     
    Mayank Negi : sach kahu to meri "kaabiliyat nahi hai abhi"ki mai in naami giraami patrkaaro per abhi koi comment karu………thoda samay mauje chahiye……….yaswant ji………….becoz ths time am just 12th pass………thoda abhi anubhav kam hai…….plz wait……….
     
    Ashish Kumar 'Anshu' : सहमत….वैसे अभी ना उम्मीद होने की जरूरत नहीं . सिर्फ वेट एंड वाच …
     
    Vibhanshu Yadav : Alok Nandan सर जी किसी के ऊपर से ट्रेन गुजर जाए और उसका बाल भी बाका ना हो तो उसे चमत्कार कहते हैं, मौकापरस्त नहीं। बिना पागल कुत्ते के काटे भी बहुत लोग सरोकारी बनते हैं, उनको भी मौका परस्त कहेंगे आप
     
    Vibhanshu Yadav : Mayank Negi भाई काबिलियत उम्र और क्लास देखकर नहीं आती, आपको जो कहना है कहिये
     
    Yashwant Singh : Mayank Negi ham aam jan hain, hame kahne ka hi to haq hai..
     
    Alok Nandan : विभांशु जी..इंसान पर भी सापेक्षता का सिद्थांत लागू होता है….भला कोई निरपेक्ष कैसे रह सकता है….जबकि बचपन से ही आपको बिना कुत्ता काटे ही कई तरह के इंजेक्शन दिये जाते हैं….स्कूल के सेलेबस से लेकर कालेज की मोटी मोटी किताबों में…अब माशा्ल्लाह अब तो संचार क्रांति के युग में है….
     
    Vibhanshu Yadav : मयंक भाई अब आप बोलो अब तो सुप्रीम कोर्ट से भी इजाज़त मिल गई
     
    Vibhanshu Yadav : Alok Nandan सर सिलेबस की किताबों में मेरी रूचि कभी रही नहीं और सापेक्षता का सिद्धांत किताबों में ही लागू होता है जीवन में नहीं, अगर जीवन को किताबों से जोड़ देंगे तो फिर आपके मार्क्सवाद, महिलावाद के लिए जगह ही कहा बचेगी
     
    Robin Singh : मयंक भाई .. उमर से समझ का कुछ लेना देना नहीं.. देखिये न इतनी उमर हो गयी मेरी लेकिन इतनी सी समझ नहीं आई.. की -"न बीवी न बच्चा न बाप बड़ा न भईया The Whole thing is that की भईया सबसे बड़ा रुपईया"
    नोट- इसको Topic के सन्दर्भ से न जोड़ा जाये ..
     
    Alok Nandan : अरे अरे िवभांशू जी आप क्या कह रहे हैं….कोई सिद्थांत िकताबों में लागू नही होता है…बलिक् किताबों में उन्हें कलमबद्ध किया जाता है…और आप तो आइंस्टाइन को खारिज कर रहे हैं…आदमी भी तो आब्जेक्ट ही है….
     
    Jha Nisha : bakiyo ka to pata nahi bt purn sir bohot hard worker h… N apne kaam k liye bohot loyal b..unke bare me jitna padha h usse yahi jana h k wo sada jivan uchch vichar jine me Believe krte h..
     
    Vibhanshu Yadav : आइन्स्टीन की बात का भी जवाब है लेकिन वो यहाँ नहीं दे सकता, और अब तक तो मैं आदमी को सब्जेक्ट समझता आ रहा था
     
    Sanjaya Kumar Singh : सिद्धांततः नहीं। लेकिन अगर आप संस्थान, बॉस और कार्यस्थिति देखकर नौकरी चाहेंगे तो वैसे ही मुश्किल है और सब कुछ अनुकूल हो तो वह आपको पसंद कर ले यह असंभव नहीं तो आसान भी नहीं है। नौकरी करने की अपनी मजबूरी है और नौकरी करना ही कोई कम मुश्किल नहीं है। पुण्य प्रसून वाजपेयी खुद ब्रांड बन चुके हैं और उन्हें ऐसे ब्रांड से नहीं जुड़ना चाहिए जो उनसे कमतर हो। फिर भी उन्होंने कोई निर्णय किया है तो उसके अपने कारण होंगे और अगर ये निजी हैं तो हमें इनका सम्मान करना चाहिए।
 
    Alok Nandan : साइकोलोजी का भाषा में सबजेक्ट और फिजिजिक्स की भाषा में आबजेक्ट….
 
    Robin Singh : Yashwant Singhसर जी.. अब ते आईंस्टीन के भी कुकुर काट लेहलस और रउवा लुत्ति लगा के मज़ा लेट हईं..
   
    Vibhanshu Yadav : सर आज तक अपनी राष्ट्रभाषा हिंदी शुद्ध शुद्ध बोलना नहीं सीख पाया तो साइकोलाजी और फिजिक्स की भाषा कैसे सीखता
    
    Harishankar Shahi : यशवंत भैया अपनी राय तो सदा ही स्पष्ट रखने की कोशिश करता हूँ. एकदम स्पष्ट..
     
    Alok Nandan : भाषा के चक्कर में मत पड़िये…कंटेंट पकड़िये…
     
    Vibhanshu Yadav : कंटेंट कैसे पकडू सर जब कंटेंट का सब्जेक्ट ऑब्जेक्ट हो जा रहा है
     
    Alok Nandan : हा हा
     
    Vibhanshu Yadav : कंटेंट की शुरुआत फिर से करते हैं, वाजपेयी जी ने सही किया या गलत, हां या ना
     
    Alok Nandan : कौन अटल बिहारी वाजपेयी..???
     
    Robin Singh : ^^ जी नहीं मनोज वाजपेयी
     
    Vibhanshu Yadav : जी मैंने कंटेंट पकड़ लिया बाकी ऑब्जेक्ट को आप डिसाइड करें, कौन वाले वाजपेयी ये मैं नहीं बता सकता क्यूंकि वाजपेयी ऑब्जेक्ट हैं या सब्जेक्ट ये आप ही बता सकते हैं
     
    Yashwant Singh : ha ha ha.. bhayiyo, ab bas bhi karo warna saare वाजपेयीज ki aatma ko kast hoga….
     
    Alok Nandan : ha ha ha ha ha
     
    Ahmad Raza : meri samajh jahan tak jati hai to punya ne ab hr policy ki kaat dhoondh li hai so ………
     
    Alok Nandan : kat ya khat?? jisper chadar tan ke gholat rahte hai?
 
    Vinay Pathak : no and nevar
 
    Agnivesh Jha : ek samay kuchh isi awastha se Dinkar v gujr rahe the
kinhi mitra ka kahna tha ki usulo se chulhe nai jalaye jate, un bhai se yahi kahna haí ki jo usulo se chulhe jalaye wahi punye hota hai !!!
     
    Bhartiya Deshbhakt : sab dukho ki ek dava hai kyo na apnaye rupya ghar par aaye aur man prasann ho jaye…. sabpaise ka khel hai malik aap bhi apnayiye sukhi ho jayiye… jai hind jai bharat
     
    Agnivesh Jha : baki vyakheya to Sprim court achhe karte hain !!!
 
    Bhartiya Deshbhakt : congresi neta to hamesa se hi achhi chhavi walo ko bhajate rahe hai ye koi nayi baat thode hi hai, jaise sachin tendulakar ko bhajana chaha magar thoda chuk gaye
 
    Bhartiya Deshbhakt : mand mohan ko barbad karne ke baad ab unhe unki jagah koi lene wala chahiye jispar janta viswas karti ho aur jo bantadhar ho rahi congress ko bacha sake jai hind jai bharat
   
    Sanjay Srivastva : nahi
    
    Sushil Gangwar : Pet ka swaal hai bhai
     
    Santosh Sharma : sir ji shayd yahi patrkarita ke charamotkash ke saath ispar grahan bhi shuru ho gaya hai…aur yah peek patrakarita ki peer shati hai…..jaha aarth hi sabse ucha hai aur vah anek bheso me milega……tulsi ke anusar …samrath ke nahi dos gosai…..
 
    Mukesh Yadav : कौन कहां काम करे ये उसका निजी मामला है।
 
    Hari Sharma : बाजपेयी जी एक पत्रकार हैं…उन्हें पत्रकारिता ही करनी चाहिए..लोगों को आनंद आता है उनकी एंकरिंग में..रही बात चैनल की तो कौन सा चैनल और चैनल मालिक सही है बताएं जरा…वक्त के साथ सब बदल जाता है..इसलिए इंडिया न्यूज भी ठीक चैनल है…इसलिए बाजपेयी जी को पत्रकारिता करने दे और आनंद लें…
   
    Anil Sakargaye : pratibhaa……kahi chhup bhi sakti hai…?..bhavishy me sameeekaran badal bhi sakta hai….kuchh samay ke baad…………deepak unke under me kaary kare…………..or usase bura yah hoga ki……….punay prasoon bajpayi ji ka ……………andaaj e baya …hi badal jaaye……nahi kyaa….?
    
    Pradeep Chandra Pandeay : पत्रकारिता के सामूहिक दायित्व समापन की ओर हैं। सिनेमा की तरह सबके अपने-अपने किरदार हैं। हम किसके साथ हैं इससे अधिक महत्वपूर्ण है हमारी अपनी भूमिका क्या है। पाठक, श्रोता, दर्शक इसका चयन कर लेते हैं।
    
    Vijay Ahuja : यशवंत जी, आप भड़ास के लिए लोगो से पैसा मांगते है तो बहुतो के मन में तमाम सवाल उठते है ,पर जब आपको अपनी सोच जायज लगती है तो आप लोगो की सोचो को दरकिनार कर देते है। जिस तरह आपको पैसो की जरुरत होती है,उसी तरह बाजपेयी जी को भी धन की जरुरत पड़ती ही होगी। फिर आज तक़रीबन सारे चेनलो के मालिको की निष्ठा किसी न किसी दल से जुडी हुयी है ऐसे में अगर बाजपेयी जी आप जैसा ही सब सोचते रहे तो उनकी क्या हालत होगी यह आप बेहतर समझते है। इसलिए आप उनके बारे में ज्यादा मत सोचे, उन्होंने भी कुछ सोच कर ही यह फैसला लिया होगा।

    Yashwant Singh : Vijay Ahuja ji, चंदा मांग कर या सब्सक्रिप्शन देकर या जनसहयोग से पोर्टल या मैग्जीन या अखबार चलाना कभी गलत नहीं रहा है और न आगा रहेगा… यह मूलभूत सिद्धांत है, लेकिन मान लीजिए अगर कोई नकली शराब बेचकर उससे कमाए पैसे से चैनल चलाता है तो उसे हर हाल में गलत माना जाएगा…
   
   Gaurav Jha : मेरे हिसाब से तो नहीं….
 
   Asif Khan : नहीँ करना चाहिए। मगर कहीँ ना कहीँ तो आज का पत्रकार बिकने जाएगा ही। पुराने दोस्त के पास ही सही..
 
   Girijesh Vashistha : Baazar me jo hai woh bikne ke liye hi to hai. Jo bikta nahi hai woh bechne ke kaam aata hai. Ishthaar ki tarah.
 
   Manish Sachan : पैसा और सत्‍ता बड़ी चीज हैं भाई,
 
   Yashwant Singh : Gaurav Jha ji, aapne yah nahi bataya ki kyo nahi jaana chaahiye? thanks asif khan bhayi, girijesh bhayi aur manish bhayi.
 
   Kavi Anand Ratnu : Ap whi he Na jnhone Deepak chorshiya ko nai pari ki badhai Ka status dala tha? Ye kyo yaswant ji
 
   Yashwant Singh : ji bhayi.. par eska matlab ye to nahi ki kisi par bahas nahi ki ja sakti?
 
   Subodh Yadav : सर जय हिँद। बाजपेई जी से तुलना अन्यो की नहीं की जा सकती। हालात / समय कुछ भी करा दे, कर्म की पूजा होती है। सर आप भी तो उदाहरण के तोर पर हैँ आपसे तो बहुत बडे बडे पत्रकार भाई देश मेँ मौजूद है लेकिन आपकी कलम जो लिखती है बो औरोँ की नहीँ । मेरी सोच से तो पद जूनियर सीनियर मायने नहीँ रखता।

  Devendra Surjan : हिंदी समाचार चेनल के दो प्रमुख चेहरे किन्ही कारणों से अपने – अपने चेनल्स से विदा ले रहे हैं , यह खबर अब नई नहीं रही. दीपक चौरसिया और पुण्य प्रसून बाजपेयी को मैंने जितना देखा है टीवी पर देखा है .लेकिन जैसा कि इन दिनों चलन चल पड़ा है कई हिंदी समाचार प्रस्तोता प्रिंट मीडिया में भी साप्ताहिक कालम लिखा करते हैं , सिर्फ बाजपेयी जी के ही कुछ लेख देखे हैं और चूंकि वे तात्कालिक महत्व के होते थे , पढकर भी अब याद नहीं हैं. एक संस्मरण नागपुर के अपने शुरूआती पत्रकारीय जीवन को केंद्रित करते हुए पुण्य प्रसून जी ने लिखा वह जरूर मुझे अच्छा लगा था जिसमें उन्होंने किसी मराठी सज्जन को इस बात का श्रेय दिया था कई वे ही उनसे लेख – समाचार लिखवा कर ही दम लेते थे.और कैसे उनकी हौसला अफजाई करते थे. उन सज्जन के बेटे की विवाह तिथि तय हो चुकी थी कि इस बीच ही वे स्वर्गवासी हो गए. किसी प्रेरणा स्त्रोत को इमानदारी से जैसे याद किया जाना चाहिए उन्होंने किया था. दीपक चौरसिया जी के बारे यही कि २६/११ की उनकी ताजमहल होटल से लाइव रिपोर्टिंग मुझे ठीक लगी थी और दूसरा तब जब उन्होंने रामदेव बाबा को रामलीला मैदान में चुनौती दी थी कि मैं तो स्टार न्यूज में ही रहने वाला हूँ, आप अपने भविष्य के बारे में बताइए. कॉफी गर्म बहस की थी उन्होंने .मैं तब तो रिपीट रिकार्डिंग ही देख सका था लेकिन ठीक लगा था. कुछ वर्ष पहले वे छत्तीसगढ़ के चुनावों पर अपना लाइव आकलन दे रहे थे तो मुझे लगा कि वे शायद रायपुर या छत्तीसगढ़ के किसी शहर के ही होंगे इसलिए इतनी एक्सपर्ट ओपिनियन दे रहे हैं. मुझे यह अनुमान करते अच्छा लगा था कि वे छत्तीसगढ़ से हैं. यों , मुझे अब तक नहीं मालूम कि वे किस शहर के मूल निवासी हैं. लेकिन क्या फर्क पड़ता है. अभी न्यूज लांड्री नाम की ई मेगजीन ने स्टार से विदा लेते चौरसिया जी का इंटरव्यू लिया , वह भी ठीक ठीक लगा सिवाय उनके पैरों को जोरो से हिलाने की आदत के. [ज्योतिष में जो लोग इस तरह पैर हिलाते हैं , उन्हें कामुक माना गया है, बस इतना ही.] जबकि पुण्य प्रसून बाजपेयी नियमित तो लिखते हैं लेकिन उनमें जिन्हें मैं खरीदता नहीं. किसी मित्र के यह योग से पहुंच गया और उस दिन उनका लेख प्रकाशित हुआ तो सरसरी तौर पर देख लेता हूँ बिना किसी नेक या बद नीयत के. जी में उनके पहुंचने के बाद किसी कार्यक्रम को देने का जिम्मा उन्होंने ज़रूर उठाया लेकिन वे प्रभावित नहीं कर सके.जिस तरह दीपक जी पैर हिलाने की आदत से ग्रस्त हैं प्रसून जी हाथ मलने की आदत से ग्रस्त हैं. उन्हें हाथ मलता देख आप लालकृष्ण आडवाणी को सहज ही याद कर सकते हैं. उनकी भी कुछ ऐसी ही हाथ मलने की आदत है जो शायद उनकी राजनीतिक मनोकामनाओं के पूरा न होने के वज़ह से पड गई है. अपने बाजपेयी जी भी कई चेनल बदलकर भी अपने भाग्य को आडवानी से बेहतर नहीं बना पायें हैं. अब जो वर्तमान स्थिति है उसमें जहां इन अनुभवी पत्रकारों का ज़मावडा जा रहा है वह शायद चेनल एक्स है जो कोई बहुत लोकप्रिय चेनल नहीं है.इन जाने पहचाने चेहरों को न्यूज एक्स का चेहरा चमकाने का दायित्व दिया गया है जो तुलनात्मक रूप से कठिन काम है. कौन किसके अधीन काम करता है , मेरी दृष्टि में यह उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना कि मिलजुल कर काम करना.और अपनी साख के दम पर चेनल को विश्वसनीय और साखदार बनाना. पिछले दिनों ३-४ पत्रकार चेनल छोड़ प्रिंट मीडिया में गए हैं. अच्छा होता ये दोनों और इनकी टीम के लोग किसी प्रिंट मीडिया को अपनी सेवाएं देते. अखबार में छपने वाली किसी खबर को कैसे विश्वसनीय बनाया जा सकता है , उस पर इनसे बेहतर कौन जान सकता है. पेपर को नामचीन पत्रकार मिलते और इनके चेहरों के बदौलत पेपर को विज्ञापन . बहरहाल , उम्मीद यह की जानी चाहिए कि इन प्रसिद्ध चेहरों में निजी प्रतिष्ठा , जूनियर-सीनियर की भावना से ऊपर उठकर काम करने का ज़ज्बा होगा . इनके प्रयास और इनका भविष्य नई जगह पर सफल होगा , इसी आशा के साथ दोनों को शुभकामनाएं.

भड़ास4मीडिया के संपादक यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.


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