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पुरस्कार पाने के लिए हां कर चुके विष्णु खरे का अपराधबोध

विप्रिय भाई, हिंदी में साहित्यिक पुरस्कारों का मामला बहुत त्रासदायी हो चुका है. अधिकांश पुरस्कर्ता (संस्थाएं, समूह या व्यक्ति) और पुरस्कृत (लेखक-लेखिकाएं) कुपात्र, षड्यंत्री, कमीने, कैरिअरिस्ट और संदिग्ध समझे जाते हैं. दुर्भाग्यवश, यह काफी हद तक सही भी है. कोई स्वयं को कितना भी योग्य या ईमानदार क्यों न समझता हो, उसने भले ही किसी चालबाजी से कोई पुरस्कार न हथियाया हो, इनाम मिलते-से ही एक पाप-बोध में डूब जाता है, लोभ के उस क्षण पर स्वयं को लानत भेजता है जब उसने उसे स्वीकार किया, और यदि वह एकदम बेगैरत नहीं हो गया है तो वह सम्मान आजीवन उसके गले पर एक मरे हुए सांप की तरह लिपटा रहता है.

विप्रिय भाई, हिंदी में साहित्यिक पुरस्कारों का मामला बहुत त्रासदायी हो चुका है. अधिकांश पुरस्कर्ता (संस्थाएं, समूह या व्यक्ति) और पुरस्कृत (लेखक-लेखिकाएं) कुपात्र, षड्यंत्री, कमीने, कैरिअरिस्ट और संदिग्ध समझे जाते हैं. दुर्भाग्यवश, यह काफी हद तक सही भी है. कोई स्वयं को कितना भी योग्य या ईमानदार क्यों न समझता हो, उसने भले ही किसी चालबाजी से कोई पुरस्कार न हथियाया हो, इनाम मिलते-से ही एक पाप-बोध में डूब जाता है, लोभ के उस क्षण पर स्वयं को लानत भेजता है जब उसने उसे स्वीकार किया, और यदि वह एकदम बेगैरत नहीं हो गया है तो वह सम्मान आजीवन उसके गले पर एक मरे हुए सांप की तरह लिपटा रहता है.

मुझे पैसे और “प्रतिष्ठा” की दृष्टि से कौन-सा अंतिम बड़ा “अखिल भारतीय” पुरस्कार किसने और कब दिया था यह मुझे याद नहीं – यदि वह मध्यप्रदेश सरकार का मैथिलीशरण गुप्त सम्मान था तो उसे मिले एक दशक से ऊपर हो चुका है. उसके बाद मध्यप्रदेश का ही विनम्रतर भवभूति अलंकरण प्राप्त हुआ. अब 13 नवंबर को मेरी स्वीकृति के बाद मुंबई की “कला, संस्कृति व साहित्य की प्रतिनिधि संस्था” “परिवार” की ओर से सही या गलत मेरी “रचनात्मकता और हिंदी काव्य सेवा के प्रति समर्पित निष्ठाभाव को सम्मानित करने” के लिए मुझे एक लाख रुपये के पुरस्कार की घोषणा की गयी है.

मुझे दिल्ली छोड़कर मुम्बई में बसे अभी सिर्फ एक वर्ष और कुछ दिन हुए हैं. इस एक वर्ष में एक मित्र के निवास पर कुछ दोस्तों के साथ अनौपचारिक-सी लेखन-चर्चा के अलावा मैं किसी सभा-संगोष्ठी में नहीं गया. कुछ मित्र फोन कर लेते हैं या मैं उन्हें कर लेता हूँ. मुंबई की साहित्यिक गतिविधियों में मैंने कोई हिस्सा नहीं लिया है. दिल्ली में भी निस्बतन कम लेता था. मुझे “परिवार” संस्था के अस्तित्व और उसकी गतिविधियों का कोई इल्म नहीं था. मुझे गुरुडम और गुटबाजी से एक स्वस्थ नफरत है. मैं पूरी तरह से वामपंथ-समर्थक हूँ, विशेषतः निस्संकोच रूप से उस धारा का जिसे आसानीपरस्त दिमाग “नक्सलवादी” कह देते हैं, क्योंकि मैं हमेशा-से मानता आया हूँ कि भारत-जैसे देश में सशस्त्र प्रगतिकामी क्रांति के अलावा और कोई भी रास्ता नहीं बचने दिया गया है, किन्तु किसी पार्टी या लेखक-संघ का औपचारिक सदस्य नहीं हूँ – कभी अविभाजित कम्युनिस्ट पार्टी का था.

लेकिन हिंदी की एक भद्दी और आपत्तिजनक कहावत अपनी जगह है और कारगर है – रांड रंडापा तब काटे जब रंडुए काटन देंय. एक और कहावत है– कछु करनी, कछु करमगति, कछू पुरबले पाप. प्रतिभावान युवा हिंदी कवि और पिछले एक वर्ष से नवभारत टाइम्स, मुंबई के संपादक सुंदरचंद ठाकुर ने, जो दिल्ली में अक्सर साथ बैठते थे किन्तु मुंबई में आज तक नहीं दिखे हैं, यद्यपि मोबाइल पर बीस बार “अगले संडे” मिलने के वादे कर चुके हैं, पिछले दिनों फिर फोन किया और एक नितांत अप्रत्याशित प्रश्न किया कि यदि मुझे कोई पुरस्कार दिया जाए तो क्या मैं उसे स्वीकार करूँगा? यह इसलिए कि वे जानते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में मैं कुछ साहित्यिक पुरस्कारों को टाल चुका हूँ. एक हाल में ही नहीं लिया क्योंकि उसके औचित्य और निर्णायक मंडल के गठन से मैं सहमत नहीं हो पाया था किन्तु मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए उसकी चर्चा मैंने सुंदरचंद ठाकुर से भी नहीं की है. मैं भविष्य में भी कुछ पुरस्कारों को अस्वीकार करने का इरादा रखता हूँ – लेकिन पहले वे मेरे पक्ष में घोषित तो हों!

बहरहाल, जब मैंने उनसे तफसील से पूछा तो उन्होंने बताया कि मुंबई की एक संस्था (परिवार) है जो वर्षों से इस-इस तरह का पुरस्कार देती रही है, कई अच्छे-मंझोले लोकप्रिय कवियों-गीतकारों के अलावा नागार्जुन, शरद जोशी और सोम ठाकुर को भी सम्मानित कर चुकी है, कुख्यात नहीं है और बेशक राजस्थान के मुंबई में बसे धनाढ्य परिवारों द्वारा चलाई जाती है किन्तु किसी आपराधिक-राजनीतिक माफिया से नियंत्रित-संचालित नहीं है. सुंदरचंद ठाकुर ने यह भी बताया कि इस वर्ष से यह संस्था अपने इस पुरस्कार को निराला-नागार्जुन जैसे कवियों द्वारा प्रेरित हिंदी की कथित आधुनिक काव्य-धारा से दुबारा जोड़ना चाहती है. उन्होंने कहा कि वे स्वयं निर्णायक-मंडल में हैं और अपनी ओर से पहले मेरा ही नाम प्रस्तावित करना चाहते हैं, दूसरे निर्णायक भी शायद असहमत न हों, किन्तु मेरी अनुमति के बगैर नहीं.

सोचने के लिए मैंने उनसे एक दिन का वक्त माँगा और गोपनीयता भंग न हो इसलिए संस्था और पुरस्कार की कुछ ऊपरी-ऊपरी तफ्तीश की. नकारात्मक कुछ भी मालूम न हुआ– यही बताया गया कि परिवार वाले यह पुरस्कार देते हैं, एक लोकप्रिय मंचीय कवि-सम्मेलन करवाते हैं, और विशेष कुछ नहीं. ध्वनि यह थी कि उन्हें नियमित रूप से पूरे वर्ष-भर और भी सार्थक साहित्यिक गतिविधियों को बढ़ावा देना चाहिए. शायद अब दें.

अगले दिन मैंने सुंदरचंद ठाकुर से कह दिया कि यदि यह पुरस्कार मुझे ही मिलता है तो मैं इसे अस्वीकार नहीं करूँगा, यद्यपि निर्णायक-मंडल को भलीभांति मालूम होगा कि हिंदी में मुझ-जैसे और मुझसे बेहतर कवियों की कमी नहीं है. मुम्बई में ही विजय कुमार, अनूप सेठी और विनोद दास जैसे वरिष्ठ कवि हैं जिन्हें यह निर्विवाद दिया जा सकता था. मैंने सुंदरचंद ठाकुर से अन्य निर्णायकों के बारे में कुछ नहीं पूछा. उनके नाम मुझे फैसले के बाद ही मालूम पड़े. मेरा उनसे कभी कोई संपर्क नहीं रहा. अभी भी मैं परिवार संस्था के स्तंभ-द्वय संस्थापक-अध्यक्ष श्री रामस्वरूप गाडिया और वरिष्ठ साहित्यकार नंदकिशोर नौटियाल जी के संपर्क में नहीं हूँ.

मैंने दो शर्तें ज़रूर रखी थीं  – पुरस्कार-समारोह में किसी भी विचारधारा का कोई भी राजनीतिक व्यक्ति मंच पर न बैठे और पुरस्कार मुझे नामदेव ढसाल (शीर्ष मराठी दलित कवि,यद्यपि शिव-सेना और आरएसएस से सम्बद्ध) या चंद्रकांत पाटील (शीर्ष मराठी कवि-अनुवादक-समीक्षक) के हाथों दिया जाए. नामदेव ढसाल के निरंतर अनिश्चित स्वास्थ्य के कारण आयोजकों ने चंद्रकांत पाटील को राज़ी किया.

मैंने अपने पूरे होशोहवास, जानकारी और जिम्मेदारी से यह सूचनाएँ दी है. इन्हें सुंदरचंद ठाकुर से 09987500520 पर सत्यापित किया जा सकता है यद्यपि वे इसके लिए बाध्य न समझे जाएँ. यह इसलिए लिखा गया है कि मैं इस पुरस्कार को लेने के अपराध-बोध को सार्वजनिक रूप से स्वीकार कर सकूं, हालांकि उसका शमन इस इकबालिया कैफियत से भी नहीं हो पा रहा है. संभव हो तो इस पर निस्संकोच बहस-मुबाहिसा हो. अभी तो अपनी इस गिरावट को लेकर पशेमान और (मालूम नहीं किससे) क्षमायाचक ही हो सकता हूँ. ऐसी ट्रेजिडी है नीच.

विष्णु खरे

मुंबई

सैलफोन : 09833256060

ग्रुप मेल में इधर-उधर यहां वहां भेजा जा रहा विष्णु खरे का एक खुला पत्र, विष्णु खरे के बारे में जो लोग नहीं जानते हैं, उनके लिए पेश है उनका बायोडाटा….

विष्णु खरे

जीवन-वृत्त

९ (नौ) फरवरी, १९४० (उन्नीस सौ चालीस) को मध्य प्रदेश के छिन्दवाड़ा शहर में जन्म.

एम.ए. (अंग्रेज़ी साहित्य), इंदौर क्रिश्चियन कॉलेज, १९६३. विक्रम विश्वविद्यालय में चौथा स्थान.

गोएठे इंस्टिट्यूट, मुर्नाऊ, जर्मनी से जर्मन का सर्टिफिकेट.

मराठी और नागरी-उर्दू का पर्याप्त ज्ञान. पंजाबी, बांग्ला, गुजराती, बुन्देलखंडी, अवधी, भोजपुरी, बृज, निमाड़ी, मालवी, राजस्थानी भाषाओँ में कामचलाऊ गति.

थोड़ी-बहुत जर्मन और चेक बोल और पढ़ सकते हैं.डच पढ़ लेते हैं.अंदाज़ से कुछ पोल,इतालवी और फ्रेंच समझ सकते हैं.

विवाहित. पत्नी सुधा खरे. बड़ी बेटी (श्रीमती) अनन्या (बेलोस), छोटी बेटी (श्रीमती) मीला (बोएम), और बेटा अप्रतिम खरे.

कार्य-अनुभव

एम.ए. करते हुए दैनिक इंदौर समाचार में उप-संपादक.हिंदी पाक्षिक सिनेमा एक्सप्रेस और इन्दौर नगर निगम में भी काम किया.

एम.ए. के बाद सांध्य गुजराती कॉलेज, इंदौर में विभागाध्यक्ष (एवं पत्रकार) राजेन्द्र माथुर के साथ कुछ महीने अंग्रेज़ी का अध्यापन.

फिर मध्य प्रदेश के राजकीय महाविद्यालयों में अंग्रेजी का अध्यापन : १९६३-१९६८.इस बीच में कुछ महीने भारतीय ज्ञानपीठ,कोलकाता में पुरस्कार अधिकारी.

१९६८-१९७० में इंस्टिट्यूट ऑफ चार्टर्ड अकाउंटेन्ट्स ऑफ इंडिया,दिल्ली,में  अंग्रेज़ी के स्टडीज़ ऑफीसर.

१९७०-१९७५ में हस्तिनापुर कॉलेज,दिल्ली विश्वविद्यालय  में अंग्रेज़ी का अध्यापन.

इस बीच १९७१-१९७३ के दौरान तत्कालीन चेकोस्लोवाक सरकार के निमंत्रण पर पच्चीस महीने के लिए राजधानी प्राग में लेखक-अनुवादक से रूप में अध्ययन-वृत्ति पर निवास.

१९७६-१९८४ में  केन्द्रीय साहित्य अकादेमी,दिल्ली में प्रकाशन,पुरस्कार तथा  अन्य कार्यक्रमों के लिए  उत्तरदायी उप-सचिव.

१९८४-१९९३ के बीच नवभारत टाइम्स दिल्ली में फीचर-लेखक के पद से प्रारम्भ कर अलग-अलग समयों पर  नवभारत टाइम्स लखनऊ के स्थानीय संपादक, दिल्ली के स्थानीय संपादक, सारे संस्करणों  के विचार-प्रमुख तथा जयपुर संस्करण के स्थानीय संपादक. बीच में प्रस्तावित टाइम्स ऑफ इंडिया रविवारी हिंदी संस्करण के संपादक और टाइम्स ऑफ इंडिया, अंग्रेज़ी, दिल्ली के वरिष्ठ सहायक संपादक मनोनीत. पत्रकार के रूप में वे राजीव गाँधी, विश्वनाथ प्रताप सिंह, पी.वी.नरसिंह राव तथा चंद्रशेखर जैसे प्रधानमंत्रियों तथा अन्य कई राजनीतिज्ञों के पेशेवर संपर्क में आए.

१९९३ में  टाइम्स ऑफ इंडिया समूह से इस्तीफ़ा  और तब से अब तक मुख्यतः स्वतंत्र लेखन, किन्तु बीच में कुछ  महीने दैनिक भास्कर के इन्द्रधनुष परिशिष्ट के संपादक, दो वर्षों तक नेहरू मेमोरिअल म्यूज़ियम एंड लाइब्रेरी  के सीनियर फ़ेलो और कुछ महीने  नेशनल बुक ट्रस्ट में  फ्रांकफुर्ट पुस्तक मेला २००६ के लिए नैशनल बुक ट्रस्ट के आधिकारिक भारतीय लेखक प्रतिनिधि-मंडल के नियोजक-परामर्शदाता.

लेखन

खंडवा के बहूद्देशीय राजकीय उच्चतर माध्यमिक स्कूल में प्रधानाध्यापक-कहानीकार ज.प्र.चौबे “वनमाली” के प्रोत्साहन में छात्र-जीवन से लेखन और प्रकाशन का प्रारंभ. पहली कविता नागपुर से प्रकाशित तथा श्री द्वारकाप्रसाद मिश्र द्वारा संपादित साप्ताहिक सारथी के तीन फरवरी १९५७ के अंक में शायद गजानन माधव मुक्तिबोध के साहित्य संपादन में छपी. कहानियां भी लिखीं. यह प्रारंभिक रचनाएँ सारथी, प्रहरी, वसुधा, कृति, कहानी, आधुनिक कहानियां, मनोरमा आदि पत्रिकाओं में प्रकाशित हुईं.तब से हिन्दी के लगभग सभी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित.कहानियाँ लिखना १९६२ से स्थगित है किन्तु समीक्षाएँ लिखी हैं, अनुवाद किए हैं, पत्रकारिता की है और भारतीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय सिनेमा पर भी लिखा है.

विष्णु खरे ने हिंदी साहित्य और विश्व सिनेमा पर अंग्रेज़ी में भी पर्याप्त लेखन किया है.

प्रकाशन

मूल पुस्तकें : कविता

१. विष्णु खरे की बीस कविताएँ : पहचान  सीरीज़ : संपादक : अशोक वाजपेयी : १९७०-७१ .

२. खुद अपनी आँख से : जयश्री प्रकाशन,दिल्ली : १९७८.

३. सबकी आवाज़ के परदे में : राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली : १९९४,२०००.

४. पिछला  बाक़ी : राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली : १९९८.

५. काल  और अवधि के दरमियान : वाणी प्रकाशन : २००३.

६. विष्णु खरे – चुनी हुई कविताएँ : कवि ने कहा सीरीज़ : किताबघर,दिल्ली : २००८.

७. लालटेन जलाना (कात्यायनी द्वारा चयनित कविताएँ) : परिकल्पना  प्रकाशन,लखनऊ : २००८.

८. पाठांतर : परिकल्पना प्रकाशन,लखनऊ : २००८.

आलोचना

१. आलोचना की पहली किताब : (दूसरा संस्करण) वाणी प्रकाशन,दिल्ली : २००४.

( चार आलोचना पुस्तकें प्रवीण प्रकाशन,दिल्ली के यहाँ यंत्रस्थ )

सिने-समीक्षा

१. सिनेमा पढ़ने के तरीके : प्रवीण प्रकाशन,दिल्ली : २००८

२. सिनेमा से संवाद : प्रवीण प्रकाशन,दिल्ली : २००९

चुने  हुए अनुवाद (हिंदी में)

१. मरु-प्रदेश और अन्य कविताएँ (टी.एस.एलिअट  की कविताएँ) : प्रफुल्ल चंद्र दास,कटक : १९६०.

२. यह चाकू समय : (हंगारी कवि ऑत्तिला  योज़ेफ़ की कविताएँ) : जयश्री प्रकाशन,दिल्ली :१९८०.

३. हम सपने देखते हैं : (हंगारी कवि  मिक्लोश रादनोती की कविताएँ) : आकंठ,पिपरिया : १९८३.

४. पियानो बिकाऊ है : (हंगारी नाटककार फेरेंत्स कारिंथी का नाटक) : वाणी प्रकाशन,दिल्ली : १९८३.

५. हम चीखते  क्यों नहीं : (पश्चिम जर्मन  कविता) : वाणी प्रकाशन,दिल्ली : १९८४.

६. हम धरती के नमक हैं : (स्विस कविता) : राधाकृष्ण प्रकाशन,दिल्ली : १९९१.

७. दो नोबेल  पुरस्कार विजेता कवि : (चेस्वाव  मीवोश और विस्वावा शिम्बोर्स्का की कविताएँ) : वाणी

   प्रकाशन,दिल्ली : २००१.

८. कलेवाला : (फिनलैंड का राष्ट्रीय महाकाव्य) : वाणी प्रकाशन,दिल्ली : दूसरा,संशोधित संस्करण, १९९७.

९. फाउस्ट : (जर्मन महाकवि गोएठे का काव्य-नाटक) : प्रवीण प्रकाशन,दिल्ली : २००९.

१०. अगली कहानी : (डच गल्पकार सेस नोटेबोम का उपन्यास) : वाणी प्रकाशन,दिल्ली : २००२.

११. दो प्रेमियों का अजीब किस्सा 🙁 सेस नोटेबोम का उपन्यास) :वाणी प्रकाशन,दिल्ली : २००३.

१२. हमला : (डच उपन्यासकार हरी मूलिश का उपन्यास) : वाणी प्रकाशन,दिल्ली : २००३.

१३. जीभ दिखाना : (जर्मन नोबेल विजेता गुंटर ग्रास का भारत-यात्रा वृत्तान्त) : राधाकृष्ण

    प्रकाशन,दिल्ली : १९९४.

१४. किसी और ठिकाने : ( स्विस कवि योखेन केल्टर की कविताएँ ) : वाणी प्रकाशन,दिल्ली : २००२.

विष्णु  खरे ने हिंदी में विश्व  कविता से सैकड़ों और अनुवाद किए हैं किन्तु वे अभी  असंकलित हैं.

अनुवाद (अंग्रेज़ी में)

१. अदरवाइज़  एंड अदर पोएम्स : श्रीकांत वर्मा की कविताएँ : राइटर्स  वर्कशॉप,कोलकाता : १९७२.

२. डिसेक्शंस एंड अदर पोएम्स : भारतभूषण अग्रवाल की कविताएँ : राइटर्स वर्कशॉप,कोलकाता : १९८३.

३. दि पीपुल  एंड दि सैल्फ : हिंदी कवियों का संग्रह : स्वप्रकाशित,दिल्ली : १९८३.

४. दि बसाल्ट वूम्ब : स्विस कवि टाडेउस फाइफर की जर्मन कविताएँ,पामेला हार्डीमेंट के साथ : जे

   लैंड्समैन पब्लिशर्स,लन्दन : २००४.  

अनुवाद (जर्मन में)

१. डेअर ओक्सेनकरेन : (लोठार लुत्से के साथ संपादित हिंदी कविताओं के अनुवाद) : वोल्फ मेर्श फेर्लाग,

   फ़्राइबुर्ग,जर्मनी : १९८३.

२. डी श्पेटर कोमेन : ( लोठार लुत्से द्वारा विष्णु खरे की कविताओं  के अनुवाद) : द्रौपदी फेर्लाग,हाइडेलबेर्ग,जर्मनी : २००६.

३. फेल्ज़ेनश्रिफ्टेन : ( मोनीका होर्स्टमन के साथ संपादित युवा हिंदी कवियों के अनुवाद ) : द्रौपदी फेर्लाग,हाइडेलबेर्ग,जर्मनी : २००६.

संपादित प्रकाशन

१  अपनी स्मृति की धरती : हिंदी अनुवाद में सीताकांत महापात्र की ओड़िया कविताएँ : जयश्री

   प्रकाशन,दिल्ली : १९८०.

२. राजेंद्र माथुर संचयन (दो भाग) : वाणी प्रकाशन,दिल्ली : १९९३.

३. उसके सपने : (चंद्रकांत देवताले का काव्य-संकलन) : वाणी प्रकाशन,दिल्ली : १९९७.सह-संपादक

   चंद्रकांत  पाटिल द्वारा इसी चयन  का मराठी अनुवाद तिची  स्वप्ने पॉप्युलर प्रकाशन,मुंबई  से प्रकाशित.

४. जीवंत साहित्य (बार्बरा लोत्स के साथ संपादित बहुभाषीय भारत-जर्मन साहित्य-संकलन) : वाणी

   प्रकाशन,दिल्ली :१९९८.

५. महाकाव्य विमर्श : वाणी प्रकाशन,दिल्ली : १९९९.

६. पाब्लो नेरूदा विशेषांक : उद्भावना,दिल्ली : २००६.

७. सुदीप बनर्जी स्मृति अंक : उद्भावना,दिल्ली : २०१०.

८. शमशेर जन्मशती विशेषांक : उद्भावना,दिल्ली : २०११.

विष्णु खरे की कविताओं के अनुवाद प्रमुख भारतीय भाषाओँ के अतिरिक्त अंग्रेज़ी,रूसी,जापानी,पोल,जर्मन  आदि विदेशी भाषाओँ में  भी हुए हैं.

विष्णु खरे पर प्रकाश मनु ने “एक दुर्जेय मेधा” शीर्षक पुस्तक लिखी और संपादित की है जिसे वाणी प्रकाशन,दिल्ली ने २००१ में प्रकाशित किया है.

विष्णु खरे के अनेक साहित्यिक लेख, अनुवाद, साक्षात्कार आदि कई पत्र-पत्रिकाओं में छपे हैं किन्तु अभी पुस्तकाकार प्रकाशित नहीं हुए हैं.

नवभारत टाइम्स के अपने उपरोक्त कार्यकाल में विष्णु खरे ने जो सम्पादकीय  और लेख लिखे हैं उनकी संख्या एक हज़ार से भी अधिक है.इसके अतिरिक्त उन्होंने अन्य अख़बारों में  भी लिखा है.यह सामग्री भी अभी असंकलित है.

उनके कुछ पत्रकारितापरक लेख और साक्षात्कार जर्मनी और स्विट्ज़रलैंड के अखबारों में भी जर्मन  में आए हैं.

पाइअनिअर, हिंदुस्तान टाइम्स, फ्रंटलाइन, बिब्लिओ जैसे भारतीय अंग्रेज़ी अखबारों  और पत्रिकाओं में भी विष्णु खरे ने फिल्मों और साहित्य  पर लिखा है और वह भी अभी पुस्तकाकार नहीं आया है.

यात्राएं

विष्णु  खरे ने पिछले चालीस वर्षों में तत्कालीन चेकोस्लोवाकिया, रूस, कज़ाकस्तान, दुबई, जर्मनी, ब्रिटेन, आयरलैंड, ऑस्ट्रिया, हंगरी, क्रोआशिया, इटली, स्विट्ज़रलैंड, फ्रांस, लीबिया, डेनमार्क, फिनलैंड, एस्टोनिया, बेल्जियम, हॉलैंड तथा अमेरिका आदि देशों की अनेक यात्राएं की हैं.

उन्होंने चेकोस्लोवाकिया, जर्मनी, ब्रिटेन, हंगरी, पोलेंड, हॉलेंड, फिनलैंड आदि देशों में विश्वविद्यालयों में व्याख्यान दिए हैं, काव्य-पाठ किए हैं, रेडिओ-टेलीविज़न-अखबारों में साक्षात्कार दिए हैं या हिंदी साहित्य पढ़ाया है. हॉलैंड के लाइडेन विश्वविद्यालय में वे अंतेवासी कवि रहे.

वे हिंदी के एकमात्र फिल्म-पत्रकार हैं जिन्हें फ़्रांस के प्रतिष्ठित कान एवं ला रोशेल अंतर्राष्ट्रीय फिल्म-समारोहों में आधिकारिक रूप से आमंत्रित किया गया है.हॉलैण्ड के रोत्तर्दम अंतर्राष्ट्रीय फिल्म-समारोह में भी वे समीक्षक के रूप में भाग ले चुके हैं.

भारत पर केंद्रित दोनों (1986/2006) फ्रांकफुर्ट विश्व पुस्तक मेलों में हिंदी लेखक के रूप में शिरकत.

उन्होंने लन्दन में हुए विश्व  हिन्दी सम्मेलन में भी हिस्सा लिया है.

तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी के पत्रकार-दल के सदस्य के रूप में वे १९८६ में उनके सीरिया, पश्चिम जर्मनी, राष्ट्र-संघ,न्यूयॉर्क तथा हंगरी दौरे में साथ थे. राजीव गाँधी की हत्या से पहले उनके  आखिरी उत्तर भारतीय चुनाव दौरे में विष्णु खरे उनसे साक्षात्कार लेने वाले अंतिम हिंदी पत्रकार थे.

सम्मान-पुरस्कार आदि

हंगरी का एंद्रे ऑदी वर्तुलपदक ( मिडेल्यन)

हंगरी का अत्तिला योझेफ़ वर्तुलपदक

दिल्ली  राज्य सरकार का साहित्य  सम्मान

रघुवीर  सहाय पुरस्कार

मध्य प्रदेश शिखर सम्मान

मैथिलीशरण गुप्त सम्मान

भवभूति अलंकरण

फ़िनलैंड का एक सर्वोच्च राष्ट्रीय  सम्मान “नाइट ऑफ़ दि वाइट रोज़ ऑफ़ फ़िनलैंड”

मुम्बई की कला-संस्कृति-साहित्य संस्था “परिवार” का 2011 का “हिंदी काव्य सेवा” पुरस्कार

(यह सूचनाएँ 12 नवंबर 2011 तक की हैं.)

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