पुरुषोत्तम अग्रवाल होंगे वर्धा के हिंदी विश्वविद्यालय के नए कुलपति!

Sanjeev Chandan : क्या पुरुषोत्तम अग्रवाल 29 जनवरी को हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति पद पर आसीन हो जायेंगे…….! मेरे पास उपलब्ध मंत्रालय के नोटशीट से यह स्पष्ट है कि सम्भवतः २८ जनवरी के पहले हिंदी विश्वविद्यालय को नए कुलपति मिल जायेंगे। मंत्रालय ने सरनेम के वर्णक्रम से ५ नाम राष्ट्रपति भवन को भेज दिए हैं।

हालांकि मंत्रालय के नोटशीट के अनुसार हिंदी विश्वविद्यालय के नए कुलपति पद के प्रबल दावेदार गिरीश्वर मिश्र और राधाबल्लभ त्रिपाठी हैं। ऐसा इसलिए है कि हिंदी भाषा के नाम पर बने इस विश्वविद्यालय का यह दुर्भाग्य है कि इसे शुरू से ही सेक्सन ऑफिसर रैंक के अधिकारी, जो प्रोन्नत होकर अंडर सेक्रेटरी रैंक तक जाता है, के हवाले छोड़ दिया जाता है। आज यह अंडर सेक्रेटरी उमेश सिंह के हवाले है, इसके पहले इसी रैंक के अधिकारी सहाय के हवाले था। पिछले १५ सालों से इन्हीं दो अधिकारियों ने इसे अपनी नियति तक पहुँचाया है।

इस बार उमेश सिंह अपने करीबी (कुछ लोग रिश्तेदार भी बताते हैं) विभूति राय के इशारे पर इस लो प्रोफाइल वि वि के मामले में मानव संसाधन विकास मंत्री और मंत्रालय के बड़े अधिकारीयों को नचाते रहे हैं। पिछले ५ महीनों में उन्होंने पूरी कोशिश की है कि विभूति राय को विजिलेंस की तरफ से छुटकारा दिलवाया जाय और उन्हें अगले कार्यकाल की दौड़ में बनाये रखा जाय। हालांकि वे ऐसा नहीं कर पाये और थोडा मामला अटका रह गया। साथ ही विभूति के नाम के आगे विजिटर नॉमिनी अशोक वाजपेयी का डिसेंट नोट तथा हमसब के द्वारा इन्हें दुबारा कार्यविस्तार न दिए जाने के लिए भेजे गए पत्रों का उल्लेख उन्हें करना पड़ा। विजिलेंस जांच के बहुत से मामलों में उमेश कुमार के शातिर खेल ने मंत्रालय को विभूति के साथ खड़ा कर दिया है , जिसके कारण हमें जन हित याचिका में जोर लगाना पड़ेगा। एक मजेदार क्लीन चीट एक प्राध्यापिका को बैक डेट से दी गई डिग्री के मामले में इस आधार पर दिया गया है कि हमने अपनी शिकायत में अपने आरोप के समर्थन में कोई कागज़ नहीं लगाए थे। भाई विजिलेंस जाँच कर रहे हो हमें नोटिस भेजते , हम कागजात भी उपलब्ध कार देते। ऐसे ही शातिर बचाव किये हैं उमेश सिंह ने राय के। तब भी वह अंतिम हद तक राय को क्लीन चीट नहीं दिलवा सके।

यही कारण है कि कुलपति पद के प्रवल दावेदार , जिन्हें राय और उनका खेमा शत्रु मान रहा है , पुरुषोत्तम अग्रवाल ,का खेल बिगाड़ने में उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ रखी है. अपना बिगड़ता खेल देखकर राय का खेमा गिरीश्वर मिश्र पर दांव चल रहा है , जिन्हें याद नहीं उन्हें याद दिला दूं कि यह वही गिरीश्वर मिश्र हैं, जिनके भाई साहब भाजपा के राज्यसभा सांसद हुआ करते थे, संसद में अपना लोटा लेकर जाते थे पानी पीने के लिए और वहाँ कि नियुक्तियों में बडी संख्या इनके कुनबे की है। पुरुषोत्तम अग्रवाल जी का नाम अशोक वाजपेयी ने एक दो उदाहरणों के साथ पैनल में डाला था कि यू पी एस सी के कुछ सदस्य सेवानिवृत्ति के बाद महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्त हुए हैं. इसके बाद भीकानून मंत्रालय से मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने कानूनी स्थिति जाननी चाही। मंत्रालय ने दिसंबर में अग्रवाल जी का रास्ता साफ़ कर दिया। इसके बाद फिर राय के खेमे ने सवाल खड़े किये , राय के साथ मिलजुलकर काम कर रहे अंडर सेक्रेटरी ने अटॉर्नी जनरल की राय के लिए फ़ाइल फिर से लटका दी। सुना है कि वहाँ से भी अग्रवाल साहब का रास्ता साफ़ हो गया है। पटना हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के कुछ निर्णयों के हवाले से।

अब राय का खेमा गिरीश्वर मिश्र के लिए दूसरे तरीके अपना रहा है। इतने फ़ाइल नोटिंग के बाद मिश्र भी अग्रवाल साहब के बराबर आकर खड़े हैं। गेंद राष्ट्रपति के पाले में है। पिछली बार अंडर सेक्रेटरी ने राय साहब को तीन महीने का सेवाविस्तार दिलवाने की मुहीम पहले से ही चला रखी थी। सबकुछ फ़ाइल नोटिंग से स्पष्ट है। अग्रवाल साहब के मामले के हवाले से वह राष्ट्रपति से तीन महीने का सेवाविस्तार दिलवा पाने में सफल भी हुए। इन तीन महीनों में पुलिसिया तिकड़मबाज ने और भी अवैध गतिवधियों को संचालित किया , विरोधियों को ठिकाने लगाया। इस बार नोटिंग में जल्दीबाजी का करने का संकेत है ताकि २८ जनवरी तक वि वि को नया कुलपति मिले। सवाल है कि क्या २९ को पुरुषोत्तम अग्रवाल हिंदी वि वि के नए कुलपति पद पर आसीन हो पाएंगे।

संजीव चंदन के फेसबुक वॉल से.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *