पुलिस की दारू पीकर चीफ रिपोर्टर ने पेंटा को मार गिराया छपवा दिया

: संस्मरण : मेरठ से नवभारत टाइम्स के दिल्ली आफिस तबादला होने पर यहां आने के बाद मुझे बताया गया कि फिलहाल ब्यूरो में जगह खाली नहीं है इसलिए मैं कुछ दिन लोकल में काम करूं। मैं काम पर लग गया। एक रात दुर्गा पूजा पंडालों पर चितरंजन पार्क में आतंकी हमला हो गया तो राजेंद्र माथुर जी ने मुझे इस की रिपोर्टिंग के लिए भेज दिया। मैं वहां से समाचार लाया। माथुर जी घर जा चुके थे।

मैंने उन्हें फोन पर सारी जानकारी दी तो माथुर जी ने केवल इतना कहा कि संयत हो कर समाचार लिख दो। इस समाचार के लिए पहला पेज रोका हुआ था। मैं चीफ सब के पास ही बैठ कर समाचार लिखने लगा और एक एक पेज लेकर चीफ सब उसे कंपेजिेग के लिए भेजने लगा कि इस बीच चीफ रिपोर्टर झूमते हुए आए और आदेश दिया कि पहले समाचार मुझे दिखाया जाए। चीफ सब ने कह दिया कि अब समय नहीं है, अगर समाचार देखना है तो कंपोजिंग में जा कर देख लें।

चीफ रिपोर्टर कंपोजिंग में गए और आ कर मुझे आदेश दिया कि इस समाचार में लिखो कि दुर्दांत आतंकी पेंटा भी मारा गया। मैंने कहा कि मेरे पास ऐसी कोई सूचना नहीं है। मैंने एक दो संवाददाताओं से पूछा तो उन्होंने भी ऐसी कोई सूचना होने से इंकार किया। समाचार पूरा हो गया था तो चीफ सब भी पेज फाइनल कर चला गया। अब चीफ रिपोर्टर ने एक और संवाददाता से मेरी खबर का पहला पैरा बदलवाया और उस में पेंटा के मारे जाने की बात लिखवा दी।

साथ ही हैडिंग में भी जोड़ दिया कि पेंटा भी मारा गया और पेज रिफलांग कर भेज दिया। हालांकि यह चीफ रिपोर्टर का काम नहीं था मगर अंदर जो अंगूर की बेटी बैठी थी, उसने यह सब सोचने ही नहीं दिया। मैंने माथुर जी को फोन पर सारा घटनाक्रम बता दिया मगर अब कुछ हो नहीं सकता था। माथुर जी ने कहा कि पेंटा के बारे में पूरी तरह कन्फर्म कर लें। मैंने उन्हें बता दिया कि पेंटा नहीं मारा गया है। अगले दिन नवभारत टाइम्स दो समाचारों के साथ छपा। आधे अखबारों में पेंटा मारा गया और आधे अखबारों में पेंटा का कोई जिक्र ही नहीं था।

पता यह चला कि चितरंजन पार्क इलाके के डी. सी. पी. ने चीफ रिपोर्टर को बुलाया। दारू पिलाई। और भी कुछ डील अवश्य हुई होगी। डी. सी. पी. ने आग्रह किया कि पेंटा के मारे जाने का समाचार लगा दें ताकि जनता में रोष कम हो तथा सरकार में भी दिल्ली पुलिस की किरकिरी न हो। पेंटा नाम का कोई आतंकी तो क्या कोई चूहा भी नहीं मारा गया था। माथुर जी ने अगले दिन चीफ रिपोर्टर को बुलाया। उनके पास कोई जवाब तो था नहीं अपने बचाव के लिए। बस माफी मांगने लगे।

माथुर जी ने कहा कि काम तो आपने ऐसा किया है कि नौकरी से ही निकाल दिया जाए मगर आप की आयु और बच्चों का भविष्य देखते हुए आपका तबादला जयपुर किया जाता है। चीफ रिपोर्टर के लिए जयपुर भी काला पानी था क्योंकि दिल्ली में तो शाम के सारे जुगाड़ थे जयपुर में यह सब बहुत शीघ्र नहीं होने वाला था सो पंद्रह दिन का अवकाश लेकर दिल्ली में ही रहने की जोड़ तोड़ में लग गए। चारों ओर से दबाव डलवाया मगर माथुर जी नहीं माने तो एक दिन उन्होंने तुरूप का पत्ता चल दिया।

वह पत्ता यह था कि एक दिन चीफ रिपोर्टर की पत्नी अपनी दो बेटियों के साथ माथुर जी के घर पहुंच गईं और बताया कि दोनों बेटियों की शादी तय हो गई है और एक लड़का है, वह भी बाप के पद चिन्हों पर चल रहा है, अगर ये जयपुर चले गए तो शादी रुक जाएगी। माथुर जी भले आदमी थे। यह दांव काम कर गया और बेटियों की शादी तक चीफ साहब का जयपुर जाना रोक दिया। शादियां हो गईं मगर चीफ साहब बीमार पड़ गए। फालिज का भी असर हो गया था। जबान लड़खड़ाने लगी थी।

दरअसल मुफ्त की भरपेट शराब ने उनका शरीर खोखला कर दिया था। इस बीच माथुर जी का क्रोध भी कम हो गया था। अब माथुर जी इतने निर्दयी भी नहीं थे कि उन्हें जयपुर जाने को कहें। चीफ साहब का पीना जारी रहा और अंततः उनके गुर्दे जवाब दे गए और वह इस संसार से ही विदा हो गए। एक बार मैंने उन्हें अकेले में पूछ लिया था कि अखिर उन्होने पेंटा के बारे में इतना बड़ा रिस्क किस आधार पर ले लिया था। मेरा सवाल सुन कर वह उदास हो कर बोले- ''डाक्टर साहब, बस कुछ मत पूछो, कुछ बातें बताने लायक नहीं होतीं, बस ये समझ लो कि वह डी. सी. पी. हरामी आदमी था।''

लेखक डॉ. महर उद्दीन खां वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं. रिटायरमेंट के बाद इन दिनों दादरी (गौतमबुद्ध नगर) स्थित अपने घर पर रहकर आजाद पत्रकार के बतौर लेखन करते हैं. उनसे संपर्क 09312076949 या maheruddin.khan@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.


क्लिक करें, कुछ और पढ़ें..

भड़ास पर डा. महर उद्दीन

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *