पुलिस ने ‘ब्लैकमेलर’ कहा तो मुंह बंद, मैंने सच कहा तो बखेड़ा?

: सबसे पहले मैंने मीडिया कर्मियों से ही पूछा- “बदायूं के एक आला पुलिस अफसर अभी मीडिया में भी ब्लैकमेलरों की मौजूदगी की बात कह रहे थे…यह सही है या नहीं?” अधिकांश ने गर्दन “हां” में ही हिलाई। मुझे लगा चलो, आज किसी अफसर ने मुंह पर ब्लैकमेलर कहा, और मीडिया बिना किसी विरोध के पचा गयी। यही बहुत बड़ी बात है। वरना अक्सर मीडिया को अपनी बुराई “हजम” नहीं होती है :

खाकी वर्दी पर मौजूद बदनामी की सलवटों को हटाने के लिए उत्तर प्रदेश पुलिस इन दिनों मीडिया से रु-ब-रु हो रही है। सूबे की सल्तनत जानना चाहती है, कि आखिर पुलिस हमेशा मीडिया को निशाने पर क्यों रखती है? कमी किसमें है- मीडिया में या पुलिस का मीडिया प्रबंधन सुचारु ढंग से नहीं हो पा रहा है। इसी माथापच्ची के लिए 18 मई 2013 को बरेली जिला पुलिस लाइन में मीडिया और पुलिस इकट्ठी हुई। इस बातचीत का आयोजन उत्तर प्रदेश सूचना विभाग और राज्य पुलिस के संयुक्त प्रयासों से किया गया था।

राज्य पुलिस की ओर से पुलिस मुख्यालय (लखनऊ) में जनसंपर्क प्रमुख नित्यानन्द राय और शासन की तरफ से उप-निदेशक (सूचना) डॉ. अशोक कुमार शर्मा सहित बरेली परिक्षेत्र के पुलिस महानिरीक्षक मुकुल गोयल, बरेली के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक आकाश कुलहरि सहित बरेली, बदायूं, मुरादाबाद के पुलिस पीआर से जुड़े पुलिस महकमे के तमाम अफसरान मौजूद थे। मीडिया की ओर से वरिष्ठ पत्रकार सद्गुरु शरण, चंद्रकांत त्रिपाठी जैसी और भी तमाम शख्शियतें मौजूद थीं।

चर्चा शुरु हुई। पुलिस का कहना था, कि मीडिया उसके पीछे पड़ा रहता है। पुलिस के गुडवर्क को अधिकांशत: मीडिया नजरंदाज करता है। अपराध की खबर को कुछ इस तरह परोसा जाता है, जैसे क्राइम अपराधी ने नहीं, पुलिस ने किया हो। मीडिया का अपना पक्ष था कि, जब पुलिस अपराध करती नहीं है। पुलिस को अपना गुडवर्क हाइलाइट न होने का दर्द है। तो फिर अपराध होने के बाद पुलिस उसे छिपाने की कोशिश क्यों करती है? शहर-कस्बे में आपराधिक घटना की जानकारी पुलिस मीडिया को विलंब से क्यों देती है? अपराध की जानकारी पुलिस आधी-अधूरी क्यों मुहैया कराती है? इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को क्यों घंटों इंतजार करना होता है, एक अदद बाइट का?

मुद्दा चर्चा का था। चर्चा के लिए पुलिस-मीडिया इकट्ठे हुए थे। खूब चर्चा हुई। दोनो पक्षों ने अपनी-अपनी बात रखी। धीरे-धीरे चर्चा इस हद तक जा पहुंची कि, बदायूं से बैठक में हिस्सा लेने आये एक पुलिस अधिकारी ने कह दिया कि-“मीडिया में ब्लैकमेलिंग होती है। कुछ लोग अपने स्वार्थों के लिए मीडिया में काम करते हैं।” इस आला पुलिस अफसर ने इसके साथ ही मौजूद मीडिया वालों से ही सवाल दागा- “बताईये भाईयों आप ही बताईये क्या मैं गलत बात कह रहा हूं? क्या मीडिया में कुछ लोग ब्लैकमेलिंग नहीं करते हैं?” इस पर सभागार में मौजूद मीडिया कर्मियों ने उस पुलिस अफसर के सवालों के जबाब में “मुंह बंद” रखकर, उसके समर्थन में “गर्दनें” हिला दीं।

मतलब मीडिया ने मान लिया कि, हां गलत लोग सब जगह हैं। मीडिया में भी और पुलिस में भी। इस पूरे सत्र के दौरान मैं खामोश रहा। मूकदर्शक बनकर ध्यान से देखता रहा, उन मीडियाकर्मियों के चेहरे, जिनपर तरह-तरह के भाव आ-जा रहे थे। चाहकर भी मगर बिचारे पुलिस अफसर की बात को सिरे से नकार/काट नहीं पा रहे थे। शायद इसलिए, क्योंकि वो पुलिस अधिकारी सच उगल रहा था। बिना किसी लाग-लपेट के। वो सच, जिसे उगलने की औकात शायद कभी किसी पुलिस या सरकारी अधिकारी-कर्मचारी की नहीं हो सकती है। क्योंकि हम “मीडिया” हैं। हमसे भिड़ने या हमारे मुंह पर हमारी ही बुराई उगलने का मतलब, ऐसी-तैसी से सामना होना तय है।

तमाम पुलिस अफसरों और मीडिया कर्मियों को जब मैं सुन चुका तो उसके बाद मुझे भी बोलने को बुलाया गया। सच यह है कि, मैं शुरू में बोलना भी नहीं चाहता था। मेरा मन था, कि सभागार में मौजूद ज्यादा से ज्यादा लोगों को सुनकर पहले खुद का “ज्ञानार्जन” कर लूं। उसके बाद ही कुछ बोलूंगा। इससे मुझे यह लाभ होने वाला था, कि पहले के वक्ताओं का स्तर मैं समझ सकूं। मीडिया और पुलिस के बीच कुत्ता-घसीटी क्यों होती है? किस हद तक हो सकती है मीडिया और पुलिस के बीच धींगामुश्ती? 23 साल से अपराध पत्रकारिता करने के चलते मुझे इन सवालों के जबाब अच्छी तरह मालूम थे। कुछ देर सुनने-देखने के बाद मुझे इस बात का भी अंदाजा लग गया था, कि चर्चा में मौजूद कुछ पत्रकार बंधु मुझसे पत्रकारिता के अनुभव में तो काफी वरिष्ठ हैं, लेकिन अपराध और खोजी पत्रकारिता के लिहाज से वहां मेरे बराबर अनुभव का कोई भी नहीं था। वरिष्ठ पत्रकार चंद्रकांत त्रिपाठी और सद्गुरु शरण ने मीडिया की कमियों पर खुलकर विचार रखे। इन दोनो ही वरिष्ठों का मत था, कि पुलिस को पीआर सीखने की अगर जरूरत है, तो मीडिया को भी अब ट्रेनिग देने की नौबत आ चुकी है। पुलिस का हाल अगर बेहाल है तो कम बुरा हाल मीडिया का भी नहीं है।

खैर छोड़िये। मैंने बोलना शुरु किया। बिना किसी लाग-लपेट और चासनी के। सीधा-सपाट। सबसे पहले मैंने मीडिया कर्मियों से ही पूछा- “बदायूं के एक आला पुलिस अफसर अभी मीडिया में भी ब्लैकमेलरों की मौजूदगी की बात कह रहे थे…यह सही है या नहीं?” अधिकांश ने गर्दन “हां” में ही हिलाई। मुझे लगा चलो, आज किसी अफसर ने मुंह पर ब्लैकमेलर कहा, और मीडिया बिना किसी विरोध के पचा गयी। यही बहुत बड़ी बात है। वरना अक्सर मीडिया को अपनी बुराई “हजम” नहीं होती है। इसके बाद मैंने मीडियाकर्मियों से ही पूछा- कि भारत के संविधान में किस पृष्ठ पर लिखा है कि, मीडिया लोकतंत्र का चौथा खंभा है? यह ऐसा सवाल था, जिस पर कुछ वरिष्ठ पत्रकारों ने तो तुरंत असहमति जाहिर कर दी, लेकिन अधिकांश बगलें झांक रहे थे। शायद उन्हें कम से कम अपने ही परिवार (मीडिया वाले से) के सदस्य से तो इस सवाल की उम्मीद कतई नहीं रही होगी। वह भी तमाम पुलिस अफसरों-सिपाहियों के बीच में।

इसके बाद मैंने कहा कि, दूध के धुले न हम हैं (मीडिया) और न पुलिस दूध की धुली है। कमियां सब में हैं। इस पर भी मौजूद पुलिस-मीडिया ने सहमति में ही सिर हिलाया। इस पूरी बातचीत/ चर्चा में मैंने कहीं भी यह चीज उजागर नहीं होने दी, कि मेरा बरेली से कोई ताल्लुक है। इसकी कोई जरूरत भी नहीं थी। वजह शायद यह रही है, कि जब से (सन् 1990) दिल्ली का रुख किया, बरेली से करीब-करीब वास्ता बहुत कम सा ही हो गया। दूसरी वजह बरेली से अपना कोई रिश्ता न खोलने की वजह यह थी, कि मुझे बरेली की पुलिस या फिर प्रशासन से कभी कोई “फटीक” भी नहीं करानी थी। बरेली के पुलिस, प्रशासन और मीडिया में कोई एक आदमी ऐसा निकलकर सामने आये, जिससे मैंने अपने पत्रकारिता के 23 साल के करियर में कभी किसी फटीक (काम) को निपटाने के लिए संपर्क किया हो! तो अब यह बताओ कि, पुलिस-मीडिया की चर्चा के दौरान भला मैं यह क्यों जाहिर करता, कि मेरा बरेली से कोई वास्ता था या है? चुपचाप गया और चर्चा में हिस्सा लेकर वापिस दिल्ली आ गया।

सुना है कि, मेरे बरेली से इस चर्चा में हिस्सा लेकर कुरुक्षेत्र लौट आने के बाद कुछ मीडियाकर्मियों की सांस फूल रही है। इनमें मैं पूरे बरेली शहर के मीडियाकर्मियों का जिक्र कतई नहीं कर रहा हूं, क्योंकि बरेली में जो वरिष्ठ मीडियाकर्मी मुझे जानते हैं, वो यह भी जानते हैं, कि संजीव चौहान का नाम उन्होंने कभी भी “दलाली” में नहीं सुना होगा। न ही शहर का ऐसा कोई वरिष्ठ मीडियाकर्मी होगा, जो यह कहे कि, मैंने कभी उस सहयोगी से कभी बरेली शहर पुलिस या प्रशासन के स्तर का कोई सहयोग मांगा हो। फिर पुलिस लाइन में सच के सिवा कुछ भी न बोलने पर, वहां मौजूद तमाम वरिष्ठों को छोड़कर, कई छुटभैय्यों के पेट में दर्द क्यों है? इस बात को लेकर कि संजीव चौहान दिल्ली से आकर यह कह गया और वह कह गया। अगर मेरे कहे का इतना दर्द है, पीठ पीछे मेरे बारे में तमाम तरह की बकैतियां करने वालों, उस समय तुम्हारी मर्दानगी ने क्यों नहीं अंगड़ाई ली, जब एक पुलिस अफसर तुम्हारे मुंह पर कह गया कि, मीडिया में भी कुछ लोग ब्लैकमेलिंग का धंधा करते हैं। अगर बहुत बड़े शुभचिंतक और मीडिया के मठाधीश थे, तो कर देते चर्चा का बहिष्कार। क्यों नहीं उठकर चले आये चर्चा में से। सब कुछ ठीक-ठाक हो जाने के बाद अब क्यों लाठी पीट रहे हो, कि संजीव चौहान यह कह गया, वो कह गया। दिल्ली से मीडिया को कोस गया बरेली में आकर संजीव चौहान। संजीव चौहान ने नहीं बताई यह बात कि, उनका बरेली से ताल्लुक है। यह सब तो उसी समय ओकना था। उस समय संजीव चौहान को देखकर क्यों तुम्हारी घिग्‍घी बंध गयी थी जो, कुछ नहीं बोल सके मेरे सामने। बताना यह भी चाहूंगा, कि इस चर्चा में मौजूद कुछ

संजीव चौहान
वरिष्ठ पत्रकारों को छोड़कर, वहां मौजूद कई ऐसे भी हमपेशा थे, जिन्होंने मेरा पत्रकारिता का करियर शुरू होने के आसपास ही “तुतलाना” छोड़ा होगा।

लेखक संजीव चौहान की गिनती देश के जाने-माने क्राइम रिपोर्टरों में होती हैं. वे पिछले दो दशक से पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं. ये लेख इनके ब्‍लॉग क्राइम वॉरियर पर प्रकाशित हो चुका है, वहीं से साभार लिया गया है. इनसे संपर्क patrakar1111@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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