पूंजी के हाथ में आम आदमी को नोंचने की ताकत थमाकर सरकार असहाय है

: पेट्रोल की कीमतें बढ़ाकर सरकार ने मंहगाई के एक तूफ़ान को दावत दी है : अभी १० साल पहले जो पेट्रोल ३० रुपये प्रति लीटर के हिसाब से बिकता था, अब वही ८० रुपये प्रति लीटर के आस पास पंहुच गया है. कुछ इलाकों में ८० से थोडा कम है तो कुछ इलाकों में ८० पार कर गया है. पेट्रोल की कीमतें बढ़ने से खाने की हर चीज़ महंगी होगी इसमें दो राय नहीं है. अगर यह बढ़ोतरी कायम रह गयी तो महंगाई का एक और तूफ़ान पक्के तौर पर आने वाला है. सन २००२ के आसपास ही सरकार ने निजी सेक्टर को पेट्रोल और डीज़ल की मार्केटिंग में कंट्रोलिंग मुकाम दे दिया था. उसके बाद से पेट्रोल की कीमतों में हर साल बढ़ोतरी होती रही है. केवल मार्च २००३ में पेट्रोल २५ रुपये के आस पास आया था लेकिन तीन महीने बाद ही ३५ रुपये के ऊपर पंहुच  गया था.

पेट्रोल की कीमतों में वृद्धि के तर्क को समझने के लिए किसी भी पार्टी को ज़िम्मेदार ठहराना या दूसरी पार्टी को बरी करने का कोई मतलब नहीं है. यूपीए और एनडीए, दोनों ही पार्टियां एक ही तरह की राजनीति की पोषक हैं. उनकी आर्थिक नीतियाँ पूंजीवादी आर्थिक सोच का ही नतीजा हैं. कीमतों का बढ़ना और आम आदमी का पिसना इस तरह की आर्थिक सोच का स्थायी भाव है. इसलिए यह कहना कि किसी सरकार ने बढ़ाया या किसी पार्टी ने बढ़ाया बेमतलब है. पिछले २५ साल से जिस तरह की आर्थिक सोच का दौर चल रहा है उसमें विकास की इमारत  निश्चित रूप से आम आदमी की कुर्बानी की बुनियाद पर ही खडी होगी. इस पृष्ठभूमि को दिमाग में बैठा लेने के बाद महंगाई का अर्थशास्त्र अच्छी तरह से समझ में आने लगेगा.

इस बार जब पेट्रोल की कीमत में करीब १० प्रतिशत की वृद्धि हुई तो सरकार की तरफ से कहा गया कि इस केस में सरकार कुछ नहीं कर सकती है क्योंकि पेट्रोल अब सरकारी कंट्रोल से मुक्त है और उसकी कीमत को घटाने-बढ़ाने का काम सरकार के कंट्रोल से बाहर है. कांग्रेस के नेता कहते फिरते हैं कि पेट्रोल  की कीमतें अब अन्तरराष्ट्रीय बाज़ार के हिसाब से निर्धारित होंगीं. लेकिन सरकार में शामिल पार्टी तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी कहती हैं कि यह गलत तर्क है. उन्होंने अपने बयान में कहा कि कच्चे तेल की कीमत १२५ डालर प्रति बैरल से घटकर १०८ डालर प्रति बैरल हो गयी तो पेट्रोल की कीमत बढ़ाने का क्या मतलब है.

ममता बनर्जी का भी अजीब तर्क विधान है. कहती हैं कि सरकार ने पेट्रोल की कीमतें बढ़ाने के पहले उनसे सलाह नहीं की. यानी अगर उनसे सलाह ली होती तो उन्हें कोई एतराज़ न होता. जब भी दाम बढ़ते हैं ममता बनर्जी अपनी नाराज़गी जताती ज़रूर हैं लेकिन बढ़ी हुई कीमतों में से एक मामूली हिस्सा जब कम कर दिया जाता है तो वे कहती हैं उन्होंने सरकार पर दबाव डाल कर कीमतें कम कारवा लीं. उनको उम्मीद रहती है कि उनके इस रुख से उनके मतदाताओं पर प्रभाव पड़ेगा. शायद पड़ता भी हो लेकिन सही बात यह है कि जनता हर तरह की राजनीतिक तिकड़म में बेवक़ूफ़ ही बनती है. पेट्रोल की कीमतें बढ़ाने का मामला भी ऐसा ही है.

इस बुधवार को हुई मूल्यवृद्धि के बाद कांग्रेस के एक बड़े नेता का बयान सबसे ज्यादा निराशाजनक है. उन्होंने कहा कि पेट्रोल की कीमतें बढ़ाना कंपनियों का काम है और सरकार असहाय है. सरकार की यह असहायता ही आम आदमी के लिए सबसे बड़ी चिंता की बात है. बड़ी पूंजी के हाथ में देश के आम आदमी को नोचने की ताक़त थमा कर जब सरकार असहाय बनती है  तो बहुत मुश्किल होती है. दरअसल स्वार्थ और तिकड़म की इस दुनिया में सरकार ही आम आदमी के हितों की रक्षक होती है लेकिन जब वह कुछ नहीं कर सकती तो देश की जनता को लूट के सौदागरों के हाथ में जाने के लिए मजबूर होना पड़ता है. आज वही हालत है. लेकिन उससे भी बड़ा दुर्भाग्य यह है कि देश की राजनीति में कोई भी आवाज़ ऐसी नहीं है जो लूट के अर्थशास्त्र से अवाम को निजात दिलाने की कोशिश कर सके. मौजूदा सरकार पर नियंत्रण रखने के काम सबसे ज्यादा यूपीए गठबंधन में शामिल पार्टियों का है. उनका रुख सामने आ ही गया है.

ममता बनर्जी कहती हैं कि उनसे सलाह लिए बिना दाम बढ़ा दिए गए हैं और दूसरी बड़ी पार्टी डीएमके है जो कहती है कि दाम बढ़ाना गलत है लेकिन उसकी वजह से सरकार से अलग होने का सवाल ही नहीं पैदा होता. इसका कारण शायद यह है कि पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के सबसे बड़े पैरोकार देश की विदेशमंत्री जब भारत आती हैं तो सबसे पहले ममता बनर्जी से मिलती हैं और उन्हें अपने देश के व्यापार के रास्ते में पड़ रही अड़चनों को दूर करने के लिए कहती हैं. ममता बनर्जी को अमरीकी सरकार और व्यापार की दुनिया बहुत ही सम्मान से देखती है इसलिए उनसे यह उम्मीद करना कि वे अमरीकी हितों के खिलाफ जायेगीं, नामुमकिन है. अमरीकी विदेशमंत्री ने जब उनसे फ़रियाद की कि उनके देश की बड़ी कंपनियों को खुदरा व्यापार में भारत में पाँव जमाने दिया जाए तो तृणमूल कांग्रेस की बॉस ने विचार करने का भरोसा दे दिया. जानकार बताते हैं कि उसके बाद ही अपने देश में अमरीकी एकाधिकारवादी कंपनियों को बहुत बड़ा बाज़ार नज़र आने लगा है. ज़ाहिर है कि तृणमूल कांग्रेस के लोग अमरीकी हितों को ध्यान में रख कर ही किसी भी राजनीतिक पार्टी का विरोध करेंगे.

यूपीए की दूसरी बड़ी पार्टी है कि डीएमके, उसके नेता एम करूणानिधि ने भी पेट्रोल की कीमतों में वृद्धि का बिगुल बजा दिया है लेकिन सबको मालूम है कि वह बस बिगुल ही बिगुल है. उसका नतीजा कुछ भी नहीं होने वाला है. इसका कारण यह है कि करूणानिधि की पार्टी और परिवार के नेता तरह-तरह के भ्रष्टाचार के मामलों में फंसे हैं. अगर केंद्र की सरकार को गुस्सा आ गया तो करुणानिधि का परिवार के राजनीतिक ताक़त के रूप में शून्य हो जाएगा. इसलिए वे भी केवल रस्मी विरोध करके अलग हो जायेंगे. उनको भी मालूम है कि अगर उनके सर से केंद्र सरकार का साया हट गया तो वे कहीं के नहीं रह जायेंगे और राजनीतिक रूप से उनको ठिकाने लगाने के मौके की तलाश कर रही तमिलनाडू की मुख्यमंत्री जयललिता उनको तबाह कर देंगीं.

देश को महंगाई की आग में झोंकने में बीजेपी की भूमिका कम नहीं है. जिस तरह के अर्थशास्त्र को मनमोहन सिंह ने देश के गले में लटका दिया है महंगाई उसी के गर्भ से पैदा होती है. यह काम डॉ. मनमोहन सिंह ने पीवी नरसिम्हा राव की सरकार में वित्त मंत्री के रूप में करना शुरू किया था. आज उसे वे उस मुकाम तक पंहुचा चुके हैं जहां से उस से निजात पाना लगभग  नामुमकिन है. बीजेपी वाले नेता वैसे तो डॉ. मनमोहन सिंह का विरोध करते हैं लेकिन उनकी आर्थिक राजनीति का कभी भी कोई विरोध नहीं करते, क्योंकि वे भी उसी राजनीति के पोषक हैं, क्योंकि दुनिया भर में शासक वर्गों की पार्टियां पूंजीवादी अर्थव्यवस्था का समर्थन करती हैं. विपक्ष की राजनीति पर नज़र रखने वाले लोगों का कहना है बीजेपी ने कभी भी मनमोहन सिंह के अर्थशास्त्र का विरोध नहीं किया है. उनकी पार्टी के सत्ता में बने रहने का और कांग्रेस के राजनीतिक कुप्रबंध का तो बीजेपी के प्रवक्ता बहुत ही शक्तिशाली विरोध करते हैं लेकिन जिस तरह की आर्थिक नीतियाँ कांग्रेस को चला रही है उसके कभी विरोध नहीं करते.

सही बात यह है कि यह शासक वर्ग की हर पार्टी की डिजाइन में ही होता है. अपने देश में आम आदमी की पार्टी नहीं है. कम्युनिस्ट पार्टियां जो आम आदमी के संघर्षों का हरावल दस्ता बन सकती थी वे बुरी तरह से सांचाबद्ध सोच से ग्रस्त हैं, समकालीन समाज की किसी भी सच्चाई को समझने के लिए उन्हें कई दशक लगते हैं और बहुत बाद में उन्हें पता लगता है कि जिस दोषपूर्ण तरीके से वे अपनी राजनीति को चला रहे थे वह वास्तव में एक बहुत बड़ी राजनीतिक भूल थी. आम आदमी की भलाई के बारे में क्षेत्रीय पार्टियों से उम्मीद की जा सकती थी. लेकिन देखने में आया है कि ज़्यादातर क्षेत्रीय पार्टियां आपनी स्वायत्तता को केंद्र सरकार में हिस्सा लेने की लालच में किसी बड़ी पार्टी के यहाँ गिरवी रख देती हैं और वे भी वही भाषा बोलने लगती हैं, जो पूंजीवादी अर्थशास्त्र की लूट वाली व्यवस्था को संभाल सके.

कई बार ऐसा भी देखा गया है कि क्षेत्रीय असमानता के नारे के साथ राज्यों की सत्ता में आई पार्टियां रिश्वत के मैदान में केंद्रीय पार्टियों को भी पीछे छोड़ जाती हैं. सबसे ताज़ा उदहारण उत्तर प्रदेश की पिछली सरकार का है जो सामाजिक बराबरी स्थापित करने के नारे के साथ सत्ता में आई थी लेकिन आर्थिक भ्रष्टाचार की दुनिया में बड़े-बड़े रिकार्ड स्थापित करने में सफलता पायी. ऐसे और भी उदाहारण बहुत ही आसानी से मिल जायेंगे. सवाल यह उठता है कि चारों तरफ फैल रहे राजनीति के इस अँधेरे में क्या इस देश का आम आदमी तबाह हो जाने के लिए अभिशप्त है या उसको बाहर निकलने के लिए कोई रास्ता मिलेगा. क्या महंगाई पर काबू करने का कोई तरीका विकसित होगा या अब जनता गरीबी की हर रेखा के नीचे धकेल दी जायेगी.

इसका जवाब है. तरीका है लेकिन क्या अपनी मौजूदा राजनीतिक बिरादरी उस तरीके को अपना पायेगी. तरीका यह है कि आर्थिक नीतियों और उपभोक्ता की सुरक्षा के लिए उत्पादन और वितरण के काम पर सामाजिक नियंत्रण होना बहुत ज़रूरी है. उसको निजी पूंजी के लाभ कमाने की प्राथमिकता वाले तंत्र से बाहर लाना पडे़गा. अपने देश में यह व्यवस्था कायम थी. आजादी के बाद जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में हमारे राष्ट्र के संस्थापकों ने मिश्रित अर्थव्यवस्था की बात की थी. देश के आर्थिक विकास के लिए वही माडल भी बनाया था लेकिन हमारे हुक्मरानों ने ९० के दशक से उसको तबाह करने का काम शुरू किया और आज वह ख़त्म हो चुकी है. आम आदमी  को प्रभावित करने वाले महत्वपूर्ण क्षेत्रों में निजी कंपनियों का दबदबा है और उनके सामने बिलकुल लाचार है.

ऐसी हालत में सरकार को सामाजिक नियंत्रण के ढाँचे को मज़बूत करने के लिए नेहरू के सोशलिस्टिक पैटर्न आफ सोसाइटी के माडल को लागू करना होगा. अगर ऐसा न हुआ तो लोकतंत्र नाम के लिए तो रहेगा लेकिन आम आदमी की भागीदारी उस में बिलकुल नहीं रहेगी. और जब आम आदमी की भागीदारी नहीं होगी तो आम आदमी उस सत्ता से निजात पाने के लिए कुछ भी कर सकता है. अरब दुनिया में आम आदमी की शिरकत के बिना चल रही तथाकथित लोकतंत्रीय हुकूमतों के साथ जो हो रहा  है, वह दुनिया के किसी भी देश में हो सकता है. इसलिए केंद्र की सरकार को चाहिए कि वह पेट्रोल की बढ़ी हुई कीमतों को फ़ौरन वापस ले क्योंकि कहने को तो पेट्रोल कारों में लगती है लेकिन उसके बाद महंगाई चारों तरफ बढ़ती है.

लेखक शेष नारायण सिंह वरिष्‍ठ पत्रकार तथा स्‍तम्‍भकार हैं. वे एनडीटीवी, जागरण, जनसंदेश टाइम्‍स समेत कई संस्‍थानों में वरिष्‍ठ पदों पर रह चुके हैं. इन दिनों दैनिक देश बंधु को वरिष्‍ठ पद पर अपनी सेवाएं दे रहे हैं.

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