मुद्रित शब्दों के प्रति अपनी गहरी आस्था, अपने सामाजिक सरोकार, पत्रकारिता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता और आने वाले समय की आहट को पहले से पहचानने की क्षमता रखने वाले हमारे समय के समृद्ध पत्रकार रवीन्द्र शाह को गुजरे दो साल हो गये। कभी न अस्त होगा ‘रवि’ कार्यक्रम के जरिये लगातार दो साल से मित्रगण रवीन्द्र शाह स्मृति प्रसंग के जरिये ऐसा कुछ कर रहे हैं जो रवि को पसंद था। 27 फरवरी शिवरात्रि के दिन इंदौर के जॉल आडिटोरियम में ‘पत्रकारिता, कार्पोरेट कल्चर, न्यू मीडिया’ पर विमर्श हुआ। भेरू सिंह चौहान के कबीर के भजनों के बाद प्रारंभ हुए इस विमर्श के प्रारंभ में रवीन्द्र शाह का मृत्यु पूर्व के कुछ दिन पहले का एक ऑडियो दिखाया गया जिसमें रवीन्द्र शाह कह रहे हैं-
''आज भले ही ढेरो न्यूज पोर्टल और न्यूज चैनल आ गए हों, लेकिन छपे हुए शब्दों की ताकत आज भी कायम है। लोग भले ही पहली बार खबर वेबसाइट पर देखें या टीवी न्यूज पर, परंतु वास्तविक खबर के लिए वे अखबार पर विश्वास करते हैं। जब तक मीडिया की क्रेडिट और साख बरकरार रहेगी, मीडिया किसी भी रूप में सामने आए, इससे कोई फर्क नही पड़ेगा। हमें इस साख को बनाए रखने के लिए काम करना पड़ेगा।''
रवीन्द्र शाह की इस बात को विजय मोहन तिवारी, यशवंत सिंह, श्रीवर्द्धन त्रिवेदी ने आगे बढाया। रवीन्द्र शाह ने अपनी असामयिक मृत्यु 21 फरवरी 2012 के करीब एक माह पूर्व रायपुर में संगवारी समूह जो सोशल मीडिया ‘फेसबुक’ पर एक बडा विचार समूह है, के वार्षिक पुरस्कार समारोह में 'नये मीडिया और निजता' को लेकर बहुत ही चौकाने वाले संकेत दिये थे।

रवीन्द्र शाह से अपनी गहरी मित्रता, आत्मीयता के चलते मेरा जुड़ाव दिन प्रतिदिन बढता गया और मृत्यु के बाद भी यह बना हुआ है। रवि के कारण तीन साल से फरवरी इंदौर की होकर रह गई है। इस बार कार्पोरेट कल्चर और सोशल मीडिया पर गोष्ठी में बोलने के लिए बाकायदा एक परचा तैयार किया जो समयाभाव के कारण पढा नहीं जा सका। वो पर्चा यहां रख रहा हूं ताकि मीडिया के बड़े आडियेंस तक यह पहुंच सके।
सुभाष मिश्रा
प्रशासनिक अधिकारी, पत्रकार, रंगकर्मी
संपर्क: [email protected]
पत्रकारिता, कार्पोरेट कल्चर, न्यू मीडिया
-सुभाष मिश्रा-
हम जिस दौर में मीडिया की बात पर कर रहे हैं, वह दौर पूरी तरह से बाजार आधारित व्यवस्था का दौर है। बड़ी पूंजी के जरिये मीडिया नियंत्रित हो रहा है। बड़े-बड़े समूह का प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से हमारे मीडिया पर कब्जा है। इसी समय एक और मीडिया हमारे सामने है, जिसे हम सोशल मीडिया या वैकल्पिक मीडिया भी कहते हैं। इस मीडिया ने अरब देशों में सामाजिक जागरूकता के लिए जो काम किया है उसे हम 'अरब स्प्रिंग' या 'अरब बसंत' के नाम से जानते हैं।
इसी मीडिया ने अमेरिका में वालस्ट्रीट पर कब्जा किया हुआ है। वालस्ट्रीट से आशय नये माध्यम की वह स्क्रीन है जिसे सब देखते हैं। हमारे देश के अन्ना हजारे के आंदोलन के दौरान इसकी ताकत को लोगों ने महसूस किया। इस मीडिया में लोगों ने परिर्वतन की ताकत को महसूस किया। इसे प्रतिरोध का मीडिया भी कहा जा रहा है। ये मीडिया बिना बड़ी पूंजी के निवेश के परिर्वतन का कारगर हथियार के रूप में हमारे सामने है। जिनको लगता है की हमें अपनी अभिव्यक्ति के लिए उचित माध्यम नही मिल रहा है, वे सभी लोग सोशल मीडिया की वॉल पर अपनी अभिव्यक्ति को उजागर कर रहे हैं। सोशल मीडिया के जरिये आज बहुत बड़ा लोकतांत्रिक स्पेस बना है। इसमें कोई भी आकर भागीदारी कर सकता है। जो व्यक्ति सड़क पर आकर प्रदर्शन नही कर सकता, वो व्यक्ति भी सोशल मीडिया के जरिए अपनी बात रख सकता है। सोशल मीडिया से डेमोक्रेटिक स्पेस बना है। सोशल मीडिया के दुरूपयोग को लेकर भी इन दिनों काफी बात हो रही है। किसी प्रकार का कोई अंकुश या एडिट समीक्षा, चयन नहीं होने के कारण बहुत सारे लोग इसका मनमाना उपयोग कर रहे हैं। इलेक्ट्रानिक, वेब, सोशल मीडिया के आने के पहले भी हमारे यहां परंपरागत सोशल मीडिया था जो गीत-संगीत, नुक्कड़ नाटक, ताीज-त्यौहार पर होने वाले जनजुड़ाव से हमें जोड़ता था। लोकमान्य बालगंगाधर तिलक द्वारा प्रारंभ गणेशोत्सव इसकी सबसे जीती-जागती मिसाल है।
हम जिस समय में जी रहे हैं, उस समय में ऐसा कुछ भी ग्लोबल नही है जो स्थानीयता लिए न हो। कल तक के सारे जमीनी संघर्ष अब जमीन पर नहीं होकर संस्कृति खासकर पापुलर सांस्कृतिक क्षेत्रों में तय होते हैं, मीडिया तय करता है। मीडिया यथार्थ (सच) का निर्माण भी करता है इसी तरह परिदृश्य में उसको नष्ट भी करता है। जब वह एक यथार्थ का निर्माण कर रहा होता है तो दूसरी तरफ उसे नष्ट कर रहा होता है। यथार्थ को नष्ट करना ही उसका उद्देश्य नहीं है, बल्कि एक भ्रामक यथार्थ निर्मित करके वह पाठकीय/दर्शकों की सोच भी अप्रभावित रखना चाहता है।
मालिक और नौकर (पत्रकार) की मानवीय सरोकारों की पक्षधरता अलग-अलग है। मालिक छद्म मानवीय या छद्म मानवीय सरोकारों को वास्तविक की तरह प्रस्तुत करता है। किसी बड़े कारपोरेट के बड़े फायदे के लिए शासन या किसी दूसरे घराने के खिलाफ मानवीय सरोकार का इस्तेमाल अंतत: सरोकारों के खिलाफ ही जाता है। जब तक एक जागरूक नागरिक इस मानवीय सरोकार के छल के समझने लगता है तो नव्य मीडिया और नागरिक संबंधो में विभाजन पैदा होता है। इन दिनों नव्य मीडिया का परंपरागत भरोसा नये जागरूक नागरिक से खत्म होता जा रहा है। हमे संबंधों के इस अंतर्द्वंद्व को समझना होगा। इस बाजार समय में औद्योगिक घरानों ने पूंजी को शक्ति में बदला है इसलिए मीडिया को खरीदने, बनाने और बदलने की तरकीबें और हिम्मत पैदा की है और सफलता भी हासिल की है। इसलिए इस बाजार समय में संपादक मैनेजर में तब्दील हो गया है। शक्ति या पावर मालिक के पास चला गया है। क्योंकि अब जरूरत विचार को पैदा करने या फैलाने में नहीं उसकी खरीद फरोख्त की रह गई है। मैनेजर का काम विचार की प्राथमिकता हो सकता है लेकिन व्यवसाय के लिए मालिक की व्यवसायिक बौद्धिक क्षमता ही उपयोगी है।
जहां तक सोशल मीडिया का सवाल है वहां यह बात गौर करने योग्य है की ‘सोशल मीडिया के साथ एक दिक्कत यह है कि वह आंदोलन को बड़ा और खड़ा तो कर लेता है, लेकिन वह नारे में तब्दील हो जाता है, विचार के अभाव में। विचार के बगैर आंदोलन भीड़ में तब्दील होता है। विचार के साथ आंदोलन सार्थक परिणाम तक पहुंचता है। गांधी के विचार के साथ आंदोलन शुरू करने वाले अन्ना के पास विचार नहीं सिर्फ इक्का-दुक्का मांग और नारे का आंदोलन था। ऐसे आंदोलन की उम्र ज्यादा नहीं होती ।
मीडिया की भूमिका और छबि निरंतर बदल रही है क्योंकि उसकी पक्षधरता पूंजी के सरोकार तय कर रहे हैं। इसलिए कई बार मीडिया किसी एक की छबि बड़ा बनाती है तो पक्षधरता बदलते ही वह बड़ी छबि को नष्ट करने पर भी उतारू हो जाता है। केजरीवाल आंदोलन और तहलका प्रकरण इसके ताजा उदाहरण हैं।
एक तरफ मीडिया यथार्थ का या सच का निर्माण भी करने लगा है और दूसरी तरफ परोक्ष में वह उसको नष्ट भी करता है, क्योंकि उसके लिए उसके हित सर्वोपरि हैं। मीडिया की स्थापना में भी अब बडी पूंजी अपरिहार्य हो गई है। खासकर इलेक्ट्रानिक मीडिया में। ऐसे में प्रखर बौद्धिक पत्रकार या संपादक अपनी अनिवार्यता प्रमाणित तो करते हैं लेकिन व्यक्तिगत स्तर पर। और अपनी क्षमता और ज्ञान का निजी मूल्य हासिल करके सामूहिक शक्ति को कमजोर करते हैं। जो मीडिया ज्यादा लचीला होगा और सामान्य नागरिक की चेतना में बदलाव से बचता है और खुद को प्रासंगिक बनाए रखने के खटकरम
जानता है वही केन्द्र में रहता है। इसलिए ऐसे मीडिया घराने अपने बौद्धिक छल, वर्गीयहित ओर पूंजीपति घराने या शासक वर्ग से गठबंधन को छिपाने में कामयाब हो जाते हैं, वे एक कथित पावन छवि के साथ प्रस्तुत होते हैं, लोकप्रिय होते हैं।
सुभाष मिश्र प्रशासनिक अधिकारी के रूप में छत्तीसगढ़ में पदस्थ होने के साथ साथ एक रंगकर्मी और पत्रकार के रूप में भी बेहद सक्रिय रहते हैं. उनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.
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