पूरे विश्व से चुने गए दस पत्रकारों में से एक हैं प्रियंका दुबे

Samar Anarya : प्रेरणास्पद होते हुए भी महान लोगों की आम लोगों को डराने वाली कहानियाँ साझा करना हमेशा थोड़ा सा अजीब लगा मुझे.. इसलिए क्योंकि उनमे अक्सर वे विशिष्ट थे, हमसे शायद न हो पाए वाला भाव छुपा होता है. और ठीक इसीलिए हमारे आपके घरों से आने वाली अदम्य जिजीविषा, संघर्ष और हौसलों की परवाज की दास्तान हमेशा आकर्षित करती रही. पर वे इतनी मिलती कहाँ हैं? और उसमे में स्त्रियों की? इतने लम्बे दौर में याद करूँ तो सिर्फ 2 लड़कियों की कहानी साझा की.

पहली बम्बई के रेड लाइट डिस्ट्रिक्ट की एक एक देवदासी की बेटी श्वेता कट्टी की वहाँ से निकल बार्ड यूनिवर्सिटी पँहुच जाने की और दूसरी लखनऊ मेडिकल कॉलेज में 100 साल के रिकार्ड के साथ साथ ब्राह्मणवादियों की मेरिट का मिथक भी तोड़ 18 मेडल जीतने वाली वंदना की.

आज तीसरी कहानी साझा कर रहा हूँ. हिंदी पत्रकारिता को नए तेवर देने वाली Priyanka Dubey की कहानी… उस लड़की की कहानी जिसने यह बता कर चौंका दिया था कि अब तहलका हिंदी की कहानियाँ अक्सर अनूदित होकर तहलका अंग्रेजी में जाने लगी हैं. उसकी जिसकी नजर में दिल्ली से गायब होते गरीब मजलूम बच्चे भी हैं और असम के चाय बागानों में काम करती महिला श्रमिक भी…

प्रियंका की परवाज ने अभी एक और आसमान छू लिया है… थॉमसन रॉयटर्स फॉउंडेशन जर्नलिज्म ट्रेनिंग प्रोग्राम (रिपोर्टिंग वुमेन) के लिए पूरे विश्व से चुने गए 10 पत्रकारों में से एक हैं प्रियंका..

सो इस बार तो इस लड़की को जरा सा ही सही जानने के दर्प से लैस अपन बोलेंगे कि जियो प्रियंका.. दुनिया की तमाम दोस्तों की आँखों का जिन्दा सपना बनो प्रियंका.

अविनाश पांडेय 'समर' के फेसबुक वॉल से.

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