पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज पर एफआईआर के लिए लखनऊ के सीजेएम कोर्ट में आवेदन

लखनऊ : सामाजिक कार्यकर्ता डॉ नूतन ठाकुर ने आज सीजेएम लखनऊ के सामने पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज के विरुद्ध दो विधि स्नातकों द्वारा अपने पद और स्थिति का पूर्णतया नाजायज़ फायदा उठाते हुए यौन उत्पीडन करने के आरोपों के सम्बन्ध में एफआइआर कराये जाने हेतु 156(3) सीआरपीसी में प्रार्थनापत्र प्रस्तुत किया है. केस की सुनवाई सोमवार 18/11/2013 को होगी.

प्रार्थनापत्र के अनुसार एक सामाजिक कार्यकर्ता और एक दूसरे नेशनल ला यूनिवर्सिटी में अध्ययन कर रही विधि छात्रा की माँ के रूप में वह यह अपना दायित्व समझती हैं कि ऐसे गंदे लोगों के इन घिनौने कृत्यों के सम्बन्ध में एफआइआर दर्ज कराएं ताकि इसमें आगे कानूनी कार्यवाही हो सके.

डॉ ठाकुर ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश शासन एवं अन्य में हाल के निर्णय के अनुसार अब यह अनिवार्य है कि प्रत्येक संज्ञेय अपराध में एफआइआर तत्काल पंजीकृत हो.

उन्होंने पहले गोमतीनगर थाना, लखनऊ में एफआइआर दिया था और वहां से मना किये जाने पर धारा 154(3) सीआरपीसी के तहत एफआइआर दर्ज करने और सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन करने पर एसओ गोमतीनगर पर कार्यवाही की मांग की थी.

संलग्न- सीजेएम को प्रार्थनापत्र, एफआइआर तथा एसएसपी को पत्र की कॉपी

मा० न्यायालय मुख्य  न्यायिक मजिस्ट्रेट  जनपद लखनऊ

प्रार्थना पत्र संख्या-          /2013

थाना- गोमतीनगर  
     जनपद- लखनऊ

प्रार्थीगण का नाम और पता-  
डॉ नूतन ठाकुर, पत्नी- श्री अमिताभ ठाकुर, निवासी- 5/426, विराम खंड, गोमतीनगर, लखनऊ # 94155-34525

विपक्षीगणों के नाम-
 
1. उत्तर प्रदेश सरकार

2. अवकाशप्राप्त सुप्रीम कोर्ट जज

 धारा 156(3) सीआरपीसी के अंतर्गत मुक़दमा पंजीकृत करने के आदेश देने हेतु आवेदन पत्र

श्रीमान,

कृपया आपसे विनम्र निवेदन है-
1. कि मैं डॉ नूतन ठाकुर, पत्नी श्री अमिताभ ठाकुर, निवासी- 5/426, विराम खंड,गोमतीनगर, लखनऊ, फोन नंबर- 94155-34525 एक सामाजिक कार्यकर्ता हूँ.

2. कि मैंने अपने पत्र संख्या NT/SC/Judge/01 दिनांक-15/11/2013 द्वारा कोलकाता की नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ ज्यूरीडिकल साइंस से स्नातक पूर्व छात्रा और Natural Justice, Lawyers for Communities and the Environment नामक एनजीओ में कार्यरत सुश्री स्टेला जेम्स द्वारा हाल ही में सेवानिवृत एक सुप्रीम कोर्ट जज द्वारा पिछले साल 24/12/2012 को दिल्ली के एक होटल के कमरे में दुराचार करने तथा आज दिनांक 15/11/2013 को हिंदुस्तान टाइम्स के प्रकाशित एक अन्य समाचार “Now, another SC intern claims sexual harassment by retired judge” के अनुसार एक अन्य विधि छात्रा से एक अवकाशप्राप्त सुप्रीम कोर्ट जज पर यौन उत्पीडन का आरोप लगाये जाने के परिप्रेक्ष्य में इन्हें अत्यंत गंभीर संज्ञेय आपराधिक कृत्य होने के नाते एक युवा विधि छात्रा की माँ और सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में सीआरपीसी के प्रावधानों के अंतर्गत प्रथम सूचना रिपोर्ट अंकित करने हेतु थानाध्यक्ष, गोमतीनगर, लखनऊ को प्रार्थनापत्र दिया था.

3. कि मैंने मा० सुप्रीम कोर्ट द्वारा ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश शासन एवं अन्य (रिट याचिका (क्रिमिनल) संख्या 68/2008) में पारित निर्णय दिनांक 12/11/2013 के आवश्यक अंशों को प्रस्तुत करते हुए उसके अनुक्रम में तत्काल एफआइआर दर्ज कर इस सम्बन्ध में स्थापित नियमों और प्रक्रिया के तहत एफआइआर दर्ज कर प्रारम्भिक विवेचना में प्राप्त तथ्यों के आधार पर उसे सम्बंधित थानाक्षेत्र को संदर्भित करने हेतु निवेदन किया था

4. कि थानाध्यक्ष को प्रस्तुत अपने प्रार्थनापत्र में मैंने निवेदन किया था कि दिनांक 06/11/2013 को जर्नल ऑफ़ इंडियन ला एंड सोसायटी के वेबसाईट पर Through my Looking Glass नामक एक लेख छपा (http://jilsblognujs.wordpress.com/2013/11/06/through-my-looking-glass/) जो इसी साल कोलकाता की नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ ज्यूरीडिकल साइंस से स्नातक पूर्व छात्रा और Natural Justice, Lawyers for Communities and the Environment नामक एनजीओ में कार्यरत सुश्री स्टेला जेम्स द्वारा लिखा गया था. कालांतर में दिनांक 11/11/2013 को यह लेख लीगली इंडिया नामक एक अन्य वेबसाईट तथा अन्य समाचारों के माध्यम से पूरे देश में प्रसारित हुआ.

5. कि इस लेख के अनुसार इस युवा महिला विधि इंटर्न के साथ हाल ही में सेवानिवृत एक सुप्रीम कोर्ट जज ने पिछले साल दिसंबर में एक होटल के कमरे में उस समय दुराचार किया जब राजधानी सामूहिक दुष्कर्म की घटना से जूझ रही थी.

6. कि लेख के अनुसार वह दिल्ली में उस समय यूनिवर्सिटी के अंतिम वर्ष के शीतकालीन अवकाश के दौरान में इंटर्न थी और अंतिम सेमेस्टर के दौरान अत्यधिक प्रतिष्ठित, हाल ही में सेवानिवृत्त हुए सुप्रीम कोर्ट के जज के तहत काम कर रही थी. लेख में स्पष्ट लिखा है-“मेरी कथित कर्मठता के पुरस्कार के रूप में मुझे यौन उत्पीडन (शारीरिक नुकसान नहीं मगर हनन करने वाले) से एक वृद्ध व्यक्ति ने पुरस्कृत किया, जो मेरे दादा की उम्र का था. मैं उस पीडादायक विवरण का जिक्र नहीं करूंगी लेकिन इतना जरूरी कहूंगी कि कमरे से बाहर निकलने के काफी बाद तक मेरी स्मृति में वह अनुभव रहा और वास्तव में आज भी है.”

7. कि सुश्री स्टेला ने "लीगली इंडिया" वेबसाइट को दिए इंटरव्यू में पुनः आरोप लगाया कि दिसंबर 2012 में सुप्रीम कोर्ट के जज ने होटल के कमरे में उसके साथ दुराचार किया और इस घटना का कोई अन्य गवाह भी नहीं है. इस महिला ने अपने मूल लेख में हादसे में इस घटना की तारीख का जिक्र नहीं किया, लेकिन वेबसाइट को दिए इंटरव्यू में कहा कि यह पिछले साल 24 दिसंबर को हुआ था.

8. कि इसके अतिरिक्त दिनांक 15/11/2013 को हिंदुस्तान टाइम्स के प्रकाशित एक अन्य समाचार “Now, another SC intern claims sexual harassment by retired judge” के अनुसार एक अन्य विधि छात्रा ने एक अवकाशप्राप्त सुप्रीम कोर्ट जज पर यौन उत्पीडन का आरोप लगाया है. फेसबुक पर प्रस्तुत इस टिप्पणी को लीगली इंडिया वेबसाईट ने प्रस्तुत किया हो, यद्यपि लीगली इंडिया में दोनों रिपोर्ट लिखने वाले कियान गैन्ज़ ने इस दूसरी विधि छात्रा का नाम नहीं लिखा है. लीगली इंडिया के अनुसार-“she was “at the receiving end of unsolicited sexual advance more than once”. Both the interns knew each other, the report claimed.” (अर्थात यह छात्रा कई बार अवांछनीय यौन शोषण की शिकार हुई. ये दोनों विधि छात्रा एक दुसरे को जानती भी हैं).  
 
9. कि मैंने इस सम्बन्ध में आवश्यक अभिलेख साक्ष्य हेतु संलग्न कर प्रस्तुत किया और साथ ही चूँकि ये सीधे-सीधे अत्यंत गंभीर संज्ञेय आपराधिक कृत्य हैं अतः सीआरपीसी के प्रावधानों के अंतर्गत प्रथम सूचना रिपोर्ट अंकित करने हेतु यह प्रार्थनापत्र दिया.

10. कि मैंने निवेदन किया कि मैं यह एफआइआर एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में ही नहीं एक विधि की छात्रा तनया की माँ के रूप में भी प्रस्तुत करना अपना आवश्यक फर्ज और उत्तरदायित्व समझती हूँ जो इन्ही बच्चियों की तरह एक नेशनल ला यूनिवर्सिटी में अध्ययन कर रही है और इन्ही की तरह कई स्थानों पर इंटर्न बनेगी, क्योंकि मैं इन दोनों बच्चियों में अपनी बेटी तनया को देखती हूँ और मुझे इस बात से ही रौंगटे खड़े हो जा रहे हैं कि मा० सुप्रीम कोर्ट के अवकाशप्राप्त जज छोटी बच्चियों के साथ इस प्रकार की अत्यंत घिनौनी हरकत कर रहे हैं और कार्यवाही के नाम पर एफआइआर दर्ज कर उन पूर्व जजों को सलाखों के पीछे करने के बजाय मात्र जांच के नाम पर खानापूर्ति हो रही है.

11. कि यह विधि का स्थापित नियम है कि कुछ मामलों को छोड़ कर प्रथम सूचना रिपोर्ट कोई भी व्यक्ति अंकित कर सकता है और उसका स्वयं ही पीड़ित अथवा पीडिता होना कत्तई आवश्यक नहीं नहीं. यौन शोषण के प्रकरण उनमे नहीं आते जिसमे मात्र पीड़ित को ही एफआइआर का अधिकार हो. अतः उपरोक्त वर्णित पीडिता बच्चियों द्वारा ही एफआइआर हो तथा कोई अन्य ऐसा एफआइआर नहीं करा सके, ऐसा कोई नियम है ही नहीं और मा० न्यायालय इस बात से भली-भाँती भिज्ञ है जैसा Dr Subramaniam Swamy vs Dr Manmohan Singh and others (Civil Appeal No 1193/2012) सहित अनेकानेक प्रकरणों में मा० सर्वोच्च न्यायालय तथा मा० इलाहाबाद उच्च न्यायालय सहित विभिन्न मा० उच्च न्यायालयों ने बारम्बार आदेशित किया है. डॉ सुब्रमण्यम स्वामी (उपरोक्त) के अनुसार- “It was pointed out by the Constitution Bench of this Court in Sheonandan Paswan vs. State of Bihar and Others, (1987) 1 SCC 288 at page 315:”…It is now settled law that a criminal proceeding is not a proceeding for vindication of a private grievance but it is a proceeding initiated for the purpose of punishment to the offender in the interest of the society. It is for maintaining stability and orderliness in the society that certain acts are constituted offences and the right is given to any citizen to set the machinery of the criminal law in motion for the purpose of bringing the offender to book. It is for this reason that in A.R. Antulay v. R.S. Nayak this Court pointed out that (SCC p. 509, para 6)”punishment of the offender in the interest of the society being one of the objects behind penal statutes enacted for larger good of the society, right to initiate proceedings cannot be whittled down, circumscribed or fettered by putting it into a strait jacket formula of locus standi”

12. कि अवकाशप्राप्त जज पर यह घिनौना और गंभीर आरोप लगने के बाद मा० सुप्रीम कोर्ट के मा० मुख्य न्यायाधीश महोदय ने मामले की जांच के लिए तीन मा० न्यायाधीशों की कमेटी का गठन किया है पर जैसा कि क़ानून का नियन है, इस प्रकार की प्रशासनिक जांच अपनी जगह होती है और दांडिक अपराध और उसके सम्बन्ध में की जाने वाली कार्यवाही अपनी जगह. यद्यपि यह जांच कमिटी मा० भारत के मुख्य न्यायाधीश महोदय ने बनायी है लेकिन यह उन्होंने अपने प्रशासनिक अधिकारों के तहत बनाया है, यह मा० सर्वोच्च न्यायालय का कोई न्यायिक निर्णय नहीं है, जिसके आधार पर इस प्रकरण में कोई भी अग्रिम कार्यवाही निषिद्ध कर दी जाये क्योंकि विधि के स्थापित नियमों के अनुसार प्रशासनिक और न्यायिक आदेशों में स्पष्ट अंतर होता है.

13. कि अतः इन दोनों अत्यंत गंभीर और लोमहर्षक मामलों के सम्बन्ध में एफआइआर दर्ज किया जाना अत्यंत आवश्यक है विधि के स्थापित सिद्धांतों के पूर्णतया अनुकूल भी. अतः मैंने एक युवा विधि छात्रा की माँ और सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में यह प्रार्थनापत्र तत्काल एस सम्बन्ध में एफआइआर दर्ज किये जाने हेतु प्रस्तुत किया.

14. कि मैंने थानाध्यक्ष, गोमतीनगर को यह भी निवेदन किया कि चूँकि ये दोनों घटनास्थल आपके थाना क्षेत्र के नहीं हैं, अतः इस सम्बन्ध में स्थापित नियमों और प्रक्रिया के तहत एफआइआर दर्ज कर प्रारम्भिक विवेचना में प्राप्त तथ्यों के आधार पर उसे सम्बंधित थानाक्षेत्र को संदर्भित करने की कृपा करें.

15. कि यह तथ्य भी पूर्णतया स्थापित हो चूका है कि मात्र क्षेत्राधिकार के आधार पर कोई भी आपराधिक मुक़दमा लिखे जाने से कदापि मना नहीं किया जा सकता. धारा 154(1) सीआरपीसी इसे किसी प्रकार निषिद्ध नहीं करता है और मा० सर्वोच्च न्यायालय तथा मा० इलाहाबाद उच्च न्यायालय सहित विभिन्न मा० उच्च न्यायालयों के आदेशों से भी यह स्थापित हो चूका है. Satvinder Kaur vs State (Govt. Of N.C.T. Of Delhi) & (AIR 1999 SC 3596, 1999 (2) ALD Cri में मा० सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्टतया आदेशित किया था-“However, Sub-section (2) makes the position clear by providing that no proceeding of a police officer in any such case shall at any stage be called in question on the ground that the case was one which such officer was not empowered to investigate. After investigation is completed, the result of such investigation is required to be submitted as provided under Sections 168, 169 and 170. Section 170 specifically provides that if, upon an investigation, it appears to the Officer in charge of the police station that there is sufficient evidence or reasonable ground of suspicion to justify the forwarding of the accused to a Magistrate, such officer shall, forward the accused under custody to a Magistrate empowered to take cognizance of the offence upon a police report and to try the accused or commit for trial. Further, if the Investigating Officer arrives at the conclusion that the crime was not committed within the territorial jurisdiction of the police station, then F.I.R. can be forwarded to the police station having jurisdiction over the area in which crime is committed. But this would not mean that in a case which requires investigation, the police officer can refuse to record the FIR and/or investigate it” यही बात Navinchandra N Majithia vs State of Meghalaya (2000 SCC (Cri) 1510 का पृष्ठ 1513-14) में मा० सर्वोच्च न्यायालय ने पुनः कहा- “The Officer-in-charge has no escape from doing so if the offence mentioned therein is a cognizable offence, whether or not such offence was committed within the limits of that police station. But when the offence is non-cognizable, the officer-in-charge of the police station has no obligation to record it if the offence was not committed within the limits of his police station. Section 156(1) of the Code says that the said police officer can investigate any cognizable offence covered by the said FIR, if the said offence could be inquired into or tried by a Court having jurisdiction over the local area of that police station. If the offence was committed outside the limit of such police station, the officer-in-charge of the police station can transmit the FIR to the police station having such territorial jurisdiction. Various States have formulated rules for effecting transfer of such FIR in such contingencies.”

 
16. कि मैंने मा० सुप्रीम कोर्ट द्वारा ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश शासन एवं अन्य (रिट याचिका (क्रिमिनल) संख्या 68/2008) में पारित निर्णय दिनांक 12/11/2013, जिसमें यह स्पष्ट कर दिया है कि अब प्रत्येक थाने को प्रत्येक संज्ञेय अपराध में एफआइआर आवश्यक रूप से तत्काल पंजीकृत किया जाना आवश्यक है और ऐसा नहीं करने पर संबधित थानाध्यक्ष व्यक्तिगत रूप से कार्यवाही किये जाने के हकदार होंगे, के आवश्यक भाग भी सुलभ सन्दर्भ हेतु संलग्न किये थे.  

17. कि थाना गोमतीनगर पर मेरा आवेदनपत्र प्राप्त कर लिया गया और मुझे इसकी रिसीविंग दी गयी लेकिन उस पत्र में प्रस्तुत तथ्य प्रथमदृष्टया संज्ञेय अपराध बनने के बाद भी थाने के भारसाधक अधिकारी द्वारा प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज नहीं किया गया है.

18. कि मैंने पुनः दिनांक 15/11/201 को धारा 154(3) सीआरपीसी के अंतर्गत एक प्रार्थनापत्र वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, लखनऊ की सेवा में प्रथम सूचना रिपोर्ट अंकित करा कर अग्रिम कार्यवाही किये जाने हेतु जरिये डाक प्रेषित किया. वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को प्रेषित पत्र की प्रति संलग्नक दो के रूप में संलग्न है.

19. कि अंत में बाध्य हो कर तथा अन्य कोई विकल्प नहीं होने की दशा में मैं आपके समक्ष धारा 156(3) सीआरपीसी के तहत मुक़दमा पंजीकृत करने हेतु यह आवेदन पत्र प्रस्तुत कर रही हूँ.  
 
20. कि उपरोक्त तथ्यों एवं संलग्नक साक्ष्यों से यह स्पष्ट है कि विपक्षी संख्या दो द्वारा एक संज्ञेय अपराध कारित किया गया है जिस पर उसके विरुद्ध एफआइआर अंकित कर विवेचना किया जाना अत्यंत आवश्यक है, जिसमे तमाम साक्ष्य पुलिस द्वारा ही एकत्रित किया जा सकता है. अतः कृपया विनयपूर्वक यह अनुरोध है कि इस प्रार्थनापत्र में प्रस्तुत तथ्यों के आधार पर जो संज्ञेय अपराध कारित होता बताया जा रहा है, कृपया उसे उचित धाराओं में पंजीकृत कर नियमानुसार अग्रिम विवेचना किये जाने तथा आवश्यक समझे जाने पर सम्बंधित थानों को विवेचना अग्रसारित किये जाने हेतु थानाध्यक्ष, गोमतीनगर, जनपद लखनऊ को आदेशित करने की कृपा करें. मैं इसके लिए आपकी अत्यंत आभारी होउंगी.

प्रार्थना-

समस्त साक्ष्यों के दृष्टिगत प्रस्तुत प्रार्थनापत्र  के आधार पर प्रथम सूचना  रिपोर्ट अंकित करने  एवं  विवेचना किये जाने हेतु थानाध्यक्ष, गोमतीनगर, जनपद लखनऊ को आदेशित करने की कृपा करें.  
         भवदीया,
 
स्थान- लखनऊ               डॉ नूतन ठाकुर
दिनांक- 16/11/2013       प्रार्थी (इन-पर्सन)

मा० न्यायालय मुख्य न्यायिक  मजिस्ट्रेट, जनपद लखनऊ

प्रार्थना पत्र संख्या-          /2013
     थाना- गोमतीनगर  
     जनपद- लखनऊ
डॉ नूतन ठाकुर        ……………..प्रार्थी
बनाम  
उत्तर प्रदेश सरकार, सुप्रीम कोर्ट के अवकाशप्राप्त जज   —————-प्रतिवादीगण
धारा 156(3) सीआरपीसी के अंतर्गत आवेदन पत्र के समर्थन में शपथपत्र
मैं, नूतन ठाकुर, पत्नी श्री अमिताभ ठाकुर, निवासिनी 5/426, विराम खंड, गोमतीनगर, लखनऊ # 94155-34525, सशपथ बयान करती हूँ

    कि शपथी इस मामले में एक मात्र प्रार्थी और मुक़दमावादी है तथा इस रूप में वह इस मुकदमे से सम्बंधित समस्त तथ्यों से भलीभांति परिचित है.

    कि शपथी ने अपने पत्र संख्या NT/SC/Judge/01 दिनांक-15/11/2013 द्वारा कोलकाता की नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ ज्यूरीडिकल साइंस से स्नातक पूर्व छात्रा और Natural Justice, Lawyers for Communities and the Environment नामक एनजीओ में कार्यरत सुश्री स्टेला जेम्स द्वारा हाल ही में सेवानिवृत एक सुप्रीम कोर्ट जज द्वारा पिछले साल 24/12/2012 को दिल्ली के एक होटल के कमरे में दुराचार करने तथा आज दिनांक 15/11/2013 को हिंदुस्तान टाइम्स के प्रकाशित एक अन्य समाचार “Now, another SC intern claims sexual harassment by retired judge” के अनुसार एक अन्य विधि छात्रा से एक अवकाशप्राप्त सुप्रीम कोर्ट जज पर यौन उत्पीडन का आरोप लगाये जाने के परिप्रेक्ष्य में इन्हें अत्यंत गंभीर संज्ञेय आपराधिक कृत्य होने के नाते एक युवा विधि छात्रा की माँ और सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में सीआरपीसी के प्रावधानों के अंतर्गत प्रथम सूचना रिपोर्ट अंकित करने हेतु थानाध्यक्ष, गोमतीनगर, लखनऊ को प्रार्थनापत्र दिया था.

    कि थानाध्यक्ष को प्रस्तुत अपने प्रार्थनापत्र में शपथी ने विभिन्न तथ्यों और मा० सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश शासन (उपरोक्त) के आदेशों के अनुक्रम में स्थापित विधि के सिद्धांतों के तहत मेरे प्रार्थनापत्र पर एफआइआर दर्ज कर अग्रिम कार्यवाही किये जाने हेतु निवेदन किया था.

    कि मेरे द्वारा प्रस्तुत तथ्य प्रथमदृष्टया सीधे तौर पर संज्ञेय अपराध बनने के कारण प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करते हुए अग्रिम कार्यवाही किये जाने हेतु निवेदन किया था. मैंने अपनी कही गयी बातों के साक्ष्य हेतु कतिपय अभिलेखों की छायाप्रति संलग्न कर प्रेषित किया था.

    कि थाना गोमतीनगर पर शपथी का आवेदनपत्र प्राप्त कर लिया गया और उसे इसकी रिसीविंग दी गयी लेकिन उस पत्र में प्रस्तुत तथ्य प्रथमदृष्टया सीधे तौर पर शासकीय धन की चोरी और गबन और जनसेवकों द्वारा अपने पद का खुला दुरुपयोग करते हुए भ्रष्ट आचरण करने की बात लिखी होने और इस प्रकार संज्ञेय अपराध बनने के बाद भी थाने के भारसाधक अधिकारी द्वारा प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज नहीं किया गया है.

    कि शपथी ने पुनः दिनांक- 15/11/2013 को धारा 154(3) सीआरपीसी के अंतर्गत एक प्रार्थनापत्र वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, लखनऊ की सेवा में प्रथम सूचना रिपोर्ट अंकित करा कर अग्रिम कार्यवाही किये जाने हेतु जरिये डाक प्रेषित किया.   

    कि अंत में बाध्य हो कर तथा अन्य कोई विकल्प नहीं होने की दशा में शपथी धारा 156(3) सीआरपीसी के तहत मुक़दमा पंजीकृत करने हेतु यह आवेदन पत्र प्रस्तुत कर रही है.

    कि उपरोक्त तथ्यों एवं संलग्नक साक्ष्यों से यह स्पष्ट है कि विपक्षी संख्या दो द्वारा एक संज्ञेय अपराध कारित किया गया है जिस पर उसके विरुद्ध प्रथम सूचना रिपोर्ट अंकित कर विवेचना किया जाना अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि इसमें तमाम साक्ष्य पुलिस द्वारा ही एकत्रित किया जा सकता है. अतः कृपया विनयपूर्वक यह अनुरोध है कि इस प्रार्थनापत्र में प्रस्तुत तथ्यों के आधार पर जो संज्ञेय अपराध कारित होता बताया जा रहा है, कृपया उसे उचित धाराओं में पंजीकृत कर नियमानुसार अग्रिम विवेचना किये जाने तथा आवश्यक समझे जाने पर सम्बंधित थानों को विवेचना अग्रसारित किये जाने हेतु थानाध्यक्ष, गोमतीनगर, जनपद लखनऊ को आदेशित करने की कृपा करें. मैं इसके लिए आपकी अत्यंत आभारी होउंगी.

    कि मेरे द्वारा इस मामले में अपनी बुद्धि और अपनी जानकारी के अनुसार कोई भी आवश्यक तथ्य ना तो छिपाया गया है और ना ही उन्हें गलत रूप ने प्रस्तुत किया गया है
    कि मेरे द्वारा प्रस्तुत अभिलेख भी अपने मूल अभिलेखों की वास्तविक छायाप्रति है

दिनांक- 16/11/2013         शपथकर्त्री  
लखनऊ                     
       सत्यापन
आज दिनांक 16/11/2013 समय       को जिला कचहरी लखनऊ में उपस्थित आ कर अपना हस्ताक्षर बनाया. उपरोक्त शपथपत्र में शपथी द्वारा कोई भी तथ्य छिपाया नहीं गया है. शपथपत्र के साथ संलग्न साक्ष्य शपथी के निजी ज्ञान एवं संज्ञान में सत्य हैं.
दिनांक- 16/11/2013        शपथकर्त्री  


लखनऊ
सेवा में,
वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक,
जनपद लखनऊ,  
उत्तर प्रदेश  
विषय- धारा 154(3) सीआरपीसी में एफआइआर दर्ज करने हेतु    
महोदय,
 कृपया निवेदन है कि मैंने अपने पत्र संख्या- NT/SC/Judge/01 दिनांक-15/11/2013 द्वारा कोलकाता की नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ ज्यूरीडिकल साइंस से स्नातक पूर्व छात्रा और Natural Justice, Lawyers for Communities and the Environment नामक एनजीओ में कार्यरत सुश्री स्टेला जेम्स द्वारा हाल ही में सेवानिवृत एक सुप्रीम कोर्ट जज द्वारा पिछले साल 24/12/2012 को दिल्ली के एक होटल के कमरे में दुराचार करने तथा आज दिनांक 15/11/2013 को हिंदुस्तान टाइम्स के प्रकाशित एक अन्य समाचार “Now, another SC intern claims sexual harassment by retired judge” के अनुसार एक अन्य विधि छात्रा से एक अवकाशप्राप्त सुप्रीम कोर्ट जज पर यौन उत्पीडन का आरोप लगाये जाने के परिप्रेक्ष्य में इन्हें अत्यंत गंभीर संज्ञेय आपराधिक कृत्य होने के नाते एक युवा विधि छात्रा की माँ और सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में सीआरपीसी के प्रावधानों के अंतर्गत प्रथम सूचना रिपोर्ट अंकित करने हेतु थानाध्यक्ष, गोमतीनगर, लखनऊ को प्रार्थनापत्र दिया था. मैंने मा० सुप्रीम कोर्ट द्वारा ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश शासन एवं अन्य (रिट याचिका (क्रिमिनल) संख्या 68/2008) में पारित निर्णय दिनांक 12/11/2013 के आवश्यक अंशों को प्रस्तुत करते हुए उसके अनुक्रम में तत्काल एफआइआर दर्ज कर इस सम्बन्ध में स्थापित नियमों और प्रक्रिया के तहत एफआइआर दर्ज कर प्रारम्भिक विवेचना में प्राप्त तथ्यों के आधार पर उसे सम्बंधित थानाक्षेत्र को संदर्भित करने हेतु निवेदन किया था.  
थानाध्यक्ष गोमतीनगर द्वारा इस सम्बन्ध में मा० सर्वोच्च न्यायालय के स्पष्ट आदेशों के बावजूद एफआइआर दर्ज नहीं किया गया और मात्र “उत्तर प्रदेश पुलिस प्राप्ति रसीद शिकायती प्रार्थनापत्र” क्रम संख्या 28310 मुझे दे दिया जो स्पष्टतया मा० सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों का उल्लंघन है.  
अतः मैं यह पत्र आपके सम्मुख धारा 154(3) सीआरपीसी के प्रावधानों के अंतर्गत थानाध्यक्ष गोमतीनगर को प्रस्तुत प्रार्थनापत्र की प्रति (संलग्नक तथा रसीद सहित) इस अनुरोध से प्रेषित कर रही हूँ कि कृपया तत्काल विधि के अनुसार इस सम्बन्ध में एफआइआर दर्ज करा कर अग्रिम कार्यवाही कराया जाना सुनिश्चित करें. साथ ही मा० सर्वोच्च न्यायालय द्वारा उपरोक्त आदेश का उल्लंघन करने के सम्बन्ध में थानाध्यक्ष गोमतीनगर के विरुद्ध कार्यवाही किया जाना भी सुनिश्चित करें.  
पत्र संख्या- NT/SC/Judge/02        भवदीय,
दिनांक-15/11/2013
          (डॉ नूतन ठाकुर )
                5/426, विराम खंड,
          गोमती नगर, लखनऊ  
          # 94155-34525

सेवा में,
थानाध्यक्ष,
थाना गोमतीनगर,
लखनऊ, उत्तर प्रदेश  
विषय- मा० सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश शासन एवं अन्य में पारित निर्णय के आलोक में पूर्व न्यायाधीश, सुप्रीम कोर्ट के विरुद्ध यौन उत्पीडन का एफआइआर दर्ज करने हेतु    
महोदय,
 कृपया निवेदन है कि दिनांक 06/11/2013 को जर्नल ऑफ़ इंडियन ला एंड सोसायटी के वेबसाईट पर Through my Looking Glass नामक एक लेख छपा (http://jilsblognujs.wordpress.com/2013/11/06/through-my-looking-glass/) जो इसी साल कोलकाता की नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ ज्यूरीडिकल साइंस से स्नातक पूर्व छात्रा और Natural Justice, Lawyers for Communities and the Environment नामक एनजीओ में कार्यरत सुश्री स्टेला जेम्स द्वारा लिखा गया था. कालांतर में दिनांक 11/11/2013 को यह लेख लीगली इंडिया नामक एक अन्य वेबसाईट तथा अन्य समाचारों के माध्यम से पूरे देश में प्रसारित हुआ.
इस लेख के अनुसार इस युवा महिला विधि इंटर्न के साथ हाल ही में सेवानिवृत एक सुप्रीम कोर्ट जज ने पिछले साल दिसंबर में एक होटल के कमरे में उस समय दुराचार किया जब राजधानी सामूहिक दुष्कर्म की घटना से जूझ रही थी. जज पर यह आरोप लगने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले की जांच के लिए तीन जजों की कमेटी का गठन भी कर दिया है. लेख के अनुसार वह दिल्ली में उस समय यूनिवर्सिटी के अंतिम वर्ष के शीतकालीन अवकाश के दौरान में इंटर्न थी और अंतिम सेमेस्टर के दौरान अत्यधिक प्रतिष्ठित, हाल ही में सेवानिवृत्त हुए सुप्रीम कोर्ट के जज के तहत काम कर रही थी. लेख में स्पष्ट लिखा है-“मेरी कथित कर्मठता के पुरस्कार के रूप में मुझे यौन उत्पीडन (शारीरिक नुकसान नहीं मगर हनन करने वाले) से एक वृद्ध व्यक्ति ने पुरस्कृत किया, जो मेरे दादा की उम्र का था. मैं उस पीडादायक विवरण का जिक्र नहीं करूंगी लेकिन इतना जरूरी कहूंगी कि कमरे से बाहर निकलने के काफी बाद तक मेरी स्मृति में वह अनुभव रहा और वास्तव में आज भी है.” सुश्री स्टेला ने "लीगली इंडिया" वेबसाइट को दिए इंटरव्यू में पुनः आरोप लगाया कि दिसंबर 2012 में सुप्रीम कोर्ट के जज ने होटल के कमरे में उसके साथ दुराचार किया और इस घटना का कोई अन्य गवाह भी नहीं है. इस महिला ने अपने मूल लेख में हादसे में इस घटना की तारीख का जिक्र नहीं किया, लेकिन वेबसाइट को दिए इंटरव्यू में कहा कि यह पिछले साल 24 दिसंबर को हुआ था.  
इसके अतिरिक्त आज दिनांक 15/11/2013 को हिंदुस्तान टाइम्स के प्रकाशित एक अन्य समाचार “Now, another SC intern claims sexual harassment by retired judge” के अनुसार एक अन्य विधि छात्रा ने एक अवकाशप्राप्त सुप्रीम कोर्ट जज पर यौन उत्पीडन का आरोप लगाया है. फेसबुक पर प्रस्तुत इस टिप्पणी को लीगली इंडिया वेबसाईट ने प्रस्तुत किया हो, यद्यपि लीगली इंडिया में दोनों रिपोर्ट लिखने वाले कियान गैन्ज़ ने इस दूसरी विधि छात्रा का नाम नहीं लिखा है. लीगली इंडिया के अनुसार-“she was “at the receiving end of unsolicited sexual advance more than once”. Both the interns knew each other, the report claimed.” (अर्थात यह छात्रा कई बार अवांछनीय यौन शोषण की शिकार हुई. ये दोनों विधि छात्रा एक दुसरे को जानती भी हैं).  
मैं इस सम्बन्ध में आवश्यक अभिलेख साक्ष्य हेतु संलग्न कर रही हूँ. साथ ही चूँकि ये सीधे-सीधे अत्यंत गंभीर संज्ञेय आपराधिक कृत्य हैं अतः सीआरपीसी के प्रावधानों के अंतर्गत प्रथम सूचना रिपोर्ट अंकित करने हेतु यह प्रार्थनापत्र प्रस्तुत कर रही हूँ. मैं यह एफआइआर एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में ही नहीं एक विधि की छात्रा तनया की माँ के रूप में भी प्रस्तुत करना अपना आवश्यक फर्ज और उत्तरदायित्व समझती हूँ जो इन्ही बच्चियों की तरह एक नेशनल ला यूनिवर्सिटी में अध्ययन कर रही है और इन्ही की तरह कई स्थानों पर इंटर्न बनेगी, क्योंकि मैं इन दोनों बच्चियों में अपनी बेटी तनया को देखती हूँ और मुझे इस बात से ही रौंगटे खड़े हो जा रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट के अवकाशप्राप्त जज छोटी बच्चियों के साथ इस प्रकार की अत्यंत घिनौनी हरकत कर रहे हैं और कार्यवाही के नाम पर एफआइआर दर्ज कर उन पूर्व जजों को सलाखों के पीछे करने के बजाय मात्र जांच के नाम पर खानापूर्ति हो रही है.  
जैसा कि क़ानून का नियन है, जांच अपनी जगह होती रहेगी लेकिन इन दोनों मामलों के सम्बन्ध में एफआइआर दर्ज किया जाना अत्यंत आवश्यक है और मैं, एक युवा विधि छात्रा की माँ और सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में यह प्रार्थनापत्र तत्काल एस सम्बन्ध में एफआइआर दर्ज किये जाने हेतु प्रस्तुत कर रही हूँ.  
चूँकि ये दोनों घटनास्थल आपके थाना क्षेत्र के नहीं हैं, अतः साथ ही यह भी निवेदन करती हूँ कि इस सम्बन्ध में स्थापित नियमों और प्रक्रिया के तहत एफआइआर दर्ज कर प्रारम्भिक विवेचना में प्राप्त तथ्यों के आधार पर उसे सम्बंधित थानाक्षेत्र को संदर्भित करने की कृपा करें.  
अंतिम बात मैं यह कहना चाहूंगी कि आप अवगत होंगे कि मा० सुप्रीम कोर्ट ने ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश शासन एवं अन्य (रिट याचिका (क्रिमिनल) संख्या 68/2008) में पारित निर्णय दिनांक 12/11/2013 में यह स्पष्ट कर दिया है कि अब प्रत्येक थाने को प्रत्येक संज्ञेय अपराध में एफआइआर आवश्यक रूप से तत्काल पंजीकृत किया जाना आवश्यक है और ऐसा नहीं करने पर संबधित थानाध्यक्ष व्यक्तिगत रूप से कार्यवाही किये जाने के हकदार होंगे. मैं सुलभ सन्दर्भ हेतु इस निर्णय के आवश्यक भाग को भी संलग्न कर रही हूँ.  
तदनुसार कृपया उक्त प्रार्थनापत्र और संलग्न अभिलेखों के आधार पर तत्काल उचित धाराओं में दोषी अभियुक्तों के विरुद्ध एफआइआर दर्ज कर अग्रिम विवेचना एवं आवश्यक कार्यवाही कराये जाने की कृपा करें.  
पत्र संख्या- NT/SC/Judge/01        भवदीय,
दिनांक-15/11/2013
          (डॉ नूतन ठाकुर )
                5/426, विराम खंड,
          गोमती नगर, लखनऊ  
          # 94155-34525
 

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