प्रख्यात पत्रकार विजय प्रताप सिंह की तीसरी पुण्यतिथि आज

जाने-माने पत्रकार विजय प्रताप सिंह इसी जुलाई महीने में तीन साल पहले 20 तारीख को हम सभी को अलविदा कह गए। उ0प्र0 के पूर्व कैबिनेट मंत्री श्री नंदगोपाल गुप्ता ‘नंदी’ पर हुए रिमोट बम से हमले में विजय प्रताप घायल हुए और इलाज के दौरान उनकी मौत हो गयी। बेबाक, साहसी और लीक से हटकर चलने वाले विजय प्रताप सिंह के जाने की कमी हर किसी को अभी तक महसूस हो रही है, क्योंकि इस बीच बहुत कुछ ऐसा प्रकरण, मुद्दा, घटनाक्रम हुआ जिसमें उनकी बेबाक लेखनी की कमी सबको महसूस हुई।

विजय प्रताप सिंह की कमी हर ईमानदार पत्रकार और स्वाभिमानी नागरिक महसूस करता है. इंडियन एक्सप्रेस अखबार के जरिए पूरे देश में प्रतिष्ठित व चर्चित होने वाले विजय प्रताप सिंह ने जिस तरह से मानवीय संवेदना के साथ खबरें लिखीं, उससे सत्ता के गलियारे में कई बार हलचल मची और संसद में भी गतिरोध उत्पन्न हो गया।

जिस सरल, सहज, संवेदनशीलता के साथ विजय प्रताप सिंह ने पत्रकारिता को जिया, उसे देश के कई युवा पत्रकारों ने आदर्श माना. यही कारण है कि उनके तेवर और उनकी भाषा के साथ आज ढेरों युवा पत्रकार देश के अलग अलग कोनों में सक्रिय हैं. उन्हीं विजय प्रताप सिंह की तीसरी पुण्यतिथि के मौके पर आप सभी निमंत्रित हैं, आमंत्रित हैं, विजय के सभी चाहने वालों से अनुरोध है कि आप सब 20 जुलाई के दिन विजय को याद करने के लिए सुभाष चौराहा, सिविल लाइंस जरूर पहुंचें।

नवजनवादी पत्रकार मंच उ0प्र0  द्वारा आयोजित ‘यादों में विजय प्रताप’ के तहत मीडिया की भाषा के साथ मीडिया के जन सरोकार पर 28 जुलाई को निराला सभागार में विमर्श-व्याख्यान होगा, जिसमें देश के कई जाने-माने पत्रकार-साहित्यकार हिस्सा लेंगे।


एनडीटीवी के पत्रकार अजय सिंह द्वारा लिखा गया एक मार्मिक संस्मरण

विजय प्रताप की कमी हमेशा खलेगी

अजय सिंह

पत्रकार साथी विजय प्रताप अब हमारे बीच नहीं रहे। 12 जुलाई 2010 को उत्तर प्रदेश सरकार के कैबिनेट मंत्री नन्द गोपाल ‘नंदी’ के यहां खबर के सिलसिले में गए हुए थे। बातचीत के बाद जब विजय उनके साथ घर से बाहर निकल रहे थे, तभी मंत्री पर रिमोट संचालित बम से हमला हुआ। उस हमले में विजय बुरी तरह घायल हो गए। घटना के बाद उन्हें स्थानीय अस्पताल ले जाया गया। बाद में इंडियन एक्सप्रेस ने एयर एम्बुलेंस से उन्हें दिल्ली के उस मिलिट्री अस्पताल में भर्ती कराया जहां इस तरह के धमाकों में घायल लोगों का बेहतर इलाज होता है। जब से विजय घायल हुए तब से उनके जानने वाले और इलाहाबाद के पत्रकार साथी उनके जल्द ठीक होने कि दुआ कर रहे थे। पर नियति ने किसी कि नहीं सुनी और 20 जुलाई को उम्मीदों की डोर टूट गई। विजय हमारे बीच से हमेशा के लिए चले गए। ये एक ऐसी घटना है जिसे दिल और दिमाग मनाने के लिए तैयार नहीं है पर सच से क्रूर और खौफनाक कुछ नहीं होता।

अब विजय अपने पीछे चार साल के बेटे, नौ महीने की बेटी और पत्नी छोड़ गए हैं। वो हम सभी े को अकेला कर गए हैं और उनके न रहने का सन्नाटा हम सभी को उस खौफनाक धमाके का अहसास हर पल कराता रहेगा। एक गरीब परिवार में जन्मे साथी विजय ने कभी हार मानना नहीं सीखा था। अभाव में भी मुस्कुराने वाले विजय ने इलाहाबाद से पढ़ायी करने के बाद पत्रकारिता में अपना करियर इलाहाबाद से पकाशित होने वाले अंग्रेजी अखबार नार्दन इंडिया पत्रिका से शुरू किया। इसके बाद वो आवर लीडर में चीफ रिपोर्टर से जीएम के पद तक गए। फिर टाइम्स ऑफ इंडिया में तकरीबन आठ साल तक अपनी कलम का लोहा मनवाते रहे। सन २००८ से इंडियन एक्सप्रेस में सीनियर रिपोर्टर के पद पर काम कर रहे थे इस दौरान उनकी कई सामाजिक सरोकारों से जुडी खबरों ने विधान सभा और संसद में सरकार की किरकिरी की। जिनमें महिला कुली की भर्ती में एम0ए व कम्प्यूटर मास्टर एक गर्भवती को दौड़ाए जाने की खबर प्रमुख थी।

अपनी मेहनत और ईमानदारी की कमाई से उन्होंने अपनी दो बहनों की शादी की और खुद भी अपना परिवार बसाया। जमीन से जुड़े विजय से मेरा परिचय सन् 2003 में तब हुआ जब मैं एनडीटीवी में बतौर स्ट्रिंगर काम शुरू किया था। मुझे आज भी याद है की इलाहाबाद के सिविल लाइंस में सुभाष चौराहे के बगल नीम के पेड़ के नीचे जहां सारे पत्रकार जमा होते हैं, वहीँ गर्मी की दोपहरी में सिर पर गमछा लपेटे विजय दूसरे चौनल के स्ट्रिंगरों से बतिया रहे थे। मुझे लगा कि ये भी किसी चौनल के स्ट्रिंगर साथी होंगे पर जब परिचय के बाद पाता चला कि ये टाइम्स आफ इंडिया के सीनियर रिपोर्टर हैं तो उनकी इस सादगी ने मुझे बहुत प्रभावित किया। इसके बाद तो हम लोगों ने मिल कर कई खबरे की। पत्रकारिता में आने के बाद विजय ही प्रिंट मीडिया के वो पहले पत्रकार थे, जिनका मेरे जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा। मेरे ही नहीं हम जैसे जितने भी लोग थे, उन्होंने विजय के झुझारूपन, खबरों को लेकर उनकी संजीदगी, हर खबर के स्पाट पर खुद पहुंचने की चाहत से बहुत कुछ सीखा है।

आज विजय प्रताप भले ही हमारे बीच न हो, मगर उन्होंने हम जैसे लोगों के अन्दर पत्रकारिता का जो बीज डाला है उसमें वो हमेशा जिन्दा रहेंगे और हर पल वो हमारे साथ अपनी उपस्थिति का एहसास कराते रहेंगे। विजय प्रताप को अपने इर्दगिर्द रहने के एहसास को हम तो जिंदा रख लेंगे। लेकिन उनके घर-परिवार को कैसे ढ़ाढस बंधायें ये नहीं समझ में आ रहा। उनके न होने के एहसास को हम कम तो नहीं कर सकते पर हम सभी पत्रकार मिल कर यह कोशिश जरूर कर सकते हैं कि उनके परिवार को कोई तकलीफ न हो।

पत्रकार की हत्या से बेपरवाह प्रभाष परंपरा के वारिसों की चिल्ल पों

बीते कुछ दिनों से इंटरनेट पर प्रभाष परम्परा न्यास को लेकर अपने तमाम साथियों की चिंता,  एक दूसरे से बड़ा बनने की कोशिश और प्रभाष जी का सबसे बड़ा झंडाबरदार बनने के शगल  पढ़ कर मन गहरी वेदना में चला गया। ये वेदना इसलिए भी और  गहरी हुई , क्योंकि इसी हफ्ते पत्रकार साथी विजय प्रताप की मृत्यु  का गम था। उनकी मौत  सहज मौत  नहीं थी, बल्कि ह्त्या की गई थी। शायद पहली बार इस तरह किसी मंत्री पर किए गए हमले में कोई पत्रकार मारा गया। प्रभाष जोशी इसलिए भी जाने जाते रहे हैं कि वो हमेशा पत्रकारों के खिलाफ किसी भी अन्याय के विरुद्ध आंदोलन में सबसे आगे रहा करते थे। जितना मैंने उन्हें जाना  सुना है वो दिल्ली या देश के किसी भी कोने में किसी भी पत्रकार के खिलाफ हो रहे अत्याचार के खिलाफ सबसे पहले सडकों पर निकल पड़ते थे। आज उन्हीं की परम्परा की दुहाई देने वाले तमाम लोगों के लिए विजय प्रताप का यूं चले जाना कोई मायने नहीं रख रहा है, इसलिए ये वेदना ज्यादा बड़ी हो गई है।

हो सकता है जो लोग प्रभाष परम्परा के झंडे को सबसे आगे ले कर जाने की होड़ में लगे हैं वो विजय प्रताप से वाकिफ न हों। उनकी कभी विजय से मुलाकात भी न हुई हो। पर वो इस घटना से अनजान  तो नहीं होंगे। विजय प्रताप को उनकी अपनी पत्रकारिता के लिए रामनाथ गोयनका अवार्ड भी मिला है। ये भी जानकारी मिली होगी और जब जानकारी मिली होगी तो ये भी पता चला होगा कि कैसे उत्तर प्रदेश सरकार अपने घायल मंत्री का इलाज तो सरकारी खर्च पर करा रही है, रोज उनकी मेडिकल बुलेटिन जारी होती है। उन्हें सरकार के खर्चे पर एयर एम्बुलेंस से तुरंत पीजीआई में भर्ती कराया जाता है। मगर विजय प्रताप को इलाहाबाद में ही छोड़ दिया जाता है। यहां ये बताते चलें कि इंडियन एक्सप्रेस अपने खर्चे पर विजय प्रताप को एयर एम्बुलेंस से दिल्ली ले गया और इलाज भी करवाया, जो संभव हो रहा है वो मदद भी कर रहे हैं। लेकिन क्या उत्तर प्रदेश सरकार की  इसमें कोई जिम्मेदारी नहीं बनती.। उनके मंत्री के हमले में मारे गए पत्रकार की कीमत सरकार ने पांच लाख रुपये आंकी है। ये रुपये भी देने मंत्री तब पहुंचते हैं, जब पत्रकार साथी का पार्थिव शरीर घर में रहता है। ये कयास जरूर लगाया जा सकता है कि मंत्री महोदय यह सहायता राशि दे कर फोटो खिंचवाना चाहते हो और ये बताना चाहते हो कि सरकार कितनी दयावान है। पर सूबे की जो मुख्यमंत्री करोड़ों रुपये की लागत से  बनी मूर्ती की डिजाइन पसंद नहीं आने पर उसे तुड़वा कर नया करवा देती हैं, क्या उन्हें इस बात का आभास नहीं है कि इस  पांच लाख से विजय प्रताप के चार साल के बेटे नौ महीने की बेटी, पत्नी और बूढी माँ का गुजरा कैसे हो जाएगा?

खैर मुख्यमंत्री को क्या दोष दिया जाए, उनकी सरकार को शुरू से ही हकीकत से मुंह मोड़े हुए है। लेकिन प्रभाष परम्परा की बड़ी-बड़ी बात करने वाले हमारे अग्रजों की क्या ये नैतिक जिम्मेदारी नहीं बनती है कि वो इस पर सरकार की आलोचना करें? मारे गए साथी पत्रकार को न्याय दिलवावे। क्या प्रभाष जी जिंदा होते और उन्हें पता चलता तो वो उठ खड़े नहीं हुए होते? क्या वो माया सरकार को उसके इस अपराध का अहसास नहीं कराते? क्या वो ये पता करने जाते कि विजय प्रताप को वो जानते हैं कि नहीं? वो जनसत्ता में था या नहीं ३.इसकी मदद किस आधार पर करनी चाहिए ३.. क्या वो अपने लोगों से विचार कर तब कोई योजना बनाते? जहां तक मै प्रभाष जी को जानता हूं, वो ऐसा कुछ नहीं करते। अपनी सामर्थ्य और सीमा के हिसाब से, अपनी कलम से साथी पत्रकार के साथ हुई ज्यादती के विरुद्ध अपनी आवाज बुलंद करते। अपनी पहुंच से कहीं आगे जा कर जैसे भी होता वो मदद करते और दूसरों से भी करवाते। लेकिन अफसोस है उनकी परम्परा को आगे बढाने वाले अपने अग्रजों पर, जिनका इस तरफ तनिक भी ध्यान नहीं है। बेहतर तो होता प्रभाष परम्परा न्यास में कौन क्या कर रहा है और क्या नहीं- इस छिछलेदार को छोड़कर  कलम की ताकत का इस्तेमाल करते हुए विजय प्रताप और उनके बेबस परिवार के लिए कुछ लिखते। सरकार पर दबाव बनाते ताकि विजय के घरवालों की कुछ मदद हो सके। प्रभाष जी की परम्परा का सही निर्वाह करते। उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि देते। मगर अफसोस ऐसा कुछ नहीं हुआ। और जो हुआ वो बेहद शर्मनाक है।

अजय सिंह

वरिष्ठ पत्रकार

एनडीटीवी

वाराणसी

उप्र

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *