Nadim S. Akhter : दिल्ली के एक प्रतिष्ठित अखबार में आज शादी पर संपादकीय छपा है. उसमें एक लाइन है–विवाह करके और संतान पैदा करके व्यक्ति पितृ ऋण से मुक्त होता है— इसे लाइन को पढ़ने के बाद मन में कई सवाल हैं, उनके जवाब जानने की उत्सुकता है.
1. मसलन पितृ ऋण का मतलब क्या सिर्फ पिता से है. क्या मातृ ऋण जैसा भी कोई कॉनसेप्ट है हिंदू धर्मशास्त्रों में. या फिर पितृ ऋण का मतलब माता-पिता दोनों के ऋण से है.
2. क्या सिर्फ पुत्र यानी बेटा पैदा करके ही पितृ ऋण से मुक्त हुआ जा सकता है. अगर सिर्फ बेटियां हों तो क्या मां-बाप पर एक बोझ बना रहेगा?? यानी पितृ ऋण से मुक्त होने के लिए क्या बेटा पैदा करना जरूरी है.
अगर हां, तो फिर बेटा ही क्यों मुखाग्नि दे सकता है. बेटी को क्या इसकी इजाजत है???
जहां तक मेरी जानकारी है, पितृ ऋण से मुक्ति बेटा और उसके द्वारा किए गए कर्मकांड से ही हो सकती है. और मुखाग्नि भी सिर्फ बेटा ही दे सकता है. इसे श्रेयस्कर माना गया है. लेकिन अपनी इस जानकारी को मैं सीमित मानता हूं क्योंकि कभी किसी धर्मगुरु या जानकार से इस मामले पर बात नहीं की. अगर आप लोगों में से कोई इसकी प्रामाणिक जानकारी दे पाए, तो ज्ञानवर्धन होगा.
तीसरी बात. यह समझ से परे है कि इस प्रतिष्ठित अखबार के संपादक महोदय ने विवाह जैसे रिश्ते को उपर्युक्त धार्मिक मान्यता से क्यों जोड़ा? और अगर जोड़ा भी तो किसी एक धर्म विशेष से क्यों जोड़ा?? दुनिया भर के अलग-अलग धर्मों-समाज-कबीलों में विवाह को लेकर अलग-अलग मान्यताएं हैं. इस पूरे सम्पादकीय में उनकी चर्चा क्यों नहीं हुई?
और अगर मेरी जानकारी सही है, तो विवाह के बंधन को पुत्र रत्न प्राप्ति (बेटियों की यहां कोई जगह नहीं) से जोड़कर -मुक्ति- का मार्ग बताने की यह कोशिश कितनी जायज है? कम से कम अखबार के संपादकीय में इस विषय को जोड़ने की कोई जरूरत नहीं थी, खासकर तब, जब इस संपादकीय को शादी जैसे रिश्ते को समझाने के लिए हल्के-फुल्के अंदाज में लिखा गया है. ये बताकर कि -शादी का लड्डू जो खाए, वह भी पछताए, जो ना खाए, वह भी पछताए-.
पत्रकार नदीम एस. अख्तर के फेसबुक वॉल से.






