प्रभाष जोशी और राहुल देव अंग्रेजी से हिंदी पत्रकारिता में आए थे

द्विभाषी होना अच्छी बात है। अगर आप हिंदी के साथ-साथ अंग्रेजी में भी समान अधिकार रखते हैं तो यकीनन आपमें संभावनाएं कहीं ज्यादा हैं। प्रभाष जोशी और राहुलदेव अंग्रेजी से हिंदी में आए थे और बेहतर पत्रकार साबित हुए। लेकिन इसे आम नजीर मानकर यह प्रयोग किया जाए तो रिजल्ट हास्यास्पद भी हो सकते हैं। हमें कहीं न कहीं प्रोफेशनलिज्म के साथ ही वोकेशनलिज्म को भी समझना होगा।

एक कारीगर अपने हुनर से बहुत अच्छी चीजें गढ़ सकता है। जैसे कि पुराने माल को नया लुक देकर बेचना। यह एक तरह का वोकेशनलिज्म है यानी अपने हुनर से लोहे को कुंदन जैसा बना देना। लेकिन प्रोफेशनलज्मि इसके उलटा है। कोई भी प्रोफेशनल आदमी लोहे को सोना बनाने जैसा प्रलोभन नहीं देगा। जो संभव नहीं है उसे बेचना बाजार के एथिक्स के खिलाफ है। अंग्रेजी की दुनिया से आए पत्रकार यही कुछ कर रहे हैं। मेरा अपना भी एक अनुभव है जिसे मैं शेयर कर रहा हूं।

हमारी एक साथिन अच्छी नौकरी की लालच में अंग्रेजी का अखबार छोड़कर हिंदी में हमारे साथ आ जुड़ीं। उनको लेने का दबाव कुछ ऐसा था कि मैं मना भी नहीं कर सका। हालांकि हमारे साथी इस नियुक्ति के खिलाफ थे। उनके लिए हिंदीभाषी पाठकों के मर्म को समझना आसान नहीं था। वे जिस अंग्रेजी अखबार में काम करती थीं वहां उन्हें कुछ सिखाया ही नहीं गया था। अंग्रेजी अखबारों की राज्यों की राजधानियों की राजनैतिक खबरों में तो दिलचस्पी होती भी है लेकिन कस्बाई शहरों के मामले में ये अंग्रेजी अखबार उन अधकचरे लोगों की जानकारी पर निर्भर रहा करते हैं, जिनका मकसद उस भाषाई इलाके के जड़ों वाले लोगों को काटना होता है।

वे न तो खुद बहुत पढ़े लिखे होते हैं और न ही हिंदी या अन्य क्षेत्रीय भाषाओं की प्रतिभाओं का सम्मान करना जानते हैं। उनके मानस में हिंदी भाषी पाठकों की छवि एक ऐसे क्लास के रूप में बनी है जो भयानक रूप से जातिवादी और सामंतवादी होता है। जहां लड़कियों की शादी उनके रजस्वला होने से पहले कर दी जाती है। इस क्लास में लड़कियों को पढ़ाया नहीं जाता। उन्हें बचपन से ही घरों में कैद कर दिया जाता है। इसीलिए अंग्रेजी अखबारों में वर्नाक्युलर इलाकों के संवाददाता कुछ भी ऊटपटांग स्टोरी भेजकर अपनी दिहाड़ी पक्की करा लेते हैं। लेकिन हिंदी अखबारों में इनके लिए काम करना बहुत कठिन होता है। हमारी वे साथिन भी ऐसे ही माहौल से आई थीं। नतीजा यह हुआ कि हम रोज ही अपने प्रतिद्वंदी अखबार से खबरों के मामले में पिटने लगे। ऐसी हालत में उनके भरोसे रिपोर्टिंग को नहीं छोड़ा जा सकता था।

वरिष्‍ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्‍ल के फेसबुक वॉल से साभार.

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