प्रवीण भाई और कस्तूरी जी को इतना विचलित नहीं होना चाहिए

आप मुझे प्रकाश पुरोहित का अंधभक्त कह सकते हैं। मगर प्रवीण खारीवाल और कमल कस्तूरी ने जो लिखा है, उसे पढ़ कर मेरे मन में भी कुछ बातें आई हैं। जब-जब प्रकाश जी ने अपने बेटे सुधांशु को पर्यटन के लिए भेजा, तब-तब मेरे भी मन में सवाल उठे। मगर जो सुधांशु ने रिपोर्टिंग की, उसे पढ़ कर सारे सवाल मिट गए। सुधांशु भले ही प्रकाश जी का बेटा है, मगर लिखता अच्छा है और प्रकाश जी को इससे ज्यादा कुछ नहीं चाहिए। उनकी प्राथमिकता होती है पठनीय अखबार निकालना। इसके बाद या इसके पहले वे कुछ नहीं जानते।

सुधांशु अगर अच्छा लिख सकता है, तो सुधांशु क्यों नहीं? एक तरह से सुधांशु मुफ्त रिपोर्टिंग करता है। उसी तरह 'सूर्यासन' को हर हफ्ते फिल्म समीक्षा लिखने का कुछ नहीं मिलता। उसके अपने पाठक हैं और अपना नज़रिया है। सो प्रकाश जी के बेटे अगर लिखते हैं, तो प्रभातकिरण का फायदा नहीं उठाते बल्कि प्रभात किरण को फायदा पहुंचाते हैं। रही बात प्रकाश जी के विदेश जाने की, तो यह मैनजमैंट जानता है कि अपनी विदेश यात्राओं का कितना बोझ प्रकाश जी ने मैनेजमेंट पर डाला और कितना खुद उ़ठाया। फिर उनसे बेहतर कौन लिख सकता था? इसलिए उनका जाना कुछ गलत भी नहीं रहा। मैंने तो जब-जब जहाँ-जहाँ जाने की अनुमति चाही, मुझे मिली और पूरे खर्च के साथ मिली। विदेश भी मैं जाता मगर मेरे पास पासपोर्ट नहीं था और अब तक नहीं है।

मैं भी प्रभात किरण का अंग रहा हूँ। अब भी हूँ। प्रभात किरण ने २२ बरसों में शहर की पत्रकारिता को बदला है। उसकी भाषा बदली है। प्रभात किरण सरल हिंदी का हिमायती है। इसलिए उसमें नकली हिंदी नहीं मिलती। मुख्य अभियंता, कनिष्ठ अभियंता जैसी सरकारी हिंदी का प्रभातकिरण ने मजाक उड़ाया है। प्रभात किरण ने हिंदी पत्रकारिता को दिलचस्प और अनौपचारिक भी बनाया है। मेरी अपनी नज़र में प्रभात किरण से दिलचस्प अखबार कोई सा नहीं है, जिसमें खूब सारी समीक्षाएं होती हैं, ताजातरीन लेख होते हैं। बकाया सब अखबार लगभग एक जैसे हैं। जो रचनात्मकता कभी नईदुनिया में थी, वो अब प्रभात किऱण में है। प्रभात किरण में ज़मीनों के दलाल और स्कूल मास्टर आकर पत्रकार हो जाते हैं। मगर शहर में कुछ जगहें ऐसी भी हैं जहाँ जाकर पत्रकार दलाल हो जाते हैं। सत्ता के दलाल…जो रिश्वतें ले लेते हैं और लोगों के काम भी नहीं करते। लोग चक्कर लगाया करते हैं। २२ बरसों में प्रभात किरण पत्रकारों की नर्सरी रहा है। मगर इंदौर एक ऐसा शहर है, जहाँ प्राइमरी स्कूल ही नहीं है।

खैर… मुद्‌दा यह है कि क्या आदिल सईद ने कुछ ग़लत लिखा है? मुझे तो नहीं लगता कि उन्होंने कुछ आपत्तिजनक लिखा है। कोई भी सामान्य आयोजक इस रिपोर्टिंग को पढ़ कर दरगुज़र कर सकता है। मगर चूंकि आयोजक सामान्य लोग न होकर पत्रकार थे, सो उन्हें बात बुरी लग गई। उनका घमंड चोटिल हो गया। हम पत्रकार हैं और कोई हम पर भी उंगली उठा सकता है? ऐसी रिपोर्टिंग प्रभात किरण में ३६५ दिन छपती हैं। पत्रकारिता के सच्चे समर्थक होने के नाते प्रवीण खारीवाल को रोजाना तकलीफ होनी चाहिए कि गलत रिपोर्टिंग हो रही है। मगर उन्होंने विरोध तब किया, जब प्रेस क्लब के आयोजन की वैसी ही रिपोर्टिंग हो गई। आदिल सईद ने जो सवाल उठाए हैं, सब सामान्य सवाल हैं। किसी पर व्यक्तिगत आरोप तो बिल्कुल नहीं लगाए गए हैं। इस लेख का जवाब लिखने में हालांकि प्रवीण खारीवाल और कस्तूरी जी इतनी सावधानी नहीं रख पाए हैं। आदिल सईद पूछ रहे हैं कि पत्रिका क्यों निकाली? मन हो तो जवाब दीजिए वरना मुस्कुरा कर आगे बढ़ जाइये। आदिल सईद के लेख पर अगर सवाल उठाने ही थे, तो केवल रिपोर्टिंग पर सवाल होने थे। बात प्रज्ञा मिश्रा तक नहीं जानी चाहिए थी। प्रज्ञा मिश्रा को भी प्रभात किरण कोई भुगतान नहीं करता। वे भी केवल इसीलिए छपती हैं कि अच्छा लिखती हैं।

और हां काटजू जी की बात शायद ठीक है, मगर यदि उस पर अमल किया गया तो सोचिए कितने लोग बेरोज़गार हो जाएंगे। आईने में एक आईना और होता है। फिर उस आईने में एक और आईना होता है। देखते चले जाइये आईना दिखता चला जाता है। मेरा सुझाव यह है कि प्रवीण भाई और कस्तूरी जी को इतना विचलित नहीं होना चाहिए। एक अखबार ने यदि कुछ अनचाहा भी लिख दिया, तो लिख दिया होगा। बाकी दस तो तारीफ कर ही रहे हैं। उनकी तारीफ बड़ी है या एक की आलोचना? क्या तारीफ करने वाले सभी संपादकों को भी प्रवीण खारीवाल और कस्तूरी ने इतने ही बड़े-बड़े पत्र लिखे हैं?

दीपक असीम

deepakaseem1@gmail.com


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