प्रेस को वेश्या कहना!

‘ए डीटर्स गिल्ड’  ने जनरल वी.के. सिंह और अरविंद केजरीवाल की आलोचना की है। गिल्ड ने दोनों सज्जनों द्वारा की गई पत्रकारों की निंदा को अनुचित बताया है और कहा है कि वे अपने शब्दों पर ध्यान दें। सचमुच इन दोनों सज्जनों ने पत्रकारों के खिलाफ प्राणलेवा शब्दों का प्रयोग किया है। जनरल सिंह ने उन पत्रकारों को, जिन्होंने जनवरी 2012 को फौज की टुकड़ियों की हलचल पर लिखा था, ‘प्रेस्टीट्यूट’ कह दिया। याने उनकी तुलना अंग्रेजी के शब्द ‘प्रास्टीट्यूट’ से कर दी।

यह ‘प्रेस्टीट्यूट’ शब्द सचमुच बड़ा मारक है। इसकी ध्वनि और इसका अर्थ इतनी गहरी मार करते हैं कि प्रेस में काम करने वाला कोई भी पत्रकार तिलमिला उठे, यह स्वाभाविक है। ‘एडीटर्स गिल्ड’ इस शब्द की निंदा नहीं करती तो क्या करती? आप किसी सती-साध्वी को वेश्या कह दें तो क्या वह चुप बैठेगी? सारे पत्रकार इसशब्द से बौखला उठें तो कोई आश्चर्य नहीं।

लेकिन यहां प्रश्न यह भी है कि क्या जनरल सिंह ने सभी पत्रकारों को वेश्या कहा है? बिल्कुल नहीं! उन्होंने एक अंग्रेजी अखबार के उन पत्रकारों के लिए ‘प्रेस्टीट्यूट’ शब्द का प्रयोग किया है, जिन्होंने उन पर तख्ता-पलट का संदेह व्यक्त किया था। उनका आरोप था कि जनरल सिंह की सेवा-निवृत्ति का मामला जिस दिन सर्वोच्च न्यायालय में आने वाला था, उसी दिन उन्होंने सेना की कुछ टुकड़ियां दिल्ली रवाना कर दी थीं। उसके कारण नेताओं के पसीने छूट गए थे। इस खबर का खंडन रक्षा मंत्रालय और रक्षा मंत्री, दोनों ने कर दिया था। लेकिन इस खबर के कारण उस अखबार के संपादक की जीवन-भर की प्रतिष्ठा पर बादल-से छा गए थे।

वास्तव में यह एक बुरा हादसा था। वह संपादक और वे पत्रकार अपनी व्यावसायिक योग्यता के लिए जाने जाते हैं। लेकिन किन्हीं विश्वसनीय सूत्रों की वजह से वे गुमराह हो गए होंगे। वह खबर इतनी बड़ी थी कि वे उसकी उपेक्षा नहीं कर सकते थे। अब डेढ़-दो साल बाद उसी अखबार ने उसी खबर को दुबारा छापा और कुछ नए प्रमाण भी दिए। रक्षा मंत्री ने दुबारा जमकर खंडन किया लेकिन जनरल साहब चिढ़ गए। उन्होंने ‘प्रेस्टीट्यूट’ कह दिया। जनरल का खिसियाना भी स्वाभाविक था। खिसियाट में कही बात को जी से लगाना ठीक नहीं।

वैसे भी कई प्रोफेसर लोग पत्रकारिता को दुनिया का सबसे ‘पुराना धंधा’ कहते हैं। इसका मतलब वही होता है, जो जनरल सिंह ने कहा है। इसी प्रकार अरविंद केजरीवाल ने भी पत्रकारिता के विरुद्ध अपनी भड़ास निकाली है। कुछ अखबारों और टीवी चैनलों को अंबानी ने खरीद लिया है, यह आरोप अरविंद ने लगा दिया है। यह असंभव नहीं है लेकिन इसका प्रमाण क्या है? बिना प्रमाण के ऐसी बातें कह देने से अपनी ही प्रामाणिकता पर संदेह पैदा हो जाता है। जब मीडिया ‘आप’ के गीत गा रहा था, तब तो अरविंद ने कुछ नहीं कहा। इसमें शक नहीं कि नेताओं की तरह मीडिया के भी कुछ लोग खरीदे और बेचे जा सकते हैं लेकिन सभी पत्रकारों को एक ही झाड़ू से बुहारने का काम कोई अनाड़ी नेता ही कर सकता है। मुझे विश्वास है कि जनरल सिंह और अरविंद ज्यों-ज्यों सार्वजनिक जीवन में आगे बढ़ते जाएंगे, धीरे-धीरे अपने शब्द-चयन में सावधानी बरतते जाएंगे।

लेखक वेद प्रदाप वैदिक वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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