फर्जी पत्रकारों के सहारे प्रेस क्‍लब अध्‍यक्ष की कुर्सी पर काबिज हैं रतन दीक्षित!

: पत्रकार हित में संघर्ष नहीं करने का आरोप : रतन दीक्षित ने कहा – कई बड़ी लड़ाइयां लड़ चुका है संगठन : देश के बहुसंख्‍यक पत्रकारों का दुर्भाग्‍य है कि उनकी लड़ाई लड़ने का दावा करने वाले पत्रकार संगठन, प्रेस क्‍लब और इसके पदाधिकारी या तो सत्‍ता के दलाल हो चुके हैं या प्रशासन के भोंपू. पत्रकारों के हित के नाम पर यहां-वहां से माल पीटने वाले ज्‍यादातर संगठन और क्‍लबों में लोकतंत्र का बेहद अभाव है, एक ही पद पर बरसों बरस तक एक ही व्‍यक्ति अपनी सत्‍ता की दुकान जमाए बैठा है ताकि उनकी दलाली चमकती-दमकती रहे. दूसरे को न आने देने के लिए फर्जी लोगों को भी सदस्‍यता दिलाने की बातें सामने आती रहती हैं. 

पिछले कुछ समय में कई एक मामले ऐसे आए कि पत्रकारों का उत्‍पीड़न हुआ, उनके परिजनों का उत्‍पीड़न हुआ, कई पत्रकार बिना कारणों के नौकरी से निकाल दिए जाते हैं परन्‍तु एक भी पत्रकार संगठन, क्‍लब ने खुल कर इन घटनाओं का विरोध नहीं किया, सड़क पर नहीं उतरा. ज्‍यादा समय नहीं हुआ उन्‍नाव में ही एक सप्‍ताह पहले नम्‍बर एक अखबार के पत्रकार को सपा विधायक के भाई की गुंडई का शिकार होना पड़ा था, परन्‍तु किसी भी पत्रकार या संगठन ने इसके खिलाफ ना तो आवाज उठाई और ना ही विरोध दर्ज कराया. क्‍योंकि इससे इन संगठनों को खतरा था कि नई सत्‍ता उनके खफा हो सकती है और उनकी दलाली की दुकानदारी बंद हो सकती है.

ऐसा ही आरोप अब इलाहाबाद में प्रेस क्‍लब पर लगा है. बीते रोज एक पत्रकार को फोन पर जान से मारने की धमकी मिली, परन्‍तु किसी पत्रकार संगठन ने उसके पक्ष में आवाज नहीं उठाई. पत्रकार को अपनी लड़ाई खुद ही लड़नी पड़ी. इसके बाद से सवाल उठने लगा है कि प्रेस क्‍लब में वर्षों से पत्रकार हित की लड़ाई लड़ने के नाम पर कब्‍जा जमाए लोग क्‍या कर रहे थे. आरोप प्रेस क्‍लब के अध्‍यक्ष रतन दीक्षित पर भी लगे हैं कि क्‍यों नहीं प्रेस क्‍लब और उसके सदस्‍य एक पत्रकार को धमकी मिलने की खबर पर सक्रिय हुए. क्‍यों नहीं उन्‍होंने पुलिस-प्रशासन पर दबाव बनाया. पत्रकार को अपनी लड़ाई खुद लड़नी पड़ी, फिर क्‍या औचित्‍य है ऐसे संगठन और प्रेस क्‍लबों का. सवाल इसलिए भी उठ रहे हैं कि रतन दीक्षित राज्‍य के बड़े संगठन उपजा के भी प्रदेश अध्‍यक्ष हैं.

इलाहाबाद के पत्रकार बताते हैं कि रतन दीक्षित पिछले लगभग डेढ़ दशक से प्रेस क्‍लब में विभिन्‍न पदों पर विराजमान रहे हैं. ये उपजा के अध्‍यक्ष भी हैं तथा पत्रकारों के बड़े नेता होने का दंभ भी भरते हैं परन्‍तु इन्‍होंने पत्रकार हित में एक भी ऐसी लड़ाई नहीं लड़ी जिसे याद किया जा सके. पत्रकारों का लगातार उत्‍पीड़न होता रहा. इलाहाबाद में ही डीएनए अखबार के मालिक के परिजनों को भी पुलिस ने गलत तरीके से अपमानित करने की कोशिश की फिर भी कोई पत्रकार संगठन इसके खिलाफ आवाज उठाने की हिम्‍मत नहीं दिखाई. अब जब एक पत्रकार को फोन पर धमकी मिली तो उसमें भी यही रवैया अपनाया गया. फिर क्‍या औचित्‍य रह जाता है प्रेस क्‍लब और प्रेस संगठनों का, क्‍या केवल दलाली और अधिकारियों-नेताओं की चम्‍मचागिरी करना.

कुछ दूसरे पत्रकार भी रतन दीक्षित पर आरोप लगाते हैं कि इन्‍होंने कई ऐसे लोगों को प्रेस क्‍लब का सदस्‍य बना दिया है जिनका पत्रकारिता से कोई लेना-देना नहीं है. इन्‍हीं की बदौलत ये पिछले तीन बार से इलाहाबाद प्रेस क्‍लब का अध्‍यक्ष बनते चले आ रहे हैं. इन पत्रकारों का कहना है कि राज्‍य के तमाम प्रेस क्‍लबों की दिक्‍कत यही है कि काम करने वाले पत्रकार इन संगठनों के पदाधिकारी नहीं बनाना चाहते, जिसके चलते दूसरे दर्जे के लोग राज्‍य भर के तमाम प्रेस क्‍लब और पत्रकार संगठनों में पदाधिकारी के रूप में काबिज हो जाते हैं. और इसके माध्‍यम से पत्रकारों के उत्‍पीड़न की लड़ाई लड़ने की बजाय बस अपना उल्‍लू सीधा करते हैं. तमाम ऐसे लोगों को इन संगठनों का सदस्‍य बना देते हैं, जिनका पत्रकारिता से कोई लेना-देना नहीं होता है. इन लोगों का ये भी कहना है कि इन संगठनों और प्रेस क्‍लबों के बल पर बिना सेलरी के पत्रकारिता करने वाले कई लोग लखपति-करोड़पति तक हो गए हैं.

इन सभी संदर्भों को लेकर जब उपजा के प्रदेश अध्‍यक्ष एवं इलाहाबाद प्रेस क्‍लब के अध्‍यक्ष रतन दीक्षित से बात की गई तो उन्‍होंने कहा कि इस तरह की बातें सरासर गलत हैं. अगर पत्रकार अपने साथ हुए घटना की जानकारी नहीं देगा तो हम कैसे उसकी मदद कर सकते हैं. इलाहाबाद प्रेस क्‍लब राज्‍य का सबसे जुझारू तेवर वाला है. सन 2000 में कुंभ मेले के दौरान पत्रकारों पर लाठीचार्ज की घटना का प्रेस क्‍लब ने जबर्दस्‍त विरोध किया था. कुंभ मेला का सामूहिक बहिस्‍कार किया गया था. प्रेस क्‍लब पर चौतरफा दबाव होने के बाद भी हमलोग पीछे नहीं हटे. आरोपी अधिकारियों पर कार्रवाई होने के बाद ही प्रेस क्‍लब आंदोलन खतम किया था.

श्री दीक्षित कहते हैं कि श्‍यामेंद्र कुशवाहा के अपहरण के दौरान भी प्रेस क्‍लब ने लम्‍बा आंदोलन चलाया बल्कि प्रदेश स्‍तर पर भी इस आंदोलन को उठाया गया. अभी प्रतापगढ़ में कुछ पत्रकारों पर फर्जी मुकदमा किया गया है, जिसकी जानकारी होने पर हमलोगों ने आईजी से मिलकर मुकदमा हटाए जाने की मांग की है. जब तक कोई पत्रकार अपनी पीड़ा हम तक नहीं पहुंचाएगा तब तक कैसे हम उसको न्‍याय दिलाने की लड़ाई या आंदोलन की शुरुआत कर सकते हैं. पत्रकार किसी भी संगठन या क्‍लब का हो हम सबके लिए लड़ाई लड़ने को तैयार हैं. बाकी आरोप लगाने वालों की अपनी सोच है.

 

 
 

 

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