फिर टूटेगा चकराता रोड, एमडीडीए व सरकार पर भी उठे सवाल

 देहरादून : एक लम्बे अर्से से चकराता रोड़ प्रयोग का प्रतीक बनी हुई है। पिछले वर्ष भाजपा सरकार के कार्यकाल में चकराता रोड़ का ‘बोटलनेक’ खोला गया। इससे आम जनता को निश्चित रूप से राहत मिली है पर शासन प्रशासन का जो रवैया रहा है उससे व्यापारी अब तक नहीं उबर पाये हैं। जिन व्यापारियों को एमडीडीए कम्पलैक घंटाघर में दुकानें मिली भी हैं, वह अब तक अपना कारोबार वहां नहीं शुरू कर पाये हैं। इससे पहले उनके कारोबार पर गाज गिरी थी और अब तक उनका कारोबार पुराने स्तर पर नहीं पहुंच पाया है।

आज भी अध टूटी दुकानें तथा मकान इस बात का संकेत देते है कि उनके साथ कहीं न कहीं अन्याय हुआ है। अब एक बार फिर चकराता रोड़ टूटने जा रही है। एमडीडीए चकराता रोड़ की भूमिका अधिगृहण करेगा और पीपीपी मोड़ पर इसी रोड को विकसित करेगा। सूत्रों की माने तो पीपीपी मोड़ पर इस रोड़ का विकास कार्य उसी फार्म को दिया जा रहा है। जिसने सिडकुल की जमीन खरीदी थी। सरकार पर आरोप था कि सरकार ने मानकों को ताक पर रखकर फार्म को यह जमीन आबंटन करायी थी। अब इस मसले पर हाईकोर्ट भी आ गया है।

हाईकोर्ट ने एमडीडीए को दस दिन में चकराता रोड को लेकर प्लान तैयार करने के निर्देश दिए हैं। सीमित समय को देखते हुए मंगलवार को एमडीडीए में चकराता रोड़ के लिए भूमि अधिग्रहण का प्रस्ताव तैयार करने पर आम राय बनी। एमडीडीए उपाध्यक्ष आर मीनाक्षी सुंदरम ने दो जून तक ड्रांइग, डिजाइन, मुआवजा, पैकेज भू-अधिग्रहण प्रस्ताव, योजना की लागत का खाका तैयार करने के निर्देश दिए। उपाध्यक्ष ने बताया कि योजना का पूरा खाका तय समय के भीतर सरकार के समक्ष भी रख दिया जाएगा।

एमडीडीए के सचिव वंशीधर तिवारी का कहना है कि प्राधिकरण चकाराता रोड़ के विकास के लिए कृत संकल्प है हम चाहते है कि चकाराता रोड का निर्माण ऐसा किया जाए कि बाहर से आने वाला व्यक्ति यहां कि भव्यता दिव्यता से प्रभावित हो तभी प्राधिकरण के कामों को प्रभावी ढंग से देखेंगे। श्री तिवारी का कहना है कि इसके लिए एक फार्म को टेंडर दिया जा रहा हैं। विकास का काम उक्त फार्म पीपीपी मोड़ पर करायेगी। उन्होंने संवाददाता द्वारा पूछे गये सवालों पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। उनका कहना था कि इस आशय की जानकारी उच्च अधिकारी ही दे सकते हैं।

सरकार द्वारा इस मामले पर काफी तेजी दिखायी जा रही है। इसका पता एमडीडीए के कामों से लगता है। सूत्रों की माने तो दिल्ली मुम्बई तथा अन्य क्षेत्रों में जहां पर किसी बाजार या क्षेत्रों का अधिग्रहण किया जाता है वहां जो निर्माण किया जाता है, उसमें पहले दो मंजिल भवन स्वामी या दुकान स्वामी को दिये जाते हैं ऊपर के दो मंजिल विकास कर्ता फार्म को दिये जाते हैं, लेकिन यहां स्थिति अलग बतायी जाती है। कहा जा रहा है कि दो मंजिले भवन स्वामी को दी जायेगी और तीन मंजिल विकासकर्ता को दी जायेगी। इससे भवन स्वामियों के अधिकारों का हनन हो रहा है। चकराता रोड़ के व्यापारियों ने अपने अधिकारों के लिए एक समिति का निर्माण किया। पिछले दिनों इस समिति के बैठक में सरकार के रवैये पर रोष जताया गया।

समिति के पदाधिकारी राजेश गोयल का कहना था कि शासन जानबूझकर व्यापारियों को परेशान कर रहा है, जिसका परिणाम उसे भुगतना ही होगा। यहां यह उल्लेख करना आवश्यक होगा कि भाजपा के कार्यकाल में चकराता रोड़ टूटा था। व्यापारियों के नाराजगी ने उसे सत्ता से हटा दिया। व्यापारियों के नाराजगी का प्रभाव राजपुर, रायपुर तथा धर्मपुर विधानसभा सीटों पर पड़ा भाजपा इसी से हार गयी। जिसका कारण यह रहा कि भाजपा मात्र 30 सीटों पर सिमट गई और कांग्रेस 31 सीटें जीती। यदि व्यापारी नाराज न होता तो भाजपा के हाथ 33 सीटें आती और प्रदेश में उसकी सरकार होती। इस बार कांग्रेस ने व्यापारियों को परेशान करने का काम किया है। व्यापारियों की नाराजगी कांग्रेस को भी भुगतनी पड़ सकती हैं हालांकि सरकार का प्रयास है कि किसी तरह यह काम उपसंस्था को दिया जाए जैसा सरकार चाहती है। लेकिन जनता की नाराजगी और शासन की कारस्तानी का परिणाम क्या होगा। यह समय बतायेगा।

देहरादून से राम प्रताम मिश्र 'साकेती' की रिपोर्ट. 

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