फेसबुक पर हिंदी-अंग्रेजी को लेकर गर्मागर्म महाबहस

Pushpendra Singh Chandel : कुछ दिन पहले की बात है जब मैं कुम्भ दर्शन हेतु इलाहबाद में था तब मेरे एक करीबी मित्र ने मेरे अधकचरे अंग्रेजी ज्ञान को लेकर लम्बा-चौड़ा भाषण पिलाया, कहने लगे कि आज अगर तुम्हारी अच्छी पकड़ अंग्रेजी भाषा में होती तो आज तुम काफी ऊंचाइयो पे होते…. 'ऊँचाइयाँ' शब्द सुनते ही मैं अपने आपको कभी 'लन्दन ब्रिज' पर पाता, कभी 'टेम्स' के किनारे टहलता पाता, कभी 'बकिंघम पैलेस' के बगीचे में दोनों हाथ पीछे किये हुए सीना बाहर किये हुए अभिमान महसूस करता पाता, एकाएक 'जेम्स बांड' बनकर हसीनाओं को अपने बाहों में पाता…. और ऊंचाइयों के बारे में सोचा तो अपने आपको 'स्टेचू ऑफ़ लिबर्टी' के सामने सीना ताने च्विंगम चबाते हुए 'यस वी कैन' कहते हुए पाया…

एकाएक भीड़ ने धक्का मारा तो अपने आपको 'भारत' में पाया फिर सुरक्षित जगह ढूंढ़कर फिर ध्यान मग्न हुआ तो पाया कि मैं अकेला बुड़बक नहीं हूँ बल्कि कई और भी हैं जैसे- 'फ़्रांसिसी' दुनिया में हथियार बेंचते हैं, 'जर्मनी' तकनीक बेंचता है, 'रूस' शक्ति संतुलन बनाता है, चाइना 'अंकल सैम' को आँखे तरेरता है, 'जापान' जगजाहिर है, साऊथ कोरिया, मलेशिया, वियतनाम, इंडोनेशिया और ना जाने कितने हैं जो अंग्रेजी के अधकचरे ज्ञान से शर्मिंदा होंगे..!

थोड़ा तनाव तो कम हुआ तो मित्र को मैं भी जवाब देने लगा तो उसने पलटकर तपाक से कहा यार ये तेरा दुर्भाग्य ही है कि तुझे अंगेजी नहीं आती…. दुर्भाग्य सुनते ही मैं फिर ध्यानमग्न हुआ तो पाया कि काफी पहले एक लड़की ने मेरे अधकचरे अंग्रेजी के ज्ञान का उपहास उड़ाकर मुझे लिफ्ट नहीं दी थी….अब भला भारत में इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या हो सकता है…. 🙂


Manisha Pandey : हिंदी बोलना या हिंदी में लिखना या कि हिंदी की नौकरी करना और हिंदी की रोटी कमाना क्‍या किसी हिंदी प्रेम का नतीजा है। आप हिंदी में इसलिए बकबकाते हैं क्‍योंकि दिल से हिंदी के लिए मरे जाते हैं। नहीं जनाब, ये इसका नतीजा है कि-
1- आपको हिंदी ही आती है।
2- ये इसका नतीजा है कि संभवत: आप हिंदी प्रदेश से आते हैं।
3- ये इसका नतीजा है कि आप हिंदी मीडियम स्‍कूल में पढ़े हैं।
4- ये इसका नतीजा है कि हिंदी मीडियम सरकारी स्‍कूल सस्‍ते और ऑलमोस्‍ट फोकट में पढ़ाई कराने वाले होते हैं।
5- ये इसका नतीजा है कि जिस घर में आप पैदा हुए, वो घर आपको सरकारी या नॉन सरकारी, लेकिन हिंदी मीडियम स्‍कूल में ही पढ़ाने की हैसियत रखता था, या आपके पिताजी अपने वक्‍त के मिजाज को न समझने वाले, गांधीवादी, सिद्धांतवादी टाइप कुछ रहे होंगे।
6- ये इसका नतीजा है कि आपके शहर के सेंट जोसेफ, सेंट फ्रांसिस, सेंट डॉन बॉस्‍को स्‍कूल की फीस अगर पांच हजार है तो आर्य कन्‍या पाठशाला की फीस पांच रुपया।
7- ये इसका नतीजा है कि आपके द्वारा बोली, लिखी जाने वाली और नौकरी का जरिया बनी भाषा की औकात से ही आपकी सामाजिक औकात तय हुई है।
8- किसी मुगालते में न रहिए। मैं तो नहीं ही हूं। मैं हिंदी में इसलिए नहीं लिखती कि हिंदी के लिए मेरा दिल धड़कता है। इसलिए लिखती हूं क्‍योंकि सिर्फ यही भाषा मुझे तमीज से आती है। वरना अगल बदल सकती तो कब का अपना क्‍लास (वर्ग) बदल चुकी होती।
जैसेकि हिंदी बोलने, लिखने, कमाने, खाने वाले तकरीबन 99 फीसदी लोग अपने बच्‍चों को सेंट जोसेफ और सेंट फ्रांसिस में पढ़ाकर उनका क्‍लास बदलने की तैयारी कर ही रहे हैं।
प्रिसाइसली, "अंग्रेजी क्‍लास की भाषा है, सामाजिक औकात की भाषा है।"

"अब अगर यहां भी आपका स्‍वाभिमान कुलांचे मारने लगे और हिंदी राष्ट्रवादी आत्‍मा पुनर्जागृत हो जाए तो आय एम सॉरी। आय कांट हेल्‍प इट।"
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अंग्रेजी बोलने या अंग्रेजी में लिखने का मतलब जानते हैं आप? अगर नहीं तो क्‍या हिंदी बोलने और हिंदी में लिखने का मतलब जानते हैं? हिंदी में लिखने का मतलब है –
– एक ऐसी भाषा में लिखना जो अंग्रेजी नहीं है, इसलिए ताकतवर की भाषा नहीं है।
– जो अंग्रेजी नहीं है, इसलिए सत्‍ता की भाषा नहीं है।
– जो अंग्रेजी नहीं है, इसलिए दुनिया को चलाने वालों की भाषा नहीं है।
– जो अंग्रेजी नहीं है, इसलिए साम्राज्‍यवाद की भाषा नहीं है।
– जो अंग्रेजी नहीं है, इसलिए ऊंचे पदों और निर्णायक फैसलों की भाषा नहीं है।
– जो अंग्रेजी नहीं है, इसलिए महंगे बाजार की भाषा नहीं है।
– जो अंग्रेजी नहीं है, इसलिए डिसिजन मेकर्स की भाषा नहीं है।
– जो अंग्रेजी नहीं है, इसलिए सुप्रीम कोर्ट, कानून और न्‍याय व्‍यवस्‍था की भाषा नहीं है।
– जो अंग्रेजी नहीं है, इसलिए महान किताबों, विचारों और ज्ञान विज्ञान की भाषा नहीं है।
– जो अंग्रेजी नहीं है, इसलिए गरीबों की भाषा है, कमजोरों की भाषा है। पिछड़ों की भाषा है, सताए हुआ लोगों की भाषा है। उनकी भाषा है, जिनके लिए शिक्षा और ज्ञान के दरवाजे शायद एक या दो पीढ़ी पहले ही खुले हैं। नवसाक्षरों की भाषा है।
अगर आप हिंदी की गदा भांजने वाले हिंदी के दादा हैं, तो आय एम सॉरी टू से, आपकी हैसियत स्‍लम के उस गुंडे की तरह है तो लतियाए हुए लोगों के बीच तो दादा बना फिरता है, लेकिन बड़े डॉन के कमरे में जाते ही रिरियाने लगता है। इसलिए दादाजी, हमें माफ करिए। हमें हिंदी राष्‍ट्रवाद का पाठ मत पढ़ाइए। वी आर नॉट इंटरेस्‍टेड।

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अगर आप हिंदी का राष्‍ट्रवादी गान शुरू करेंगे तो हिंदुस्‍तान के सैकड़ों पत्रकारिता स्‍कूलों से हिंदी में पढ़ाई करके निकल रहे और पांच-पांच हजार रुपए में नौकरी करने को मजबूर हो रहे हजारों-हजार लड़के-लड़कियां आपका मुंह तोड़ देने के लिए कसमसाने लगेंगे। तोड़ न पाएं बात अलग है। बेचारों की औकात ही क्‍या। वो हिंदी में इसलिए पढ़े क्‍योंकि उसी सामाजिक औकात से आते थे। सोचा था, पढ़कर-लिखकर जिंदगी कुछ बदलेगी तो भाषा की औकात ने यहां भी उनका पीछा नहीं छोड़ा और मरते दम तक नहीं छोड़ेगी। वो जहां जाएंगे, हिंदी की लाचारगी और गरीबी उनके साथ जाएगी। उसकी बेहूदगियां भी साथ-साथ जाएंगी। बेहूदगी अंग्रेजी में भी कम नहीं हैं, लेकिन सॉफिस्टिकेटेड, अमीर आदमी की बेहूदगी दिखती कहां है। उसके ऊंचे पहनावे में दब जाती है। आप अपनी हिंदी अकादमियों, परिषदों, संस्‍थानों, विदेश यात्राओं का टोकरा लिए सरकार की दुकान में लाइन लगाए रहिए। हम तो आपकी दुकान के खरीदार नहीं। अपने बच्‍चों को अंग्रेजी मीडियम में पढ़ाएंगे। अंग्रेजी ही सिखाएंगे। वो पत्रकार बने तो अंग्रेजी का और किताब लिखे तो अंग्रेजी में। प्रोफेसर भी अंग्रेजी का ही होगा।
आखिर हमेशा नौकर बने रहना भला किसे पसंद है?


Nadim S. Akhter : वरिष्ठ पत्रकार राहुल देवजी ने 'सम्यक भाषा' नाम से एक पेज बनाया है…सो मैं भी वहां पहुंच गया अपनी बात कहने लेकिन लिखते-लिखते इतना बड़ा लिख गया कि वहां पोस्ट हीं नहीं हो पा रहा है…फिलहाल हिन्दी-अंग्रेजी की लड़ाई की कहानी अपनी वॉल पर पोस्ट कर रहा हूं…फिर वहां भी करूंगा. भाषा छोटी या बड़ी नहीं होती…कोई ऊंची या नीची नहीं होती…कोई क्लास या मास की नहीं होती…ये सारे 'मुहावरे' और भ्रम हमने गढ़े हैं…अपनी सुविधानुसार…

एक रूसी, चीनी, फ्रांसिसी या जापानी अपनी भाषा बोलकर अंग्रेजी बोलने वाले के सामने शर्मिंदा नहीं होता…क्योंकि यह उसकी मातृभाषा है…तो फिर हम क्यों हिन्दी, तमिल, तेलगू, बंगाली आदि अपनी भाषाएं बोलकर शर्मिंदा हों…अपनी मादरी ज़बान में बात करने में भला कैसा संकोच??!! सिर्फ इसलिए कि जिस मजलिस में आप खड़े हैं, वहां अंग्रेजी बोलने-पढ़ने वाले बड़ी तादाद में हैं!!! या फिर ये 'शर्म' आपके अंदर आपका परिवेश-समाज भरता है कि भाई, ये जो हिन्दी भाषा तुम बोल रहे हो, ये 'गरीबों-पिछड़ों' की भाषा है…तरक्की की भाषा तो अंग्रेजी है…उसमें वार्तालाप करोगे तो बड़े समझे-माने जाओगे…फिर टीवी-फिल्म-विज्ञापन की दुनिया में भी आप ऐसे ही तर्क देखेंगे…अरे, राजू तो इंग्लिश बोलने लगा है, साथ में मेम भी है..अरे भइया, राजू तो जेंटलमैन बन गया रे…हुर्रर्रर्र…तब आपको भी लगने लगता है कि अंग्रेजी बोलकर ही आप पढ़े-लिखे समझे जाओगे…आपकी बात को अहमियत मिलेगी और फिर आप भी चूहों की दौड़ (Rat Race) में शामिल हो जाते हैं…अंग्रेजी को साष्टांग प्रणाम करते हैं और मान लेते हैं कि यही आपके विकास की कुंजी है…

लेकिन अगर आपके घर में अंग्रेजी बोलने की संस्कृति नहीं है, तो परिवार-दोस्तों में आप हिंदी में ही संवाद करते रहते हैं और सामाजिक समारोहों-दफ्तर में अंग्रेजी का लबादा ओढ़कर रंगा सियार बन जाते हैं…हां, एक बात और..अगर कभी किसी पर बहुत तेज गुस्सा आ जाता है, तो गाली भी उसे हिन्दी में ही देते हैं क्योंकि गुस्से में और प्यार में, इंसान उसी जुबान में बोलता है, जो उसके दिल की भाषा होती है…

अंग्रेजी भाषा से मेरा कोई विद्रोह या आग्रह-पूर्वाग्रह नहीं है…और सिर्फ अंग्रेजी ही क्यों, आप फ्रेंच सीखिए, चाइनीज सीखिए, कई भाषाएं सीखिए…दुनिया को खूब जानिए-समझिए…इसके लिए भाषा को माध्यम बनाइए, इसे रोड़ा मत बनाइए, इसे दुत्कारिए मत. दुख तो तब होता है, जब एक भाषा को ऊंचा बनाकर उसके सामने दूसरी भाषा को नीचा दिखाया जाता है…और अंग्रेजी-हिन्दी के संदर्भ में ऐसा अक्सर देखता-सुनता हूं…भाई-मैडम, किसने मना किया है आपको अंग्रेजी से प्यार करने को…खूब करिए…लेकिन फिर उसकी तुलना हिन्दी से करके अनावश्यक जिरह मत कीजिए…

कुछ लोगों को लगता होगा कि अंग्रेजी सत्ता की भाषा है…तो है…जब मैं वहां जाऊंगा, अंग्रेजी बोलने वालों से मिलूंगा और अगर वो हिन्दी नहीं समझते हैं, तो उनसे अंग्रेजी में ही संवाद करूंगा…क्यों नहीं…लेकिन अगर सामने वाले को हिन्दी आती है, तो मैं उनसे हिन्दी में ही बोलूंगा…मुझे कोई शर्म नहीं आएगी…शर्म क्यों…आपको तो सामने वाले पर तरस आना चाहिए कि उसे हिन्दी नहीं आती…पूरे देश में समझी जाने वाली भाषा…और आप सामने वाले की तुलना में भाषा ज्ञान में बीस है, उन्नीस नहीं.

मैं साइंस का विद्यार्थी रहा हूं…ये ठीक है कि कई रोजगारपरक पाठ्यक्रमों में किताबें हिन्दी में नहीं हैं…अध्यापन का माध्यम अंग्रेजी है…तो वहां मैं अंग्रेजी में पढ़ंगा…लेकिन इसके लिए हिन्दी को गाली देना कैसी बुद्धिमत्ता है???!! इस देश में अंग्रेजी से पहले राजकाज की कई भाषाएं रही हैं…अंग्रेजों के आने के बाद अग्रेजी आई…उससे पहले फारसी-पाली जैसी कई भाषाएं अलग-अलग समय पर प्रभुत्व में थीं…तो क्या आज हम उन भाषाओं को निकृष्ट और नीचा कहने लगें???!!! नहीं, समय के साथ जरुर चलिए…पेड़ के शीर्ष तक जरूर जाइए लेकिन जड़ों को मत छोड़िए…जड़ कमजोर हुई तो पूरा पेड़ गिरेगा और आपकी हड़ी-पसली भी एक हो जाएगी…

अगर आधुनिक ज्ञान-विज्ञान की किताबें हिन्दी में नहीं हैं, तो हो जाएंगी…उसके लिए हम-सब दोषी हैं…क्यों नहीं हमने अपनी भाषा में अपना विकास गढ़ा…आजादी के बाद सरकारें दोषी हैं, जिसने मैकाले की शिक्षा व्यवस्था को जारी रखा…अंग्रेजी बोलने-लिखने वाला क्लर्क और अफसर…जो सोचता पहले अपनी भाषा यानी हिन्दी में है (अगर हिन्दी भाषी क्षेत्र का है तो) और फिर अपनी बात का अग्रेजी अनुवाद करके उसे प्रकट करता है…और साइंस यानी विज्ञान की भाषा में कहें तो हमारा दिमाग इसे सेकेंड के हजारवें हिस्से से भी कम समय में कर देता है…इतनी जल्दी कि हमें-आपको इसका पता भी नहीं चलता…रूस-जापान-चीन ने आज जो तरक्की की है, वह अपनी भाषा में ही की है…वहां ज्ञान-विज्ञान की किताबें उन्हीं की भाषाओं में है…उनके यहां यदि अमेरिका-ब्रिटेन का कोई वैज्ञानिक जाता है तो उसे ट्रांसलेटर की मदद लेनी पड़ती है…उनका विज्ञान समझने के लिए…उनकी सहूलियत के लिए जापानी अपना शोध विज्ञान अंग्रेजी नें नहीं लिखते-छापते…और अगर भारत में आप ऐसा करते हैं, तो ये आपकी गुलामी वाली मानसिकता है…खुदा के लिए इस मानसिकता से बाहर निकलिए…सरकार को भी ऐसा माहौल बनाना पड़ेगा कि लोगों को देश में हिन्दी और अपनी-अपनी मादरी जुबान में ज्ञान-विज्ञान की किताबें मिलें…पठन-पाठन हो…और जहां जोड़ने की बात है, मसलन यदि किसी तमिल शोध को आप पढ़ना चाहते हैं तो वह आपको हिंन्दी या अंग्रेजी किसी भी भाषा में उपलब्ध हो…

दरअसल भाषा की लड़ाई में हम ये भूल जाते हैं कि भाषा का विकास और विस्तार मानव सभ्यता के विकास के साथ जुड़ा हुआ है और अलग-अलग सभ्यताओं ने अपनी-अपनी भाषा में विकास किया है…कभी-कभी मैं ये सोचता हूं कि अल्लाह ने कुरान, अरबी भाषा में ही क्यों उतारी?? तो इसका जवाब ये मिलता है कि उन बेहतरीन आयतों को सुनाने के लिए उस वक्त दुनिया में अरबी के अलावा और कोई भाषा सक्षम नहीं थी…इस पर आप विवाद कर सकते हैं और मैं उसमें नहीं पड़ना चाहता…हां कुरान की तिलावत करने के लिए मैंने अरबी सीखी है…और जब अरबी में आयतें पढ़ता हूं तो उर्दू में उसका तर्जुमा (TRANSLATION) भी पढ़ने की कोशिश करता हूं…आपमें से भी कइयों ने वेद-गीता पढ़ने के लिए संस्कृत सीखी होगी…मैं भी संस्कृत पढ़ लेता हूं क्योंकि यह स्कूल में मेरे पाठ्यक्रम में था और मुझे आपको ये बताने में खुशी हो रही है कि मैं स्कूल में स्ंस्कृत में टॉपर था…खैर, बात हो रही थी भाषा की, तो जिसे जितनी-जैसी जरूरत है, वह वैसी भाषा सीख लेता है…इससे ना कोई बड़ा बन जाता है और ना कोई छोटा…

सो अगली बार जब आप किसी भाषा को गरियाएं या उसे छोटे-बड़े के तराजू में तौलें तो सबसे पहले ये सोचिएगा कि उस भाषा को सीखने के लिए आपने कितने जतन किए हैं???!!! अगर नहीं, तो कम से कम उन लोगों का अपमान तो मत कीजिए, जो उस भाषा को जीते हैं. धन्यवाद.

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फेसबुक पर भाषा सम्बंधी एक बहस चल रही है…मेरी कुछ वॉल पोस्ट से कुछेक मित्रों को शायद ये संदेश गया है कि मैं अंग्रेजी भाषा का विरोधी हूं…लेकिन ऐसा बिलकुल भी नहीं…भाषा से कैसा द्वेष या वैर…अच्छा तो ये हो कि आप दुनिया की ज्यादा से ज्यादा भाषाओं को सीखें-जानें और अगर कोई भाषा आपको रोजगार प्रदान करने में सहायक है तो सोने पे सुहागा…मुझे भी जब-जब मौका मिला है, अपनी बात मैंने अंग्रेजी भाषा के माध्यम से भी रखी है लेकिन हिन्दी मेरे दिल के ज्यादा करीब है…और ऐसा कहने में मुझे कोई संकोच-शर्म नहीं…

कुछ समय पहले जब मैं न्यूज 24 में काम कर रहा था, तो उसकी वेबसाइट पर मैंने अंग्रेजी में ही अपनी बात कही थी और मौका मिलेगा तो दुनियाभर के अंग्रेजी अखबारों-वेबसाइट्स पर लिखूंगा…वैसे फ्रेंच सीखने की भी तमन्ना है और अगर वक्त ने साथ दिया तो इसे जरूर सीखूंगा…


Rahul Dev : मैं एक कड़वी बात कहना चाहता हूं आज। बहुत सोचने के बाद एक बात समझ में आई पिछले दिनों। अच्छी हिन्दी से चिढने वाले अधिकांश लोग अंग्रेजी-वंचित हैं, अपनी इस वंचना पर ग्लानि से भरे हैं, इसलिए जो एकमात्र भाषा उन्हें आती है उसपर सहज, सगर्व होने की बजाए शर्म से भरे हैं। यह आत्मग्लानि हिंग्लिश को जन्म देती है। यह हिन्दी-द्रोह में भी बदलती है जैसा हम कई लोगों में देख रहे हैं। मैं भाषा संबंधी अपने हर भाषण में कहता हूं। यहां भी कह रहा हूं। कि प्रकृति ने हम सबकों बहुभाषी बनाया है। हम जब जो भाषा सीखना चाहें सीख सकते हैं, बशर्ते हमें ठीक सिखाने वाले मिलें, तरीका सही हो और हम निष्ठा से सीखें। यह भी कहता हूं कि हर हिन्दी वाले को, युवा हिन्दी पत्रकार को अंग्रेजी घोट जानी चाहिए। और तब हिन्दी का, हिन्दी में काम करना चाहिए। और हम सब यह कर सकते हैं, अपनी अपनी क्षमता और स्थिति के अनुसार।

अपनी भाषा से प्रेम करना, गर्व करना अंग्रेजी या किसी भी भाषा का विरोध करना नहीं है। मैंने खुद अंग्रेजी बाकायदा घोटकर सीखी है। उससे विधिवत प्रेम करता हूं। उसमें लिखता हूं, बोलता हूं, भाषण देता हूं। उससे अपार ज्ञान, समझ, अवसर पाए हैं। समृद्ध हुआ हूं। रोज होता हूं। वैसे ही जैसे हिन्दी से, संस्कृत से भी रोज समृद्ध होता हूं। मैं अपने हिन्दी भाषी मित्रों, युवा पत्रकारों को अंग्रेजी सिखाना भी चाहता हूं, लेकिन यूं कि हिन्दी से, भोजपुरी से, अवधी-मैथिली-ब्रज-अंगिका से उनकी दूरी बढ़े नहीं कम हो। वे कई भाषाओं के संसार में विचर कर ज्यादा ज्ञानवान, ज्यादा खुले, ज्यादा संस्कृत, ज्यादा समृद्ध बनें। किसी एक भाषा के सौन्दर्य से सघन परिचय, उसका आस्वाद आपको सारी भाषाओं के सौन्दर्य से जोड़ता है। उनका आस्वाद करना सिखाता है। आदर करना सिखाता है।

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ढेरों हिन्दी वालों को, हिन्दी लेखकों, पत्रकारों, मठाधीशों, सरकारी-गैर सरकारी दुकानदारों को अच्छी हिन्दी, प्रांजल हिन्दी कठिन लगती है, पंडिताऊ और उसके विकास में बाधा की तरह लगती है। वे हर मंच से हिन्दी को सरल होने का उपदेश देते रहते हैं। क्या आपने अंग्रेजी में यह विमर्श सुना है जहां अंग्रेजी के लेखक, अध्यापक, पत्रकार आदि अंग्रेजी के कठिन होने से परेशान दिखते हों…ढूंढिए, नहीं मिलेगा। अच्छी भाषा, नए शब्द पढ़-सुन कर, अर्थ का अंदाज लगाकर समझने से आते हैं। संसार की कोई भी भाषा सरल या कठिन नहीं, कोई शब्द सरल या कठिन नहीं। शब्द केवल परिचित या अपरिचित होते हैं। परिचित सरल लगते हैं, अपरिचित कठिन।

अपने लिए अपरिचित और इसलिए कठिन लगने वाले शब्दों तक हम खुद पहुंचते हैं प्रयास करके तो वे परिचित और यूं सरल हो जाते हैं। भाषा ज्ञान ऐसे ही बनता है। इसीलिए हर भाषा में शब्दकोश हैं। इसीलिए हर गंभीर भाषाप्रेमी के पास उसकी प्रिय भाषा के शब्दकोश मिलते हैं। हिन्दी वाले अपने शब्दकोश खरीदते नहीं, पढ़ते नहीं, जरूरत नहीं समझते, नए शब्द सीखने, परिचित शब्दों के नए, गहरे अर्थ जानने की। अपुनी ही भाषा को बेहतर, उच्चतर बनाने में दिलचस्पी नहीं रखते और अच्छी हिन्दी को कठिन कहते हैं। अद्भुत है यह दैन्य। यह आत्महीनता। अंग्रेजीवाला भी हूं इसलिए कह सकता हूं वहां ऐसा घटिया, शर्मनाक नज़ारा नहीं दिखता।

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एक भाषा वह होती है जिसका हम हर तरह के या कुछ तरह के संप्रेषण के लिए इस्तेमाल करते हैं। एक वह होती है जिसके माहौल में हम जन्मते हैं, पलते बढ़ते हैं। जो हमारे भीतरी बौद्धिक व्यक्तित्व और संसार को गढ़ती है। उस अर्थ में वह हमारे स्व की मां है जैसे हमारे शरीर की मां हमारी जननी। पहली वाली भाषा हमारे लिए एक उपकरण है, माध्यम है। दूसरी तरह की हमारी निर्माता। जब दोनों में संगति हो, अंतर्विरोध न हो तो सबसे अच्छी स्थिति होती है। हमारा व्यक्तित्व और हमारा संप्रेषण, हमारा व्यवहार सहज होते हैं। सुंदर और अर्थवान और पुष्ट।
दुर्भाग्य से हमारी लंबी गुलामी ने करोड़ों भारतीयों के जीवन में उनकी निर्मात्री भाषा, यानी उनकी मातृभाषा, और बाहरी जीवन में प्रगति की भाषा को अलग अलग करके एक भीतरी शून्य पैदा कर दिया है।

कमजोर लोग इस बाहरी भाषा यानी अंग्रेजी से आक्रांत, उससे जुड़ने और उसके तथाकथित अभिजात, संपन्न, शक्ति-प्रतिष्ठा प्राप्त समाज में प्रवेश को आतुर लेकिन असफल हो अपने आप पर एक शर्म से भरने लगते हैं, भर गए हैं। इस शर्म को सबसे खुले और बदसूरत तरीके से अभिव्यक्त करती है आज वाइरस की तरह फैलती हिन्ग्लिश। और यह सबसे ज्यादा हिन्दी, पंजाबी भाषियों में दिखती है। अपने हिन्दी होने पर ग्लानि, एक प्रच्छन्न आत्मघृणा से भरा यह वर्ग चाहता तो है कि अंग्रेजी के क्लब में प्रवेश पा ले लेकिन चूंकि वह नहीं कर पाता तो अपने घर और घर वालों से घृणा करने लगता है। और यूं कहीं का नहीं रहता। उसका व्यवहार, भाषिक और दूसरा भी, उसके अंग्रेजीनुमा लटके झटके इस अंग्रेजीकामना में उसे हास्यास्पद, दयनीय और दीन बनाते हैं भले ही वह ऊपर से अतिआक्रामक, उद्दंड, दूसरे को चोट पहूंचाने, चौंकाने को उद्यत दिखे।
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चलते चलते बस एक बात। हर व्यक्ति, हर रिश्ते की तरह हर भाषा की अपनी गरिमा होती है। चूंकि हमारी भाषा हमारी मां भी है इसलिए उसकी गरिमा से मत खेलिए। उसे दीनताजन्य मिलावट से खंडित और दूषित मत करिए। उसकी गरिमा को वैसे ही बचाइए, बढ़ाइए जैसी अपनी मां की, अपनी बेटी की, अपनी प्रेयसी या प्रिय की बचाते हैं। अपनी मातृभाषा बदलना, उसे छोड़ दूसरी को अपनाना अपनी मां बदलना है।


Srijan Shilpi : मनीषा पांडेय ने आलोक राय की किताब "Hindi Nationalism" का जिक्र किया था। गूगल बुक्स प्रिव्यू में उपलब्ध उसके कुछ अंशों को पढ़ते हुए संविधान निर्माण के दौर के एक दिलचस्प प्रसंग पर नज़र गई। जवाहर लाल नेहरू ने संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किए जाने के उपयुक्त भाषाओं की सूची तैयार करने का जिम्मा एम. सत्यनारायणन को सौंपा था। उन्होंने भारत की 12 प्रमुख क्षेत्रीय भाषाओं की सूची नेहरू को सौंपी। नेहरू ने उस सूची में 13वीं भाषा के रूप में 'उर्दू' को जोड़ दिया। तब किसी हिन्दी के हिमायती सदस्य ने उनसे पूछा कि यह उर्दू किनकी भाषा है?

नेहरू का उत्तर था, "यह मेरी और मेरे बाप-दादाओं की भाषा है।"

तो उक्त सदस्य ने उनको उत्तर दिया, "ब्राह्मण होते हुए भी उर्दू को अपनी भाषा कहते हो, शरम नहीं आती?"

नेहरू ने कोई उत्तर नहीं दिया।

संविधान सभा ने अंतत: उस सूची में 14वीं भाषा के रूप में 'संस्कृत' को जोड़ते हुए आठवीं अनुसूची को अनुमोदित कर दिया।


Manisha Pandey : With all due respect for Mr. Rahul Dev ji -मैं स्‍कूल की दसवीं कक्षा का "हिंदी हमारी मातृभाषा है" पर कोई ललित निबंध नहीं लिख रही हूं। मैं जीवन और समाज से जुड़ी कुछ ठोस सच्‍चाइयों की बात कर रही हूं। मैं सहज हिंदी-सरल हिंदी, क्लिष्‍ट हिंदी-विरल हिंदी की भी बात नहीं कर रही हूं। मैं किसी हिस्‍टॉरिकल डिस्‍कोर्स में नहीं जाऊंगी। फेसबुक उसकी जगह नहीं है और न इतना वक्‍त है मेरे पास। मैं तो अपनी, इसकी, उसकी और सबकी जिंदगी से जुड़े कुछ ठोस सवाल पूछ रही हूं। जवाब दें –
1- हमारे शहरों के अंग्रेजी स्‍कूलों की फीस 5000 है और हिंदी स्‍कूलों की फीस 5 रुपया। क्‍यों?
2- इंग्लिश मीडियम में पढ़ने वाले सारे अपर क्‍लास, कारों से आने वाले बच्‍चे हैं और हिंदी मीडियम में पढ़ने वाले मुहल्‍ले की पान की दुकान पर घूमने वाले लड़के या कम उम्र में ही दुपट्टा डालने वाली डरी, सहमी, चुप्‍पी लड़कियां हैं। क्‍यों ?
3- सेंट फ्रांसिस के बच्‍चे जितने कॉन्फिडेंट होते हैं, उनका दुनिया का जितना एक्‍सपोजर होता है क्‍योंकि वो अमीर बाप के बेटे हैं, सरकारी हिंदी मीडियम के बच्‍चे उतने ही दब्‍बू और डरे हुए होते हैं। क्‍यों?
4- अब स्‍कूलों को मारिए गोली। चलिए महान मुल्‍क के महान पत्रकारिता स्‍कूलों की सैर करते हैं। अगर अभी तक आपने शोध नहीं किया है तो अब कर लें और फिर मुझे बताएं कि हिंदी पत्रकारिता स्‍कूलों में पढ़ने वाले 99.9 बच्‍चे हिंदी प्रदेशों के निम्‍न मध्‍यमवर्गीय परिवारों के होते हैं। वो अमीर घरों के लड़के नहीं होते। क्‍यों?
5- देश के श्रेष्‍ठतम पत्रकारिता स्‍कूलों के इंग्लिश मीडियम से पढ़कर निकले लड़के-लड़कियां 20,000 रु. में पहली नौकरी की शुरुआत करते हैं और हिंदी के लड़के-लड़कियां पांच हजार रु में। क्‍यों?
6- जिंदगी भर उनके इंक्रीमेंट भी उसी दर से होते हैं। वो लड़ नहीं बातें, काबिल हों तो भी आत्‍मविश्‍वास से अपनी बात नहीं कह पाते। उनकी जिंदगी में इकोनॉमिक सिक्‍योरिटी नहीं है। उन्‍हें यकीन नहीं कि अगर बॉस ने उनके सेल्‍फ रिस्‍पेक्‍ट के साथ ज्‍यादा मेस किया तो वो कोई फैलोशिप लेकर हार्वर्ड चले जाएंगे। उनके पास विकल्‍पों के एक हजार दरवाजे खुले हैं। वो तो इतने डरे हुए होते हैं कि उनके लिए इतना ही काफी है कि बस नौकरी बची रहे, बनी रहे। क्‍यों?
6- टाइम्‍स ऑफ इंडिया में काम करने वाली लड़कियां ऑक्‍सफोर्ड और कैंब्रिज से डिग्री लेकर लौटी हैं और दैनिक जागरण में काम करने वाली लड़कियां मऊ, आजमगढ़, इलाहाबाद, आरा-छपरा के आर्यकन्‍या इंटर कॉलेज से। क्‍यों?
7- अगर आपको लगता है कि हिंदी या इंग्लिश में पढ़ना दरअसल आपके इकोनॉमिक क्‍लास और सोशल स्‍टेटस का मसला नहीं है तो आप या तो बड़े भोले हैं या फिर बड़े ही शातिर। क्‍यों?

8- और आखिर सबके बच्‍चे हिंदी पत्रकारों के, हिंदी लेखकों के, हिंदी अधिकारियों के, हिंदी के एक्‍स वाई जेड के बच्‍चे इंग्लिश मीडियम में ही पढ़ रहे हैं। क्‍यों?
9- वो सब के सब अंग्रेजी की नौकरी करेंगे। अंग्रेजी के जरिए अपना क्‍लास चेंज करेंगे। क्‍यों?

With All due respect Sir, हिंदी या अंग्रेजी जानना या बोलना, या पढ़ना, या लिखना या उसमें नौकरी करना आपकी भावना का, आपके भाषाई प्रेम और चयन का सवाल नहीं है। ये क्‍लास का सवाल है। और अब आप प्‍लीज ये मत कहिएगा कि क्‍लास भी exist नहीं करता है। कि क्‍लास के बीच कोई पावर इक्‍वेशन भी exist नहीं करता है।

फेसबुक से.

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