फोटोग्राफर का कालर पकड़ने के आरोपी हृषिकेश सुलभ ने फेसबुक पर दी सफाई

Hrishikesh Sulabh : आज …अभी थोड़ी देर पहले मेरे अभि‍न्‍न मि‍त्र और वरीय पत्रकार श्रीकांत का फोन आया. वे कलीदास रंगालय में हुई 8 नवम्‍बर की घटना के बारे में जानना चाह रहे थे। उनसे हुई सारी बातें शायद यहां उपयोगी न हों. पर इतना सच है कि‍ यह पोस्‍ट उस फोन के बाद ही लि‍खा जा रहा है. एक घटना याद आ रही है. युवा पत्रकारों के लि‍ए शायद उपयोगी हो. पटना हि‍न्‍दुस्‍तान ने राजेन्‍द्र यादव को अति‍थि‍ के रूप में बुलाया था.उनसे मि‍लने के लि‍ए नगर के तमाम लेखकों को आमंत्रि‍त कि‍या गया. राजेन्‍द्रजी से बातें चल रही थी कि‍ हि‍न्‍दुस्‍तान पटना के मैनेजमेंट पक्ष के सबसे वरीय व्‍यक्‍ति‍ उपस्‍थि‍त हुए.

उन्‍होंने लेखकों को लगभग लताड़ने के अंदाज में उपदेश देना आरम्‍भ कि‍या. सारे लेखक हत्प्रभ. मौन. पत्रकार अपने मैनेजमेंट के खौफ़ से लगभग आतंक में और मौन. अंतत: मैंने बीच में उनको बोलने से रोका और कहा कि‍ आप अपने अखबार में नंगी तस्‍वीरें छापें, अपराधि‍यों का महि‍मामंडन करें और व्‍यवसाय के नाम पर सत्‍ता की दलाली करें और लेखकों कवि‍यों की नि‍न्‍दा करें कि‍ वे जनता को संस्‍कारवान नहीं बना रहे हैं, यह उचि‍त नहीं. इसके बाद सभा स्‍थगि‍त हुई. सबने सुकून की सांस ली. सबसे ज्‍यादा सुकून पत्रकारों को मि‍ला. हि‍न्‍दुस्‍तान दैनि‍क के सारे पत्रकार इस सभा के साक्षी रहे हैं.

युवा प्रेस फोटोग्राफर मि‍त्रों, आपसे सच बोलने की उम्‍मीद थी मुझे. पर आपने कई झूठ बोले.पर यह भी सम्‍भव है क्‍योंकि‍ आत्‍मरक्षा में मनुष्‍य अक्‍सर ऐसा करता है. आप जि‍न स्‍थि‍ति‍यों में अपने संस्‍थानों में काम कर रहे हैं, वह गुलामी से भी बदतर है. मैं यह जानता हूं और इस पीड़ा के मर्म को महसूस करता हूं. ऐसी जीवन स्‍थि‍ति‍यां एक ओर कायरता को जन्‍म देती हैं तो दूसरी ओर झूठे अहं को. दंभ को.

एक लेखक अखबार का मुखापेक्षी नहीं होता. और इन दि‍नों तो वैसे भी अखबार में लेखकों, कवि‍यों और कलाकारों के लि‍ए जगह नहीं बची है. आज मेरे कई मि‍त्र अखबारों में ऊंची कुर्सि‍यों पर बि‍राज रहे हैं. उनका दर्द साझा करता रहता हूं. कई अनुजवत हैं. मैं पत्रकारि‍ता के सच से परि‍चि‍त हूं साथि‍यों. आपने जो धमकि‍यां भि‍जवायी हैं उनको सुनकर हंस भी नहीं पा रहा क्‍योंकि‍ मुझे आपके भीतर के उस मनुष्‍य की चि‍न्‍ता है, जि‍से आज की पत्रकारि‍ता ने कमजोर कि‍या है. आपके ही कांधों पर चढ़कर जाना है और आपके कांधे इतने कमजोर हों तो भला रोने के सि‍वा, उदास होने के सि‍वा और क्‍या हो सकता है.

बेहतर हो मुझ पर कीचड़ उछालने के बदले आप अपने को ताकतवर बनाएं और जीवन के इस संघर्ष में अपने भीतर के अच्‍छे मनुष्‍य को जीवि‍त रखें. उस दि‍न की घटना ने मुझे भी आहत कि‍या है. नाटक देखना भी एक कला है. फोटो उतारना भी. राजनेताओं की सभा और नाटक के मंचन का फर्क समझना होगा हमें. काश उस दि‍न यह सब नहीं हुआ होता. मैं अपने को भी नि‍र्दोष नहीं मान सकता. मेरा आवेश चाहे जि‍स कारण से उपजा हो, उसे मैं उचि‍त नहीं ठहरा सकता. यह मेरे लि‍ए भी आत्‍मवि‍श्‍लेषण का समय है. आपके लि‍ए भी. भाषा भी हिंसा करती है. चाहे आप करें या मैं. यह उचि‍त नहीं. उम्‍मीद है हम सब जल्‍दी ही कि‍सी नाटक के प्रदर्शन में मि‍लेंगे और मैं हौले से आपके कांधे पर मुस्‍कुराते हुए हाथ रखूंगा. आमीन.

     Avinash Das पहली बात तो ये कि ऐसा कोई भी दुर्व्‍यवहार नहीं हुआ है। हमलोग जब पटना में नाटक वगैरा किया करते थे, उस वक्‍त अखबारों में ब्‍लैक एंड व्‍हाइट तस्‍वीरें छपा करती थीं। चाहे वो कृष्‍णमुरारी किशन हों, कृष्‍णमोहन हों, चित्राली या सुनील राज हों – वो नाटक के बीच में आते थे और बिना फ्लैश की तस्‍वीरें इस तरह से खींच कर गायब हो जाते थे कि दर्शकों को न तो दिक्‍कत होती थी, न ही उन्‍हें एतराज होता था। ये जो पत्रकारिता के नये चमन हैं, इन्‍हें न तो संस्‍कृति की समझ है न समाज की। मैं अगर हृषीकेश सुलभ की जगह होता और नाटक के बीच कोई कैमरामैन मेरे सामने आकर खड़ा हो जाता और फ्लैश चमका चमका कर मेरी तंद्रा भंग करता, तो मैं उसकी चुटिया पकड़ कर बाहर करता। सुलभ जी से मैं नाराज हूं कि उन्‍होंने गांधी जी की अहिंसा का सहारा लिया, उन्‍हें तो गुरुमुद्रा में आकर तमाम कैमरामैन को एक एक थप्‍पड़ लगाना चाहिए था। पत्रकार पूरे समाज को खारिज करके अपनी उपस्थिति को महत्‍वपूर्ण नहीं बना सकते – जैसा कि लगभग सभी पत्रकारों की अब आदत हो चली है।
 
 
    Prabha Sharma अधिकार की आकांक्षा व्यक्ति से बेगार करवाती है .
    
    Hrishikesh Sulabh Avinash Das मैं इसी असंवैधानि‍क वि‍शेषाधि‍कार के दंभ पर चोट करना चाहता था……मुझे इसके दर्द का पता है……पहले भी अपने एक अंतरंग मि‍त्र और times of india के पटना पटना संस्‍करण के एक रेजि‍डेन्‍ट एडि‍टर के साथ जूझ चुका हूं। ……फि‍र वधस्‍थल से छलांग याद करो…वह भी इसी वि‍शेषाधि‍कार पर चोट है……
     
    Mohan Rawat Claps and Kudos………..Main khush hoon ek awaz buland huyi hai….naukri ka saya hi darr ka saya hai…kaddvar log bhi pistol ke saamne sahitya ko bhool kar kuchh bhi kartain hai…aur hamane to suna hai ki log payroll par hain…kahin se paisa aata hai aur jeb garm hone ki garmi main log wah wah karte rahte hain………mukh mandal se ya kalam se……….ek baar phir se mera salaam apki koshish ke liye…..
     
    Rajesh Ranjan Patrakarita ke suruati waqt se sulabh ji ke prati adar ka bhaw raha hai, rahega bhi. Unse adhikar purvak agrah hai ki we nayi pidhi ka margdarshan karen. Mai ye manta hun ki sahitya aur natak ki dunia se jure log jyada sensitive hote hain par patrakar/photographar sathiyon ke uddeshya ko bhi to samajhna hoga. Khabar/photo lene ke alawa koi negative uddeshya to nahi raha hoga na! Khud sulabh ji bhi ye man rahe hain ki us din jo hua wo nahi hona chahiye. Avinash ji, aapki baton par apatti hai ki aap hote to chtiya pakarkar bahar nikal dete-thappar lagana chahiye. Ye galat bat hai.
     
    Vivek Mishra सुलभ जी , आपसे कुछ गलत नहीं हुआ. रही बात अगर कोई कीचड़ उछाल रहा है तो वह आपसे वाकिफ नहीं है. इसके इतर ये भी कहना चाहूंगा, कि फोटो खीचने की विधा वाले और खबर लाने और लिखने की विधा वालों में कुछ फर्क होता है. ऐसा माना जाता है कि अक्सर फोटो खीचने वाले समाज और संस्कृति को नहीं समझते हैं. लेकिन ये कहां तक सच है ? मैं तो मानता हूं कि वे समझाना क्या है ये नहीं समझते हैं. और हमेशा इसी चाह में हमारे आपके लिए फोटो खीचते रहते हैं . एक साथी कह रहे हैं कि पत्रकार भी नहीं समझते हैं . हो सकता है. किसी से उनकी भेंट हो गई हो. बस यही कहूंगा कि हाथपाई और मारपीट एक प्रकार की कायरता और कुंठा ही है. कोई पत्रकार खासकर नए चमन का विशेषाधिकार के लिए किसी कार्यक्रम में नहीं जाता है. कार्यक्रम को कवर करने वहां के विशेषाधिकार लोगों से जो तंद्रा भंग नहीं करते उनसे जानने समझने जाता है. हो सकता है उसने दो किताबे किसी विशेषाधिकार प्राप्त व्यक्ति से कम पढ़ी हों. औऱ ये भी कहूंगा कि जो पत्रकार ऐसा नहीं करते दरअसल वे किसी भी क्षेत्र में होते चाहे वो लेखक होते, अपना काम करते आदि तो वे दंभी ही होते हैं. ऐसा नहीं है कि जिन्होंने पत्रकारिता छोड़ दी. और लेखकों विशिष्टों की कतार में बैठने लगे वे दंभी नहीं है. सवाल है मारिए पीटिए फोटोग्राफर और नए चमन का पत्रकार ही तो है इसके लिए. उसे यानी नव पीढ़ी को कुछ दे नहीं सके तो मार पीट ही कर लीजिए. याद रखे मारपीट में भारी जवान खून ही पड़ेगा.
     
    Chandreshwar Pandey बड़े भाई सुलभ जी , आपकी टिपण्णी पढ़कर अखबार की सभा का सच जान पाया…..अदभुत साहसिक हस्तक्षेप है आपका …आपके साहस को बार -बार सलाम करता हूँ ….
     

    Saroj Kumar आखिर हमारे वरिष्ठ और तथाकथित सम्मानित बुद्धिजीवि-रंगकर्मी-साहित्यकार कैसी नई पीढ़ी चाहते हैं, वे ऐसी पीढ़ी चाहते हैं जो उनके सम्मान-गुणगान में ही झुकी रहे और वे कुछ भी करते फिरें, नई पीढ़ी के सामने पुरानी पीढ़ी यहीं आदर्श बनाना चाहती है क्या…मैं उन सारे पुरानी पीढ़ियों के लोगों से जवाब मांगता रहूंगा, कुछ दिन पहले आलोक धन्वा पर भी मैंने ऐसे ही सवाल खड़े किए थे जब वे विशेष राज्य के मुद्दे पर नीतीश सरकार के प्रवक्ता की तरह बिहैव कर रहे थे…बेशक ये लोग मुझे दो कौड़ी का भी ना समझें या अनआइंडेंटीफाइड बताते रहे…मैं सवाल खड़ी करने वाली नई पीढ़ी चाहता हूं…

    Kamlesh Verma मैं सरोज के साथ अपनी एकजुटता जताना चाहता हूँ।
 
    Mrityunjay Prabhakar Dono hi pakshon ne todi thi maryada .. Pandavon ne kuchh kam kauravon ne kuchh jyada.
 
    Abhishek Srivastava Mrityunjay Prabhakar diplomatic line ले रहे हैं गुरु…
   
    Mrityunjay Prabhakar Haqeeqat Yahi hai.. Main to ayojak hun. Mujhe pata hai wahan kiya Hua hai.
    
    Abhishek Srivastava Mrityunjay Prabhakar क्‍या हुआ था, बिल्‍कुल आंखों देखा बताइए तो समझने में आसानी होगी।
    
    
    Saroj Kumar Avinash Das कॉलर पकड़ कर धक्का देना कोई दुर्व्यवहार आपको नहीं लगता तो फिर क्या कहा जाए….और हां पटना ही नहीं सारे जगहों के पत्रकारिता के कल्चर को आप थप्पड़ लगा कर सुधारना चाहते हैं गालियां दे कर सुधारना चाहते हैं तो माफ करिएगा नई पीढ़ी आपकी तरह उथला नहीं सोच रही…हम नए चमन जरुर हैं लेकिन आपकी तरह इतने उतावले और नहीं कि स्थायी समाधान की बजाय थप्पड़ चलाते फिरे…
 
    Avinash Das @Saroj Kumar सरोज जी, आपके ही शिक्षक दिलीप मंडल ने एक किताब लिखी – मीडिया का अंडरवर्ल्‍ड। उन्‍होंने बताया है कि कैसेट मीडिया हाउस का पहला और अंतिम सरोकार बिजनेस है। इसलिए पत्रकार मार खा कर भी अपने मालिकों के खिलाफ बगावत करके जनता और दर्शक का पक्ष नहीं ले सकते। इसलिए सुधरने-सुधारने जैसी लाइन तो बाद की बात है – हम तो समकालीन कॉरपोरेट मीडिया का बायकॉट करने की बात कर रहे हैं।
   
    Saroj Kumar Avinash Das तो करिए बॉयकॉट किसने रोका है लेकिन आपको अपने उपर थप्पड़ भी चलाने हम नहीं देने वाले…जिन फोटोग्राफरों की बात आप कर रहे हैं वे भी अपने लिए लड़ना जानते हैं….बॉयकॉट की बात उन आयोजकों से कहिए जो कॉरपोरेट मीडिया की बाट जोहते रहते हैं…
   
    Avinash Das भाई, कोई नाटक देखते हुए मेरे सामने खड़ा होकर मुझे डिस्‍टर्ब करेगा, तो मैं क्‍या करूंगा। निरीह नागरिक की तरह मन ही मन बहुत थप्‍पड़ मारूंगा, क्‍योंकि मैं जानता हूं सत्ता के पास लाठी होती है… सो महाराज – सारी भैंसे आपको ही मुबारक। थप्‍पड़ मारने की बात एक प्रतीकात्‍मक गुस्‍सा है – हमारी औकात थप्‍पड़ मारने की नहीं।
     
    Mrityunjay Prabhakar Saroj aise baat kah rahe hain jaise yah kam ayojakon ne kiya hai. Aur jaise Aap is corporate media men kam karne ko vivash hain Waise hi hum khabron ke liye us par nirbhar hain. Aap logon ko bahishkar hi karna tha to sulabh jee ka bahishkar karte page ke ayojanon men.. Karkram ka bahishkar kyun kiya yah meri samajh se pare hai.
     
    Saroj Kumar Mrityunjay Prabhakar प्रभाकर जी बॉयकॉट की बात अविनाश जी कह रहे हैं कि कॉरपोरेट मीडिया का बॉयकॉट करें तो जरा उन्हें भी बताएं अपनी मजबूरी
     
    Saroj Kumar Avinash Das अविनाश जी देखिए आयोजक क्या कह रहे हैं, जरा इन्हें कॉरपोरेट मीडिया के बॉयकॉट की बात समझाइए….
     
    Mrityunjay Prabhakar Main to media dwara hamare Karkram ke bahishkar ki baat kar raha hun bhai.
     
    Avinash Das Mrityunjay Prabhakar भाई, अहंम्‍मन्‍यता और अहंकार – ये दो प्रिय आभूषण हो चले हैं इन पत्रकारों के… काफी बुरा समय है साथी | गरज रहे हैं घन घमंड के नभ की फटती है छाती | अंधकार की सत्‍ता चिल-बिल चिल-बिल मानव-जीवन | जिस पर बिजली रह-रह अपना चाबुक चमकाती | संस्‍कृति के दर्पण में ये जो शक्‍लें हैं मुस्‍काती | इनकी असल समझना साथी | अपनी समझ बदलना साथी 🙂
     
    Saroj Kumar Mrityunjay Prabhakar मीडिया द्वारा आयोजन के बॉयकॉट की बात आप कह रहे हैं तो जहां फोटोग्राफर-पत्रकारों को पीटा जाएगा वहां कौन भेजना चाहेगा इन्हें… और हां एक बात तो आप सबों को पता है कि इन जैसी कलाओं की कवरेज लगातार घटती जा रही है, ऐसे में कुछ पत्रकार ब…See More
     
    Avinash Das फिर गलतबयानी… कभी कॉलर पकड़ने की बात होती है, कभी पीटने की बात होती है… अरे बात सिर्फ इतनी हुई थी कि बांह पकड़ कर सामने से हटा दिया गया – क्‍यों वितंडावाद के शिकार हो रहे हैं। विश्‍वसनीय पत्रकार की तरह टिप्‍पणी कीजिए। आप एक न्‍यायप्रिय युवा लगते रहे हैं मुझे।
     
    Saroj Kumar Avinash Das गलतबयानी क्या …पीछे से कॉलर पकड़ कर खिंचा और धक्का दिया गया था…
     
    Avinash Das ये आपका स्‍टेटमेंट है : मीडिया द्वारा आयोजन के बॉयकॉट की बात आप कह रहे हैं तो जहां फोटोग्राफर-पत्रकारों को पीटा जाएगा वहां कौन भेजना चाहेगा इन्हें… 🙂
     
    Mrityunjay Prabhakar Yah to Yahi baat hui ki hall men kuchh bhi hua hai to sari jimmedari ayojakon ki. Ayojak bechare hi us din stage par natak kar rahe the. We kya karte.. Natak chodkar jhagda sultate.


फेसबुक से इकट्ठा की गई हैं उपरोक्त टिप्पणियां. मूल खबर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें…  हृषिकेश सुलभ ने प्रेस फोटोग्राफर का कालर पकड़ा, धक्का-मुक्की की


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