फ्रीलांसर से टेबलायड की मालकिन बनीं अमृता मौर्य का मूल मंत्र है- एक्ला चलो रे

Amarendra Kishore : हर चेहरे के पीछे एक कहानी होती है जैसे हर सफ़लता के साथ न जाने कितनी असफलताओं के अफ़साने चस्पा होते हैं। ज़िंदगी में जैसा चाहो वैसा मिलना संभव होता नहीं और चाहना पूरी न हो तो जमाने और अपनों के न जाने कितने उलाहने–इतनी जलालत जैसे आपने न जाने कितनो के भरोसे को तोडा है। मगर जो अपने धुन के पक्के होते हैं उनके रस्ते भी अलग होते और उनकी मंजिल भी कुछ ख़ास होती है। भारतीय जनसंचार संस्थान की संगी अमृता मौर्य Amrita Maurya ने बडे धैर्य के साथ ज़िंदगी में संघर्ष किया और प्रतिकूल वक़्त को घुटने टेकने को मजबूर किया।

आज वह अंग्रेजी पत्रकारिता में कुछ अलग कर रहीं हैं, यह संतोष और सम्मान की बात है। दिल्ली प्रेस से अपना सफ़र शुरू करते हुए अमृता ने राजस्थान की महिलाओं के दमन और दोहन पर न सिर्फ जम कर लिखा बल्कि दमित महिलाओं के दर्द की आवाज बन गयीं। इसलिए अमृता एक पत्रकार भी हैं और एक सामाजिक कार्यकर्ता भी। अमृता ने समाज के दोहरे माप-दंडों और समाज के गोशे-गोशे में जा पसरी वर्जनाओं और कुरूतियों के विरोध में लिखा भी उनके आगे झुकने से भी इनकार किया।

अमृता की ज़िंदगी का मूल मंत्र है एक्ला चलो रे। ज़िंदगी के सफ़र में अमृता ने जो कहा वही किया और जो लिखा वैसा ही करने की नसीहत समाज को देतीं रहीं। नौकरी में रहकर एक दायरे में जीना उन्हे रास आया नहीं तो स्वतंत्र पत्रकारिता करने लगीं। अमृता ने राजस्थान के सामाजिक-सांस्कृतिक और ऐतिहासिक सन्दर्भों पर कई वृत्त चित्र भी बनाये हैं, जो बेहद चर्चाओं में रहीं।

अमृता मौर्य
अमृता मौर्य

बचपन से ही जिद्दी स्वाभाव की अमृता ने पत्रकारिता के परंपरागत लीक से हटकर काम करने का निश्चय किया और अब "दी डेजेर्ट ट्राइल" पाक्षिक टेबलायड का प्रकाशन और संपादन कर रहीं हैं। बतौर एक साधारण स्ट्रींगर के रूप में पत्रकारिता का सफ़र शुरू कर अमृता मौर्य मीडिया हाउस की मालकिन बन गयीं है–यह हम तमाम संगियों के लिए ही नहीं जन संचार संस्थान के लिए भी गौरव और गरिमा की बात है। हमारे तब के कोर्स डायरेक्टर डॉक्टर रामजी लाल जांगिड को अमृता की इस उपलब्धि को सुनकर ख़ास खुशी हो रही होगी। उन्हें भी शत शत नमन। अमृता से एक अच्छी पारी की उम्मीद है।

अमरेंद्र किशोर के फेसबुक वॉल से.

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