बड़े पत्रकारों, क्‍या स्ट्रिंगर्स का पेट नहीं होता?

यशवंतजी, नमस्कार, मैं आपको दिल से इज्ज़त करता हूँ और मैं हमेशा अपने दोस्तों को बताता हूँ कि यशवंतजी पत्रकरिता के क्षेत्र में एक मात्र ऐसे व्यक्ति हैं, जो खुलकर लिखते हैं और बोलते हैं. आज पत्रकारिता को ऐसे ही लोगों की ही जरूरत है. मैं पिछले आठ सालों से पत्रकारिता से जुडा हूँ, इस दौरान मुझे खट्टे-मीठे अनुभव मिले हैं. जब मैंने रूहेलखंड यूनिवर्सिटी में मास कॉम में प्रवेश लिया था तब सोचा था कि जिन्दगी की आधी लड़ाई लड़ ली है और आधी लड़ाई एक दो सालों में जीत ली जाएगी पर मेरी सोच पूरी नहीं हो पाई. 

यशवंतजी, मैंने देखा और पाया कि मेरे अधिकतर मित्रों ने इस क्षेत्र से तौबा कर ली. शायद यह कदम उठाना उनके लाइफ का टर्निंग पॉइंट रहा. आज वे सब खुश हैं. आज भी मैं उन लोगों की कतार में शामिल हूँ जिसको एक समय के खाने के लिए भी जुगाड़ से चलना पड़ता है. मैं आपके माध्यम से यह सवाल उठाना चाहता हूँ कि क्या स्ट्रिंगर्स पत्रकारिता का हिस्सा नहीं हैं? क्या स्ट्रिंगर्स का पेट नहीं होता? क्या उसकी समस्या नहीं होती? क्या उसके घर में लोग बीमार नहीं होते? क्या वह सामाजिक आदमी नहीं होता? क्या कुछ चन्द टॉप क्‍लास लोगों से ही मीडिया चलता है?

महोदय, मैं बताना चाहता हूँ कि मेरे शहर बरेली में तमाम ऐसे स्ट्रिंगर्स हैं जिनको महीनों से वेतन नहीं मिला है, पर उनके जज्‍बे और पत्रकारिता के प्रति जरा भी कटुता नहीं. ऐसे में कौन दोषी है? मुझे समझ में नहीं आता, पर इतना जरूर महसूस होता है कि कहीं न कहीं कुछ खामियां जरूर हैं. यशवंतजी, मैं चाहता हूँ कि आप समस्त भारत के स्ट्रिंगर्स को एक बैनर के नीचे लाने का काम करें. यदि मेरे जैसा कोई स्ट्रिंगर आपके मिशन में कोई काम आ सकता है तो जरूर बताएं. यह समस्‍या हजारों लोगों की है. मुझे उम्‍मीद है कि आप एक स्‍पेशल लिंक क्रिएट करके चैनल मालिकों तक हम गरीबों की आवाज पहुंचाने का काम करेंगे.

भीम मनोहर

बरेली

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