बदलाव के टॉनिक से राहुल को नया ‘पॉवर हाऊस’ बनाने की तैयारी

कांग्रेस में संगठन और सरकार के स्तर पर बड़े बदलाव की राजनीतिक कवायद पूरी हो गई है। इसका राजनीतिक संदेश साफ है कि पार्टी के ‘युवराज’ के लिए सत्ता-सिंहासन की राह आसान बनानी है। पिछले दो दिनों में कई बड़े बदलाव किए गए हैं। पार्टी नेतृत्व की चमक बढ़ाने के लिए शीर्ष स्तर पर युवाओं की भागीदारी बढ़ा दी गई है। जाहिर है कि यह राजनीतिक कसरत पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी के एजेंडे के मुताबिक हुई है। मंत्रिमंडल विस्तार के मौके पर रही-सही कसर प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने अपनी चुनिंदा टिप्पणियों से पूरी कर दी है। उन्होंने कह दिया है कि राहुल गांधी उनकी जगह लेने के लिए एकदम फिट हैं। चर्चित नेता नरेंद्र मोदी के बारे में उन्होंने तीखा कटाक्ष किया, कह डाला कि राहुल गांधी तो राष्ट्रीय नेता हैं, लेकिन मोदी क्या हैं? देश की जनता अच्छी तरह से यह जानती है।

लोकसभा के चुनाव में एक साल से भी कम समय बचा है। ऐसे में, संभवत: प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपने मंत्रिमंडल का आखिरी फेरबदल संपन्न कर लिया है। इसके एक दिन पहले कांग्रेस में संगठन स्तर पर बड़े बदलाव कर डाले गए हैं। इस व्यापक पहल से साफ है कि कांग्रेस आलाकमान आगामी लोकसभा चुनाव के लिए ‘युद्ध स्तर’ पर तैयारियां कर रहा है। अगले कुछ महीनों में पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं। इनमें खासतौर पर मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान व दिल्ली में पार्टी की राजनीतिक प्रतिष्ठा दांव पर लगने वाली है। लोकसभा चुनाव के ठीक पहले इन राज्यों में चुनाव होना है। ऐसे में, इन चुनाव परिणामों से खास राजनीतिक संदेश जाने वाला है। दिल्ली और राजस्थान में कांग्रेस की सरकारें हैं। जबकि, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में भाजपा की। मुख्य विपक्षी दल, भाजपा चारों राज्यों में कांग्रेस को चुनावी शिकस्त देने की कोशिश में है।

इस राजनीतिक चुनौती का मुकाबला करने के लिए ताजा बदलाव से राजनीतिक समीकरण ठीक करने की कोशिश की गई है। केंद्रीय मंत्रिमंडल में चार कैबिनेट और चार नए राज्यमंत्री बनाए गए हैं। राजस्थान में चुनावी चुनौती को देखते हुए दिग्गज जाट नेता शीश राम ओला को नया श्रम मंत्री बना दिया गया है। 86 वर्षीय चौधरी शीश राम की राजनीतिक और सामाजिक पकड़ जाट बिरादरी में काफी मजबूत मानी जाती है। कई कारणों से राजस्थान में यह समुदाय पिछले कई सालों से कांग्रेस से नाराज माना जाता है। चूंकि, वोट बैंक की रणनीति में इस समुदाय की अहम भूमिका रहती है, ऐसे में राजनीतिक संतुलन बनाने के लिए बुजुर्ग चौधरी को ‘महिमामंडित’ किया गया है। उल्लेखनीय है कि यूपीए-1 की सरकार में ओला केंद्रीय मंत्री थे। लेकिन, यूपीए-2 की सरकार में उन्हें पहले जगह नहीं मिल पाई थी।

आस्कर फर्नांडिस भी चार साल के अंतराल में फिर से सरकार में आ गए हैं। उन्हें सड़क और राजमार्ग मंत्रालय का प्रभार सौंपा गया है। आॅस्कर, यूपीए-1 में कैबिनेट मंत्री थे। इन्हें ‘10 जनपथ’ का खास करीबी माना जाता है। चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) की वरिष्ठ सांसद गिरिजा ब्यास को शहरी विकास मंत्री बना दिया गया है। वे राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष भी रह चुकी हैं। गिरिजा ब्यास को भी राजस्थान की चुनावी चुनौती को देखते हुए सरकार में जगह दी गई है। आंध्र प्रदेश के कांग्रेस सांसद के एस राव को कपड़ा मंत्रालय का प्रभार दिया गया है। आंध्र के राजनीतिक समीकरणों में संतुलन बैठाने के लिए राव को सरकार में लिया गया है। उल्लेखनीय है कि लोकसभा के पिछले चुनाव में इसी प्रदेश से कांग्रेस को सबसे ज्यादा सीटें मिली थीं। लेकिन, इस बार कांग्रेस के लिए यहां चुनावी राह आसान नहीं रह गई। एक तरफ, अलग तेलंगाना राज्य बनाने के मुद्दे की चुनौती है, तो दूसरी तरफ जगन मोहन रेड्डी की बढ़ती राजनीतिक ताकत कांग्रेस के लिए संकट बन गई है। इसी को देखते हुए कांग्रेस नेतृत्व अपने ‘कील-कांटे’ दुरस्त करने में लग गया है। राव को इसी कवायद का इनाम मिल गया है।

दरअसल, शनिवार से ही बदलाव की ‘बयार’ कुछ-कुछ बहने लगी थी। इस दिन देर रात केंद्रीय मंत्री अजय माकन और सी पी जोशी ने कैबिनेट से इस्तीफे दे दिए थे। इसी से   साफ हो गया था कि नेतृत्व इन दोनों को संगठन में महत्वपूर्ण भूमिका देने जा रहा है। ऐसा हुआ भी। दोनों को पार्टी में राष्ट्रीय महासचिव का ओहदा मिल गया है। तमाम कयासों के बावजूद अजय माकन को दिल्ली की स्थानीय राजनीति में चेहरा चमकाने का मौका नहीं दिया गया। क्योंकि, चर्चा यह भी थी कि आलाकमान मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की जगह माकन को देकर, एक नया राजनीतिक प्रयोग कर सकती है। इसके पीछे तर्क यही दिए जा रहे थे कि इससे मैदान में नेतृत्व के चेहरे में ‘ताजापन’ आ जाएगा। इसका रणनीतिक फायदा मिल सकता है। इसकी एक वजह यह भी मानी जा रही थी कि राहुल गांधी दिल्ली के मुख्यमंत्री शीला दीक्षित और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जेपी अग्रवाल के आपसी खराब रिश्तों से परेशान हो गए हैं। ऐसे में, वे माकन को दिल्ली में नई भूमिका दे सकते हैं। लेकिन, ऐसा नहीं किया गया।

सूत्रों के अनुसार, दिल्ली के इस चुनावी मौके पर पार्टी नेतृत्व शीला खेमे को नाराज करने का जोखिम नहीं लेना चाहता था। क्योंकि, शीला दीक्षित पिछले डेढ़ दशक से लगातार सत्ता में हैं। इसके बावजूद उनके प्रति किसी भारी राजनीतिक नाराजगी की आंधी नहीं चली। हालांकि, कांग्रेस नेतृत्व दिल्ली के चुनाव को इस बार आसान नहीं मान रहा। यदि अजय माकन को जेपी अग्रवाल की जगह अध्यक्ष बना दिया जाता, तो यहां पार्टी में सुधार की जगह जटिलताएं और बढ़ने का जोखिम था। ऐेसे में, माकन को केंद्रीय संगठन में लेकर उन्हें महत्वपूर्ण मीडिया विभाग का प्रभार सौंप दिया गया है। माकन के करीबी सूत्रों के अनुसार, पार्टी के रणनीतिकारों ने भरोसा दिलाया है कि यदि सब लोग मिलकर चौथी बार दिल्ली में जितवाकर लाते हैं, तो जरूरी नहीं है कि चुनाव के बाद शीला दीक्षित को ही फिर से मौका मिले। यानी, इस तरह से माकन के लिए भी गुंजाइश छोड़ दी गई है। इसको लेकर टीम माकन काफी उत्साह में समझी जा रही है।

बहुचर्चित रिश्वतकांड के बवेले के चलते पवन बंसल को रेल मंत्रालय से इस्तीफा देना पड़ा था। कोयला जांच कांड के मामले में कानून मंत्री अश्विनी कुमार की कुर्सी भी चली गई थी। यूपीए का अहम घटक रहा तृणमूल कांग्रेस पिछले साल ही सरकार छोड़ गया था। डीएमके ने भी श्रीलंका में तमिल अत्याचार के मुद्दे पर यूपीए सरकार से इस साल मार्च में नाता तोड़ लिया था। इन दोनों दलों के मंत्रियों से जो पद रिक्त हुए थे, वे खाली चले आ रहे थे। नए विस्तार से इनमें कुछ पद भर दिए गए हैं। अब मनमोहन मंत्रिमंडल की संख्या 77 तक पहुंच गई है। लेकिन, अहम सवाल तो यही है कि सरकार अपने ऊपर लगे ‘दाग-धब्बों’ की सफाई कैसे करेगी? नए विस्तार से ऐसा कुछ नहीं हुआ, जिससे कि सरकार की छवि में कोई बड़ा अंतर दिखाई पड़े। भाजपा प्रवक्ता मुख्तार अब्बास नकवी ने कहा भी है कि सरकार, अपनी टीम में कुछ बदलाव करके राजनीतिक झांसा देने की कोशिश में है। इस मौके पर मंत्रिमंडल का विस्तार राजनीतिक तौर पर ‘हवा-हवाई’ ही कहा जा सकता है। जबकि, कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह ने भाजपा पर तीखा कटाक्ष कर डाला। यही कह दिया कि भाजपा वाले पहले अपने अंदर के ‘महाभारत’ का ख्याल कर लें। उनकी राजनीतिक ‘रामलीला’ में नए-नए मोड़ आ रहे हैं। वे इसी में मस्त रहें तो अच्छा है।

लंबे समय से कांग्रेस में यह चर्चा चली आ रही है कि अगले चुनाव में ‘युवराज’ राहुल गांधी को प्रधानमंत्री की गद्दी तक पहुंचाना है। कोशिश तो यहां तक चली थी कि चुनाव के पहले ही राहुल को सत्ता सिंहासन सौंप दिया जाए। लेकिन, पिछले सालों में जिस तरह से तमाम घोटालों को लेकर सरकार की छीछा-लेदर हुई है, उसको देखते हुए यह मुहिम थाम ली गई थी। राहुल गांधी ने इस तरह के संकेत दिए जैसे कि उन्हें सत्ता-सिंहासन की बहुत जल्दी नहीं है। हालांकि, राजनीतिक जानकार इसे एक रणनीतिक दांव भी मान रहे हैं। लेकिन, इधर नरेंद्र मोदी के मुद्दे पर एनडीए के अंदर रार बढ़ गई है। जदयू-भाजपा के बीच 17 साल का पुराना गठबंधन टूट गया है। अब दोनों दलों ने ‘तू तू-मैं मैं’ की लड़ाई शुरू कर दी है। कांग्रेस ने पहले ही मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सामने चुनावी चारा डाल दिया था। संकेत दे दिए थे कि उनका दल चुनाव के बाद यूपीए का हिस्सा बनना चाहेगा, तो स्वागत होगा।

प्रधानमंत्री ने अब इस बात को कुछ और आगे बढ़ा दिया है। उन्होंने नीतीश कुमार को सेक्यूलर नेता करार किया। यह भी कह दिया कि राजनीति में कोई स्थाई दोस्त या दुश्मन नहीं होता। ऐसे में, यूपीए को हर अच्छे और सेक्यूलर दल की जरूरत है। इस तरह से प्रधानमंत्री ने यूपीए का कुनबा बढ़ाने के लिए खुले न्यौते का ‘चारा’ डाल दिया है। संगठन में पुनर्गठन की जो कवायद हुई है, उसमें पहली बार 12 राष्ट्रीय महासचिव बनाए गए हैं। पार्टी कार्य समिति में टीम राहुल के सदस्यों की भागीदारी काफी बढ़ गई है। पहले के मुकाबले कार्य समिति सदस्यों की औसत आयु भी काफी ‘युवा’ हो गई है। इतना जरूर है कि इस बदलाव की कवायद में पार्टी महासचिव चौधरी वीरेंद्र सिंह जैसे नेता पिछड़ गए हैं। वीरेंद्र सिंह और विलास मुत्तेवार ने महासचिव पद छोड़ा था, तो माना जा रहा था कि इन्हें कैबिनेट में लिया जाएगा। लेकिन, चौधरी वीरेंद्र सिंह को हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा की नाराजगी का शायद खामियाजा उठाना पड़ा है। कई कारणों से चौधरी से टीम राहुल के कई   ‘रत्न’ नाराज भी चले आ रहे हैं।

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क virendrasengarnoida@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।

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