Kumar Sauvir : दिन में तो काशी भड़भड़िया और बकवादी बन जाती है। आपको अगर जब कभी वाराणसी से बात करना हो तो उससे मस्त टाइम होता है रात का। तब काशी दिल खोल कर बतियाती है, पूरी खामोशी के साथ। खाली सड़कों से गंगा की से बहती हवाओं के झोंके किसी अभिन्न प्रेयसि के दुपट्टे और उसके बालों की लटें आपके गालों को रह-रह कर सहलाते रहेंगी। और यही तो होता है कि काशी का भीतरी अनुभव।
बीती रात करीब सवा ग्यारह बजे काशी को घूमने निकल पड़ा मैं। हालांकि रिक्शा पर चढ़ना मैं मानवता के खिलाफ समझता हूं, लेकिन एक अधेड़ रिक्शेवाले ने पूरे आग्रह के साथ कहा:- चलीं।
मैं बैठ गया। करीब दो घण्टे तक सन्नाटे को चीरता काशी को महसूस किया। दो बार गर्म दूध, तीन चाय और एक बार लस्सी का कुल्हड़ इसी रिक्शेवाले के साथ जिया। आखिरकार मैदागिन के चौराहे पर स्थिापित मन्दिर की सीढि़यों पर आसन लगा दिया।
बातचीत का दौर शुरू हो गया। पता चला कि रिक्शेवाला रामबदन पटेल है और रामनगर का रहने वाला है और रोजाना तीस रूपये का किराया देकर काशी पहुंचता है। तीन बेटी समेत छह लोगों का परिवार है। रोजाना रिक्शा का किराया 60 रूपया और करीब 400 रूपयों की आमदनी।

चुनाव पर बात शुरू हुई।
पटेल ने कहा:- जीतेगा तो मोदी ही। मुलायम जैसे लोगों ने तो जी ही खट्टा कर दिया है। कांग्रेस तो जहां से आयी थी, वहीं चली जाएगी।… मैं ? मैं तो वही दिल्ली वाली पार्टी को वोट दूंगा। अरे वही पार्टी जो नयी बनी है ना, उसी को। पता है कि वह जीत नहीं पायेगी, लेकिन कम से कम वह बात तो ठीक कर रही है। बाकी लोग तो हमेशा भरभण्डा-सरभण्ड-खरबण्डल करने में जुटे रहते हैं। कुछ नहीं किया इन लोगों ने। हमको क्या, हमें तो हमेशा रिक्शा ही चलाना है, तो कम से कम अपनी दिल की बात तो सुन-कर लें।
यूपी के वरिष्ठ पत्रकार कुमार सौवीर के फेसबुक वॉल से.






