बरेली के गंगाशील अस्पताल के मालिक बोले- अखबार निष्‍पक्षता के बजाय पुलिस और अदालत बनते जा रहे हैं

Shambhu Dayal Vajpayee : अस्‍पताल चलाना भी कभी कितने मुसीबत का काम साबित हो सकता है यह बरेली के गंगाशील के डा. निशांत गुप्‍ता और और उनकी सहधर्मिणी डा. शालिनी माहेश्‍वरी से बेहतर कौन जानता होगा। ये और इनका अस्‍पताल आजकल भारी दबाव में हैं। डा. निशांत महानगर के वरिष्‍ठ चिकित्‍सक नवल किशोर गुप्‍ता के बेटे हैं। डा. नवल ने शहर में चिकित्‍सा सुविधायें समुन्‍नत करने में बडी भूमिका निभायी है। उनके लगनशील परिश्रम का प्रतिफल ही गंगाशील और गंगा चरन जैसे बडे अस्‍पताल और नर्सिंग स्‍कूल वगैरह हैं।

घटनाक्रम है कि 14 जुलाई को दोपहर अस्‍पताल के कर्मचारी ने वहां अटेंडेंट के रूप में काम करने वाली एक लडकी को बहाने से कमरे में बुला कर दुराचार किया। दुराचारी के भाई की भी कथित संलिप्‍ता रही। पीडिता के फोन करने पर उसके पिता उसे घर ले गये। रविवार होने की वजह से डा. निशांत और डा. शालिनी उस दिन अस्‍पताल में नहीं थे। घर से लडकी की मां के फोन करने पर डा. शालिनी ने उन्‍हें अस्‍पताल बुलवाया और जख्‍मी लडकी का उपचार करवाया। अगले दिन लडकी मां -बाप के साथ घर चली गयी। दो दिन बाद पीडिता के पिता ने थाने जाकर घटना की शिकायत की। आरोपी कर्मचारी और उसका भाई नामजद हुए। पिता ने कहा कि डा. निशांत समझौते के लिए दबाव डाल रहे थे और आरोपी कर्मचारी को अस्‍पताल से नहीं निकाला इस लिए वह अब शिकायत कर रहा है।

अगले दिन अखबार के जरिये यह मामला चर्चा में आया। दो दिन बाद दिन एसएसपी के निर्देश पर साक्ष्‍य मिटाने और अपराध को दबाने वगैरह की धाराओं में डा. निशांत गुप्‍ता और डा. शालिनी जौहरी भी नामजद कर दिये गये। दो दिन बाद फिर पीडिता के पिता ने एसएसपी से शिकायत की कि डा. निशांत गुप्‍ता ने उसे फोन कर धमकाया है। पुलिस ने डा. निशांत के खिलाफ एक और मामला लिख लिया। अब इस प्रकरण में मीडिया की एक पक्षीय अति सक्रियता और तदंतर प्रशासन की तेजी ऐसा मोड़ लेती जा रही है मानो डा. निशांत गुप्‍ता , डा. शालिनी और अस्‍पताल में पीडिता का प्राथमिक उपचार करने वाले गंगाशील के दो अन्‍य डाक्‍टर व वहां के मैनेजर वगैरह को बलि का बकरा बनाये जाने से कम कोई कार्रवाई मंजूर नहीं।

आरोपी एक कर्मचारी को जेल भेजा जा चुका है। अस्‍पताल प्रबंधन का कहना है कि अखबारों की भूमिका एक पक्षीय है। अखबार निष्‍पक्षता के बजाय पुलिस और अदालत बनते जा रहे हैं। पीडिता या उसके मां बाप ने पहले दिन उनसे दुराचार की बात नहीं बतायी थी। तब गिरने की वजह से चोट लगना कहा था। पीडिता का परिवार बरेली महानगर में रहता है। यहां आईजी-कमिश्‍नर तक बैठते हैं। कथित घटना वाले दिन ही शिकायत की जा सकती थी। अस्‍पताल में मेडिकल स्‍टोर चलाने वाले एक प्रभावशाली व्यक्ति से विवादों के चलते पहले से उनकी थाना पुलिस की हो रही है।

मुझे लगता है कि पीडिता के साथ समुचित न्‍याय होना चाहिए और दोषियों को यथोचित दंड मिलना चाहिए लेकिन इस महत्‍वपूर्ण पक्ष को भी ध्‍यान में रखना चाहिए कि कहीं हमारे दबाव से निर्दोष लोगों की गर्दनें तो नहीं नप रहीं। अखबार अभियान चला कर किसी की ऐसी तैसी कर सकते हैं । पूर्वाग्रह से ग्रस्‍त होने पर प्रशासन किसी का भट्ठा बैठा सकता है लेकिन ऐसा वह अपनी विश्‍वसनीयता की कीमत पर ही कर पायेगा। यह उन्‍हें तय करना है कि वे अपने अहं को अहमियत देते हैं या फिर अपनी विश्‍वसनीयता को।

वरिष्ठ पत्रकार शंभू दयाल बाजपेयी के फेसबुक वॉल से.


संबंधित खबर..

बरेली में सैकड़ों डाक्टरों ने अमर उजाला आफिस पर धावा बोला

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *