बलात्कारी जब छूटता है तो फिर किसी लड़की की इज्जत तार-तार करता है

आखिरकार दिल्ली में गैंगरेप की शिकार लड़की ने इस बेरहम दुनिया को अलविदा कह दिया. सिंगापुर के डॉक्टर भी उसकी ज़िंदगी को बचा नहीं सके. आज पूरा देश रो रहा है. हर कोई व्यथित है. समझ नहीं आ रहा है कि आखिर कोई इंसान इस तरह हैवान कैसे बन सकता है कि पहले एक लड़की की वहशियाने तरीके से अस्मत लूटे फिर उसे लोहे की रॉड से पीटकर चलती बस से नीचे मरने के लिए फेंक दे. इस गैंगरेप की वारदात ने दिल्ली के साथ पूरे देश में सनसनी फैला दी है. वैसे ये कोई पहला मौका नहीं है जब चलती गाड़ी में किसी लड़की की अस्मत लूटी गई हो. आप कोई भी न्यूज चैनल या अखबार पर नज़र डालें तो रेप की खबरे पढ़ने को मिल ही जाती हैं. दूध पीती बच्ची या फिर बुढ़ापे की तरफ अग्रसर महिला कोई सुरक्षित नहीं है.

मैंने अपने इस छोटे से जीवन काल में कई रेप की स्टोरी पर काम किया है. हर स्टोरी को लिखते वक्त यही सोचता हूं कि इससे दर्दनाक और सिरहन फैलाने वाली दूसरी स्टोरी नहीं हो सकती. लेकिन जब आगे कोई दूसरी स्टोरी देखता हूं तो मेरा कलेज़ा कांप उठता हैं. उसमें पहले से भी ज्यादा वहशियानापन होता है. कई बार तो जिस पिता पर बेटी के घर बसाने की ज़िम्मेदारी होती है वही पिता अपनी बेटी की अस्मत लूटता है तो कई बार भाई तक बहन के सबसे बड़े गुनहगार बन जाते हैं. अब आप समझ सकते हैं कि जब घर में ही लड़की सुरक्षित नहीं है तो घर से बाहर तो उस पर बुरी नज़र रहती ही है. सवाल ये है कि एक लड़की भरोसा करे तो करे किस पर. सुरक्षित रहे तो रहे कैसे. कौन उसकी सुरक्षा की गारंटी देगा. सरकार क्या कर सकती है.

वैसे सरकार से उम्मीद करना भी बेईमानी है. सरकार एक और जांच की बात करती है और मीडिया का बढ़ता दबाव देखकर आनन फानन में आरोपी भी धर लिए जाते हैं. लेकिन आरोपी बाद में कोई ना कोई जुगाड़ कर निकल जाते हैं. कई बार तो ये भी देखा गया है कि किसी लड़की की अस्मत से खेलने वाला शख्स ज़मानत पर छूटने के बाद फिर से दूसरी लड़की की ज़िंदगी तबाह कर देता है. और एक बात कहना चाहता हूं कि जिस वर्दीधारियों पर लड़कियों की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी होती उन्हें उगाही करने से फुर्सत ही नहीं रहती. मैं ये नहीं कहता कि सभी पुलिसवाले ऐसे होते हैं लेकिन कहते हैं आंख झूठ नहीं बोलती. मैंने और आपने भी कई बार देखा है कि किस तरह से वर्दी पहना शख्स कमज़ोरों की मदद की बजाय अपराध रोकने की बजाय खुद अपराध को बढ़ावा देता है. लड़की की अस्मत लुटती रहे लुटे, उसे भला क्या पड़ता है. पहले उसने देरी से कदम उठाया फिर आरोपी को बचाने में जुट जाती है.

अब दिल्ली वाले गैंगरेप के ही मामले में ही देखिए. लड़की बस में चीखती चिल्लाती रही. बस सड़क पर भागती रही. लेकिन किसी पुलिस वाले की उस पर नज़र नहीं गई. ऐसा हो ही नहीं सकता पुलिस ने ज़रूर देखा होगा लेकिन या तो वो सड़क किनारे खर्राटे मार रहे होंगे या फिर किसी ट्रक टेंपो वाले से वसूली करने में जुटे होंगे. मैं इस बात को इसलिए दावे से कर रहा हूं क्योंकि देश की राजधानी में औपचारिकता नाम के पुलिसवाले नाके नाके पर रहते ही हैं. कई बार तो ये देखा गया है कि पुलिसवाले अपराधियों पर कार्रवाई से बचते भी हैं. भाई, दिल्ली है, हो सकता है कि रेपिस्ट किसी नेता का खास हो और अभी वो पकड़ा गया, उधर पुलिस स्टेशन में किसी सफेदपोश का फोन आ जाए.

वैसे सिर्फ दिल्ली ही क्यों, देश की आर्थिक राजधानी मुंबई के साथ महाराष्ट्र के अलग अलग हिस्सों से भी लड़कियों की अस्मत लूटे जाने की खबरों की बाढ़ सी आ गई है. देश के दूसरे हिस्से भी लड़कियों के लिए सुरक्षित नहीं. लड़कियां सहमी हुई हैं. पग पग पर खतरा है. बावजूद इसके वो हार नहीं मान सकतीं. उन्हें जीवकोपार्जन के लिए घरों से निकलना ही पड़ेगा. अपने और अपने परिवार के सपनों की खातिर उन्हें बहोत कुछ झेलना पड़ेगा.

आज दिल्ली गैंगरेप की शिकार लड़की दम तोड़ चुकी है लेकिन सवाल ये है कि अब सरकार क्या करेगी. क्या आरोपियों का दोष साबित कर उन्हें फांसी देगी. क्या एक लड़की की शहादत को बर्बाद नहीं होने दिया जाएगा. क्या हमारे आपके बीच रहने वाले वहशियों को करारा सबक दिया जाएगा ताकि वो किसी लड़की के साथ घिनौनी हरकत करने से पहले लाख बार सोचे. वक्त आ चुका है. सरकार को आत्मचिंतन करना होगा और सिर्फ घड़ियाली आंसू बहाने की बजाय कड़े कदम उठाने होंगे नहीं तो देश का कोई भी कोना हो, लड़कियों के साथ हैवानी कृत्य होते ही रहेंगे..

लेखक अश्विनी शर्मा टीवी9 महाराष्ट्र के वरिष्ठ क्राइम पत्रकार हैं.  उनका यह लिखा उनके फेसबुक वॉल से साभार लेकर यहां प्रकाशित किया गया है.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *