बसपा के सोशल इंजीनियरिंग का पिछला सफल प्रयोग अबकी सफल क्यों होगा

: उत्तर प्रदेश चुनाव के किंतु-परंतु :  उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव कभी भी आसान नहीं रहे, इस बार भी नहीं हैं। सबसे बड़ी दिक्कत वोटरों की चुप्पी को लेकर है। नेता सयाने हुए हैं, तो वोटर भी चालाक हो गया है। उसकी थाह लेना मुश्किल काम है। हालांकि मुख्य मुकाबला बसपा और सपा में माना जा रहा है, लेकिन कांग्रेस-रालोद गठबंधन को जोड़ दिया जाए, तो मुकाबला तिकोना कहा जा सकता है। भाजपा फिलहाल रेस से बाहर दिखाई दे रही है। भले ही कुछ चुनावी सव्रेक्षणों ने तस्वीर साफ करने की कोशिश की हो, लेकिन अतीत में सव्रेक्षण औंधे मुंह गिरते रहे हैं।

वक्त के साथ समीकरण तेजी से बदलते जा रहे हैं। जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आएंगे, और भी ज्यादा तेजी से बदलेंगे। यही वजह है कि कोई भी अंतिम रूप से कुछ भी कहने की स्थिति में नजर नहीं आता। बात छह महीने पहले की करें, तो साफतौर पर बसपा की वापसी की बातें की जा रही थीं। बसपा सरकार के लगभग दो दजर्न से ज्यादा मंत्रियों के दागी होने से तस्वीर बदलनी शुरू हुई, तो उम्मीद की जाने लगी कि विपक्ष को सरकार से नाराजगी का फायदा मिलेगा, जो चुनाव आते-आते सपा और कांग्रेस के पक्ष में होता दिख भी रहा है।

सोशल इंजीनियरिंग के बल पर सत्ता पाने वाली बसपा ने सत्ता की भागीदारी ह्यसोशल इंजीनियरिंगह्ण के हिसाब से नहीं दी। दलितों की सरकार दलितों के लिए ही साबित हुई। जिन योजनाओं के अंतर्गत गांवों का विकास किया गया, वह दलित बस्तियों से आगे नहीं बढ़ा। बढ़ा भी तो बहुत नाकाफी रहा। दलितों के अलावा सभी वर्गो ने अपने को ठगा महसूस किया। सबसे ज्यादा मुसलमान अपने आप को ठगा महसूस कर रहा है। यही वजह है कि इस बार उसकी पहली पसंद सपा तो दूसरी कांग्रेस नजर आती दिख रही है।

हालांकि खिसकते जनाधार को बचाने के लिए बसपा सुप्रीमो मायावती ने राज्य को चार भागों में बांटने का पासा जरूर फेंका था, लेकिन उसकी धार उतनी कुंद थी कि जनता में हरारत तक पैदा नहीं कर सका। जनता जानती है कि राज्य के बंटवारे का विधानसभा में प्रस्ताव पास कराकर केंद्र सरकार को भेज देना और राज्य को बांट देना, दोनों अलग-अलग बातें हैं। बंटवारे का प्रस्ताव कुछ सवालों के साथ केंद्र सरकार ने वापस करके यह भी बता दिया कि राज्य को पंद्रह मिनट में नहीं बांटा जा सकता है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी कभी प्रभावशाली नहीं रही, लेकिन इस बार कुछ सीटों पर प्रभावशाली नजर आ रही है। कांग्रेस और रालोद गठबंधन भी बसपा के लिए कम मुश्किलें पैदा नहीं करेगा।

आश्चर्य नहीं होगा, अगर मुसलिम वोटों का झुकाव कांग्रेस-रालोद गठबंधन और सपा की ओर हुआ, तो पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बसपा को बहुत सीटें गंवानी पड़ जाएं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कांग्रेस और सपा की उम्मीदें इसलिए भी मजबूत होती दिख रही हैं, क्योंकि यहां भाजपा का लगातार पराभव हुआ है। अयोध्या आंदोलन के समय भी भाजपा पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ही मजबूत हुई थी। बसपा से छिटका ब्राह्मण और भाजपा से मायूस वोटर कांग्रेस और सपा को तरजीह देता दिख रहा है। हालांकि अन्ना आंदोलन से भाजपा का जुड़ाव होने पर एक बार लग रहा था कि भ्रष्टाचार के मुद्दे पर भाजपा मजबूत हो सकती है, लेकिन कर्नाटक के मुख्यमंत्री येदियुरप्पा के मामले और ताजतरीन गुजरात के लोकायुक्त मसले पर भाजपा की अदालतबाजी से यह संदेश गया है कि भाजपा को भ्रष्टाचार से लड़ने का दावा महज दिखावा भर है। सबसे बड़ा नुकसान भाजपा को कुशवाहा प्रकरण देने जा रहा है। दूसरे, अन्ना टीम के सवालों के घेरे में आने के बाद भ्रष्टाचार का मुद्दा बहुत अहम नहीं रहा है।

एक बात जो निर्विवाद रूप से सच है, वह यह कि बसपा का परंपरागत दलित वोट बैंक अभी कहीं से भी डिगा नहीं है। लेकिन यह भी नहीं भूलना चाहिए कि महज दलित वोट के बल पर न तो बसपा कभी बहुमत से सत्ता में आई है, और न ही अब आ सकती है। बसपा ने सोशल इंजीनियरिंग का जो प्रयोग करके सत्ता हासिल की थी, उसने उसे बरकरार रखने का मौका खो दिया लगता है। लगभग हर मोर्चे पर सरकार नाकाम हुई है। फिलहाल सूरत-ए-हाल यह है कि बसपा 2007 दोहरा पाएंगी, इसमें कई किंतु-परंतु लगे हुए हैं।

यह भी विडंबना ही है कि किसी भी राजनीतिक दल के पास वोटरों को लुभाने के लिए कोई मुद्दा नहीं है। सभी दल जातीय और धार्मिक समीकरण के बल पर सत्ता पाना चाहते हैं। जो मुद्दे उछाले भी जा रहे हैं, उनमें इतनी जान नहीं कि वोटर रीझ जाए। उत्तर प्रदेश में आठ प्रतिशत ब्रा१ाण, पांच प्रतिशत ठाकुर और तीन प्रतिशत अन्य हैं। यानी अगड़े वोटर 16 प्रतिशत हैं। पिछड़ी जातियों को देखें, तो 13 प्रतिशत यादव, 12 प्रतिशत कुर्मी और 10 प्रतिशत अन्य हैं। इस तरह पिछड़ी जातियों के कुल 35 प्रतिशत वोट हैं। 25 प्रतिशत दलित हैं, 18 प्रतिशत मुसलिम, पांच प्रतिशत जाट और अन्य मात्र एक प्रतिशत हैं। इनमें दलित और मुसलिम किसी को भी सत्ता तक पहुंचाने में सक्षम हैं, लेकिन अगर यह बंटते हैं, तो स्थिति ह्यत्रिशंकुह्ण की बनेगी। 2007 में बसपा ने दलितों और मुसलमानों के साथ आठ प्रतिशत ब्राह्मणों को जोड़कर बहुमत पाया था। क्योंकि इस बार मुसलिम और ब्राह्मण बंटता दिख रहा है, तो बसपा का आंकड़ा पूर्ण बहुमत तक जाता नहीं दिख रहा है।

छोटे-छोटे बीस दलों का इत्तेहाद फ्रंट भी चुनावी समर में है। इसे पांचवे मोर्चे की संज्ञा दी जा सकती है। मोर्चे में पहले 13 पार्टियां थीं, जिनकी संख्या बढ़कर अब 20 से ज्यादा हो गई है। यह गठबंधन साफ-सुथरी राजनीति देने की बात करता है, लेकिन विडंबना यह है कि इस गठबंधन के एक घटक ह्यकौमी एकता दलह्ण के कई नेताओं पर संगीन मामले चल रहे हैं और आजकल जेल में हैं। इत्तेहाद फ्रंट ने विधायक मुख्तार अंसारी, पूर्व सांसद अतीक अहमद और विधायक जितेंद्र सिंह बबलू सरीखे बाहुबलियों को भी टिकट दिया है। तीनों ही इस समय जेल में हैं।

इत्तेहाद फ्रंट में पीस पार्टी, अपना दल, बुंदेलखंड कांग्रेस, ओमप्रकाश राजभर की भारतीय समाज पार्टी, मुख्तार अंसारी का कौमी एकता दल, तौकीर रजा खान की इत्तेहाद मिल्लत कौंसिल, देवेंद्र गौड़ की गोंडवाना गणतंत्र पार्टी, एमए सिद्दीकी की भारतीय युवा कल्याण पार्टी, मोहम्मद सुलेमान की इंडियन यूनियन मुसलिम लीग, भारतीय लोकहित पार्टी, राष्ट्रीय परिवर्तन पार्टी, नेशनल लोकतांत्रिक पार्टी, राष्ट्रीय परिवर्तन मोर्चा, उदित राज की इंडियन जस्टिस पार्टी और स्वामी लक्ष्मी शंकराचार्य की भारतीय जनसेवा पार्टी।

इन पार्टियों का वजूद कुछ जिलों तक ही सीमित है, इसलिए इनका वजूद बड़ी पार्टियों का खेल बिगाड़ने में सक्षम भले ही न हो, लेकिन कई की किस्मत की राह में रोड़ा तो बन ही सकते हैं। वोटर भी इन्हें वोट देते समय सौ बार सोचता है। छोटे दलों ने बड़े राजनीतिक दलों की पेशानी पर कुछ चिंता की लकीरें तो डाल ही रखी हैं। एक दूर कौड़ी यह भी है कि यदि आरएसएस भाजपा को डूबते हुए देखेगा, तो वह अपने कैडर को बसपा को वोट देने का निर्देश देकर कांग्रेस और सपा को रोकने का काम कर सकता है।

लेखक सलीम अख्तर सिद्दीकी ब्लागर और जर्नलिस्ट हैं. इन दिनों वो मेरठ से प्रकाशित हिंदी दैनिक जनवाणी से जुड़े हुए हैं.

अपने मोबाइल पर भड़ास की खबरें पाएं. इसके लिए Telegram एप्प इंस्टाल कर यहां क्लिक करें : https://t.me/BhadasMedia

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *