बहुत पहले हो गई थी तरुण तेजपाल के फिसलन और विचलनों की शुरुआत

विडम्बना देखिए कि मुख्यधारा की कारपोरेट पत्रकारिता और उसके नैतिक विचलनों के खिलाफ आवाज़ उठानेवाली और खुद को वैकल्पिक पत्रकारिता के साथ जोड़नेवाली पत्रिका ‘तहलका’ के प्रधान संपादक तरुण तेजपाल अपनी ही एक युवा रिपोर्टर के साथ बलात्कार और यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों में जेल में हैं. यही नहीं, युवा रिपोर्टर की शिकायत पर त्वरित, उचित और कानून के मुताबिक कार्रवाई न करने, मामले को दबाने और लीपापोती करने की कोशिश के आरोप में ‘तहलका’ की प्रबंध संपादक शोमा चौधरी को भी इस्तीफा देने के लिए मजबूर होना पड़ा है.

हालाँकि तेजपाल पर लगे आरोपों पर फैसला कोर्ट में होगा और उन्हें अपने कानूनी बचाव का पूरा हक है लेकिन इस मामले में तेजपाल ने खुद अपना स्टैंड जिस तरह से कई बार बदला है और पहले पश्चाताप के एलान के बाद अब उस युवा रिपोर्टर पर सवाल उठा रहे हैं, उसे लेखिका अरुंधती राय ने ठीक ही ‘दूसरा बलात्कार’ कहा है. हैरानी की बात नहीं है कि तेजपाल प्रकरण सामने आने और उससे सख्ती से निपटने में पत्रिका प्रबंधन की नाकामी के बाद ‘तहलका’ के आधा दर्जन से ज्यादा पत्रकारों ने इस्तीफा दे दिया है.

इस बीच, ‘तहलका’ की फंडिंग और खासकर तेजपाल के व्यावसायिक लेनदेन को लेकर भी गंभीर सवाल उठने लगे हैं. इस कारण एक संस्थान और पत्रिका के रूप में ‘तहलका’ के भविष्य पर भी गंभीर सवाल उठने लगे हैं. इसमें कोई दो राय नहीं है कि ‘तहलका’ के संस्थापक तरुण तेजपाल पर लगे यौन उत्पीडन और बलात्कार के आरोपों और संदिग्ध व्यावसायिक लेनदेन और संबंधों के कारण पत्रिका की साख को गहरा धक्का लगा है और उससे उबरना आसान नहीं होगा.

यही नहीं, ‘तहलका’ पर जिस तरह से चौतरफा हमले हो रहे हैं, उसमें पत्रिका के लिए टिके रहना खासकर अपने युवा और वरिष्ठ पत्रकारों को पत्रिका के साथ खड़े रहने और इन हमलों का मुकाबला करने के लिए तैयार करना बड़ी चुनौती बन गया है. यह सच है कि ‘तहलका’ की भंडाफोड और आक्रामक पत्रकारिता से नाराज और चिढ़ी राजनीतिक ताकतों और निहित स्वार्थी तत्वों खासकर भगवा ब्रिगेड ने इस मौके का फायदा उठाते हुए ‘तहलका’ पर हमले तेज कर दिए हैं.

यह किसी से छुपा नहीं है कि एन.डी.ए सरकार के कार्यकाल में रक्षा सौदों में दलाली के मामले के भंडाफोड के बाद भाजपा को जितनी शर्मिंदगी उठानी पड़ी थी और उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण से लेकर तत्कालीन रक्षा मंत्री जार्ज फर्नांडीज को इस्तीफा देना पड़ा था, उस चोट को वे कभी भुला नहीं पाए. यही नहीं, इसके बाद भी गुजरात के २००२ के दंगों के आरोपियों की स्टिंग आपरेशन के जरिये पहचान करवाने, उनके खिलाफ सबूत इकठ्ठा करने और उन्हें सजा दिलवाने में ‘तहलका’ की साहसिक पत्रकारिता की भूमिका किसी से छुपी नहीं है.

यह भी तथ्य है कि ‘तहलका’ के खुलासों से बौखलाई तत्कालीन एन.डी.ए सरकार ने उसे बर्बाद करने में कोई कोर-कसर नहीं उठा रहा. इसके अलावा भगवा संगठन हमेशा से ये आरोप लगाते रहे हैं कि ‘तहलका’ कांग्रेस समर्थक, पूर्वाग्रह-ग्रसित और हिंदू विरोधी है और केवल भाजपा या दूसरी भगवा ताकतों के भ्रष्टाचार, घोटालों और अपराधों को सामने लाने की कोशिश करता है.

लेकिन सच यह है कि ‘तहलका’ ने कोयला खान आवंटन घोटाले से लेकर महाराष्ट्र सिंचाई घोटाले तक कई ऐसे घोटालों का पर्दाफाश किया है जिसके निशाने पर कांग्रेस और उसके समर्थक दल रहे हैं. इसके बावजूद जब तरुण तेजपाल ने जब अपनी कनिष्ठ सहयोगी के यौन उत्पीड़न और बलात्कार के आरोपों पर खुद को धर्मनिरपेक्ष बताते हुए इसे सांप्रदायिक ताकतों की साजिश बताने की कोशिश की तो यह साफ़ था कि वे खुद को बचाने के लिए धर्मनिरपेक्षता की आड़ ले रहे हैं.

ऐसा करते हुए वे न सिर्फ एक बहुत कमजोर और अनैतिक तर्क पेश कर रहे हैं बल्कि साम्प्रदायिकता के खिलाफ धर्मनिरपेक्षता की लड़ाई को भी कमजोर कर रहे हैं. आखिर सांप्रदायिक शक्तियों को ‘तहलका’ के खिलाफ पलटवार करने का मौका किसने दिया? क्या तरुण तेजपाल और शोमा चौधरी को मालूम नहीं था कि ‘तहलका’ और उसकी पत्रकारिता जिन ऊँचे आदर्शों, मूल्यों और प्रतिमानों की कसौटी पर राजनेताओं, अफसरों से लेकर बाकी दूसरे ताकतवर लोगों को कसती रही है, उसी कसौटी पर उसे भी खरा उतरना होगा?              

खासकर तब जब आप ताकतवर और प्रभावशाली लोगों की अनियमितताओं और अपराधों का पर्दाफाश करने में लगे हों और उनसे जवाबदेही मांग रहे हों, यह याद रखना चाहिए कि आपसे कहीं ज्यादा जवाबदेही मांगी जाएगी और ऊँची कसौटियों पर कसा जाएगा.

सवाल यह है कि एक ओर ‘तहलका’ महिलाओं के यौन उत्पीडन और बलात्कार के मामले जोरशोर से उठा रहा था, सोनी सोरी से लेकर मनोरमा देवी जैसे अनेकों मामलों पर अभियान चला रहा था और यहाँ तक कि गोवा के जिस थिंक-फेस्ट के दौरान तरुण तेजपाल पर अपनी कनिष्ठ सहयोगी के साथ बलात्कार और यौन उत्पीड़न के आरोप लगे हैं, वहां भी एक सत्र यौन उत्पीड़न और बलात्कार पीडितों के संघर्ष पर था लेकिन तरुण तेजपाल को अपनी सहयोगी पत्रकार, मित्र की बेटी और अपनी बेटी की दोस्त पर सख्त विरोध के बावजूद दो बार यौन हमला करने का साहस कहाँ से आया?

ऐसा लगता है कि तेजपाल जिन सरोकारों और उद्देश्यों की पत्रकारिता को आगे बढ़ाने का दावा कर रहे थे, उन उद्देश्यों और सरोकारों से खुद को बड़ा मान बैठने की भूल कर बैठे. उन्हें यह मुगालता हो गया कि वे खुद जनहित की पत्रकारिता के पर्याय बन गए हैं. यह भी कि वे जैसे चाहेंगे, जनहित को पारिभाषित करेंगे और मुद्दे, सरोकार और उद्देश्य उनके पीछे चलेंगे. कहने की जरूरत नहीं है कि जैसे ही कोई व्यक्ति खुद को उन आदर्शों, मूल्यों, सरोकारों और उद्देश्यों से बड़ा और अहम मानने लगता है जिससे उसे पहचान और सम्मान मिला है, उसके फिसलन और विचलनों की शुरुआत हो जाती है.

तेजपाल भी इसके अपवाद नहीं हैं. मीडिया से आ रही रिपोर्टों से साफ़ है कि तेजपाल के फिसलन और विचलनों की शुरुआत बहुत पहले हो गई थी जब उन्होंने बड़ी पूंजी की कारपोरेट पत्रकारिता के जवाब में वैकल्पिक और जनहित पत्रकारिता को आगे बढ़ाने के नाम पर संदिग्ध उद्योगपतियों और व्यवसायियों से समझौते करने शुरू कर दिए. ‘तहलका’ के लिए आर्थिक संसाधन जुटाने के नामपर तेजपाल ने नैतिक रूप से संदिग्ध उपक्रम शुरू किये, जैसे व्यवसायियों के साथ हाथ मिलाये और खुद और परिवार के दूसरे सदस्यों के साथ पैसे और संपत्ति बनाई, वह वैकल्पिक और सरोकारी जनहित की पत्रकारिता के मूल्यों और आदर्शों के कहीं से भी अनुकूल नहीं थे.

यही नहीं, तेजपाल के कुछ पूर्व सहयोगियों का आरोप है कि उन्होंने कुछ खोजी रिपोर्टें जैसे गोवा में अवैध खनन से संबंधित रिपोर्ट को प्रकाशित होने से रोक दिया और बदले में गोवा सरकार और खनन कंपनियों से अनुचित फायदा उठाया. गोवा के कुछ वरिष्ठ और सम्मानित पत्रकारों ने गोवा में नियमों को तोड़कर बने तेजपाल के बंगले और संपत्ति पर गंभीर सवाल उठाए हैं.

कहने की जरूरत नहीं है कि इन आरोपों में अगर जरा भी दम है तो यह तेजपाल पर लगे बलात्कार और यौन उत्पीड़न के आरोपों से कम गंभीर नहीं हैं. साफ़ है कि ‘तहलका’ के घोषित आदर्शों और सरोकारों के विपरीत नैतिक विचलन की शुरुआत बहुत पहले ही हो चुकी थी और उसके लिए सबसे अधिक जिम्मेदार खुद तेजपाल थे.
अफसोस और चिंता की बात यह है कि वैकल्पिक पत्रकारिता के दावों के बावजूद ‘तहलका’ का खुद का सांस्थानिक ढांचा इतना लोकतांत्रिक और पारदर्शी नहीं था कि उसमें तेजपाल की महत्वाकांक्षाओं और उसके कारण उनके नैतिक विचलनों पर अंकुश लगाया जा सकता.

ऐसा लगता है कि तेजपाल ‘तहलका’ को एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की तरह चला रहे थे जिसमें ‘तहलका’ की जनहित पत्रकारिता के घोषित उद्देश्य और सरोकार पीछे चले गए थे और निजी हित ज्यादा महत्वपूर्ण और प्रभावी हो गए थे. इसकी वजह यह थी कि ‘तहलका’ के घोषित उद्देश्यों और सरोकारों को सितारा (स्टार) समझने के बजाय तेजपाल खुद को स्टार समझने लगे थे और सरोकारों की मार्केटिंग और कारोबार में लग गए थे. उसकी स्वाभाविक परिणति अनैतिक समझौतों और विचलनों में ही होनी थी.

जाने-माने पत्रकार, विश्लेषक और शिक्षक आनंद प्रधान के ब्लाग से साभार.

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