बहुत याद आएंगे ‘रेडिया पंचायतघर’ वाले मतई भइया उर्फ युक्तिभद्र दीक्षित

इलाहाबाद। रेडियो पंचायतघर कार्यक्रम के जरिए अपनी आवाज से लोगों का खासा मनोरंजन करने वाले मतई भइया नहीं रहे। आकाशवाणी के चर्चित कलाकार व अवधी कवि युक्तिभद्र दीक्षित (85) का 24 जुलाई को सुबह उनके घर प्रीतमनगर में निधन हो गया। सीतापुर जिले के एक छोटे से गांव अंबापुर में जन्मे युक्तिभद्र दीक्षित ने अपनी खासी पहचान बनाई। उनके इकलौते बेटे श्रीभद्र दीक्षित ने बताया कि मंगलवार की रात तक वे पूरी तरह स्वस्थ थे। बुधवार को सुबह अचानक उनका निधन हो गया। निधन का समाचार पाकर उनके आवास प्रीतमनगर में शोक संवेदना व्यक्त करने वालों का दिनभर तांता लगा रहा।

युक्तिभद्र दीक्षित के पिता बलभद्र प्रसाद दीक्षित खुद भी अवधी भाषा के कवि थे। पिता के देहांत के बाद माता इंद्रानी देवी ने ही युक्तिभ्रद दीक्षित को आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। घर में ही रहकर हिंदी, अंग्रेजी और अवधी भाषा सीखकर उसमें महारत हासिल की। मॉं की प्रेरणा का ही  असर रहा कि जीवन में मेहनत के बल पर अपनी मुकम्मल पहचान बनाई। 1938 में फोर्ड फाउंडेशन ब्रॉडकास्टिंग सेंटर में काम करने के बाद दीक्षितजी ने नवजीवन अखबार में पत्रकारिता भी की। लखनऊ में आकाशवाणी का शुभारंभ हुआ तो आकाशवाणी में चले गए। इलाहाबाद में आकाशवाणी शुरू होने पर यहां आ गए। आकाशवाणी में किसानों के लिए कई कार्यक्रम बनाए। पंचायतघर इनका चर्चित कार्यक्रम रहा। इसमें दीक्षितजी मतई भइया के नाम से घर घर पहचाने गए।

व्यवहार कुशल और मितभाषी दीक्षितजी से एक बार जो भी मिलता वो उनसे प्रभावित जरूर होता। इसके कई उदाहरण हैं। दो साल पहले बांसुरी कलाकार हरिप्रसाद चौरसिया को देश का एक बड़ा पुरस्कार मिला। उस समय मैं इलाहाबाद हिन्दुस्तान में कला संस्कृति साहित्य का बीट देखा करता था। शाम को सिटी इंचार्ज श्री बृजेंद्र प्रताप सिंह का फरमान कि हरिप्रसाद चौरसिया पर शहर से जुड़ाव विषय पर एक पीस जाना है। उस समय हमारा भी स्वास्थ्य खराब चल रहा था। तबियत खराब होने के बावजूद मैं भी उसी तरह ड्यूटी करने को मजबूर था जैसे अन्य कई भाई लोग अखबारों में न चाहने के बावजूद कार्य करने को मजबूर होते हैं, काहे कि नौकरी जाने की तलवार जो उनके सिर पर लटकती रहती है।

खैर, इस पर फिर कभी। मूल विषय पर आते हैं। हां तो मैं बता रहा था कि उस समय पीक ऑवर में खबरों के भार से दबे हुए थे कि तभी कि बृजेंद्र भाई का फरमान कि हरिप्रसाद चौरसिया पर पीस दीजिए, बाहर भी जाना है। बाहर जाने का मतलब, यह भी छिपा संकेत कि मैटर ठीक-ठाक चाहिए। बहरहाल, अपने नरेश मिश्र जी जब तक शहर में हैं तब तक मेरे जैसे कई पत्रकारों की बमबम। जहां भी जिस मुद्दे पर फंस गए तो वहां बुजुर्ग पर ऊर्जावान पत्रकार नरेश मिश्र जी ‘तारणहार’ बनकर खड़े मिलते हैं। शायद इसीलिए उन्हें पत्रकार बिरादरी में चलती फिरती लायब्रेरी कहा जाता है। उस दिन भी आदरणीय नरेशजी काम आए। कई संस्मरण बताए। साथ ही घर के लैंडलाइन का फोन नंबर देते हुए यह सलाह भी कि युक्तिभद्र दीक्षित से जरूर बात कर लो।

पहली बार नाम सुना था दीक्षितजी का फोन पर बात हुई। काफी मतलब की जानकारी देने के बाद आखिर में उनका निर्देशनुमा अनुरोध कि कभी घर आइए। तीन दिन बाद युक्तिभद्र दीक्षित के घर गए। उनसे मुलाकात और आत्मीयताभरी बातों ने काफी  प्रभावित किया। महसूस किया कि दीक्षित में एक आकर्षण है जो अपनी ओर तेजी से खींचता है। इस बीच कई बार बातें होती रहीं। उनके निधन ने यह सारी यादें ताजी कर दीं। शहर के रसूलाबाद घाट पर अंत्येष्टि के समय ऐसा लग रहा है कि अभी अभी चिता से उठकर दीक्षितजी बोल पड़ेंगे का हो पांड़ेजी, कब आए…? बहुत  याद आएंगे दीक्षितजी उर्फ मतई भइया।

इलाहाबाद से शिवाशंकर पांडेय की रिपोर्ट.

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