बहुत हल्की बातचीत को आजतक, पुण्य प्रसून बाजपेयी और दीपक शर्मा ने ‘सबसे बड़े खुलासे’ की संज्ञा दे दी

Mohammad Anas : जिन सज्जनों-मित्रों को लगता है की आज़म खान के मुसलमान होने मात्र की वजह से मैं दीपक शर्मा के पीछे पड़ गया हूँ उन सभी से मैं यह कहना चाहता हूँ कि एक ऐसा प्रत्यक्ष साक्ष्य मेरे सामने प्रस्तुत करें जिसे वे खुद भी मानते हों. ठीक वैसा साक्ष्य, जैसा आसाराम वाले मामले में आज तक ने ही प्रस्तुत किया था, ठीक वैसा साक्ष्य जैसा तहलका प्रस्तुत करता है गुजरात दंगे में, ठीक वैसा जैसा वरुण गांधी के मामले में सामने आता है.

जिस हल्की बातचीत को आजतक, पुण्य प्रसून बाजपेयी और दीपक शर्मा ने 'सबसे बड़े खुलासे' की संज्ञा दी है, वैसी बातचीत हर थाने में तैनात होमगार्ड अपने ही थाने के इंचार्ज के लिए करता है। आपने क्लिप नहीं देखी? दीपक और संजय शर्मा ने आज़म का नाम लिया और फिर दरोगा के मुंह से निकला 'हां'। आगे कुछ और बात नहीं होती, ऐसा क्यों? क्या सारा स्टिंग पुलिस वाले से सिर्फ आज़म खान के नाम पर ‘हां’ कहलवाने के लिए बनाया गया था?

मैंने तो खुद आज़म खान और सपा सरकार के ढीले अंदाज़ की तीखी आलोचना की है। उन सभी को कठघरे में खड़ा किया है, लेकिन साथियों ध्यान रहे, विरोध हम और आप करें तो ठीक है, लेकिन जब हमारे विरोध को संघी और भाजपाई हाइजैक करने लगे तो सचेत हो जाना चाहिए। क्योंकि कल दिखाए गए स्टिंग में साफ़ तौर से यही सन्देश गया है कि सपा ने दंगा करवाया है लेकिन जो भी साथी दीपक शर्मा के स्वार्थ और उसकी महत्वाकांक्षा को करीब से जानते हैं, वे सब उसे सच कभी नहीं मानेंगे। दंगा तो मोदी को प्रधानमंत्री बनवाने वाले लोगों ने अंजाम दिया है। इसमें समाजवादी सरकार ने क्यों ढीला रुख अपनाया, उसे जनता जान चुकी है, सज़ा जनता दरबार में ज़रूर तय होगी।

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जिस बेतुके स्टिंग आपरेशन को आज तक ने दिखाया और जिसे दिखाने वाला पत्रकार मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए अपने फेसबुक प्रोफाइल से मुहिम चला रहा है। जो अपने चैनल के माध्यम से मुजफ्फरनगर दंगे की असली वजह से जनता को रूबरू नहीं करवाता। अगर वह कोई ऐसी बात सामने ले कर आता है और कहता है 'दंगे का सबसे बड़ा सच' तो दोस्त आप मान सकते हैं इसे सच, पर मैं कभी नहीं मान सकता। दंगों में पुलिस की कार्यप्रणाली लचर न होती तो मुजफ्फरनगर में हिन्दू और मुसलमान के खून की नदियाँ न बहती। मुजफ्फरनगर में भाजपा के विधायक सीडी न बांटते तो आज मुजफ्फरनगर में गन्ने से गुड़ बनाने का कारोबार हो रहा होता। जिस शहर में मजदूर और मालिक में हिन्दू और मुसलमान का भेद न रहा हो वहां पर पिछले कुछ दिनों से ऐसा माहौल बनाया गया की मालिकों ने मजदूरों को उनके परिवार के साथ मार डाला। जिस शहर की आबो हवा में रहीम और राहुल साथ हुक्का पीते हों उस शहर में पचास हजार की भीड़ जमा हो कर ‘नरेंद्र मोदी जिंदाबाद’ का नारा लगाए और आप दंगे की असली वजह न जान पाएं तो आपको समझाना ‘भैंस के आगे बीन बजाने' जैसा है। मैं साफ़ किए देता हूं कि आज़म खान से मुझे कोई हमदर्दी नहीं है लेकिन ये भी सच है की दंगा उस पाकिस्तानी फुटेज के बाद भड़का था जिसे भाजपा के विधायकों ने दिखाया था। दंगे को रोक न पाने की जितनी बड़ी वजह समाजवादी पार्टी है उतनी ही ज़िम्मेदार उन तीन थानों की पुलिस भी है जिसके दो दर्जन गाँव में हत्या और लूट का नंगा खेल खेला गया। अगर अब भी आपको लग रहा है कि मैं कुछ छुपा और कुछ ही चीज़ दिखा रहा हूँ तो आपको आपकी समझ और सोच मुबारक।

युवा पत्रकार और सोशल एक्टिविस्ट मोहम्मद अनस के फेसबुक वॉल से.


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