बाजार की चाल से सहमी केंद्र सरकार

डॉलर के मुकाबले रुपए की जिस तरह से पिटाई हुई है, उससे देश के राजनीतिक हल्कों में भी सरगर्मी बढ़ गई है। सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद रुपए ने गिरावट का रिकॉर्ड गोता लगा लिया है। स्टॉक बाजार भी भारी गिरावट के शिकंजे में फंस गया है। एक सप्ताह के अंदर ही सेंसेक्स में डेढ़ हजार से ज्यादा अंकों की गिरावट दर्ज हो गई है। जबकि, सोने के भाव एक बार फिर आसमान पर चढ़ गए हैं।
 
बाजार की इस अफरा-तफरी के चलते मनमोहन सरकार की राजनीतिक मुश्किलें भी बढ़ चली हैं। विपक्षी दलों को सरकार के खिलाफ हल्ला बोलने का यह एक नया हथियार मिल गया है। इस मुद्दे पर संसद में भी सरकार बुरी तरह घिर गई है। हालात, कुछ ऐसे बन गए हैं कि सरकार एकदम आत्म-समर्पण की मुद्रा में दिखाई पड़ती है। कांग्रेस के नेतृत्व ने भी विपक्ष से भिड़ने के बजाए विनम्रता के तेवर अपना लिए हैं। प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने संसद में कल यह स्वीकार कर लिया है कि इस समय अर्थव्यवस्था वाकई में बडेÞ संकट के दौर में है। इस संकट से बाहर आने के लिए वे तमाम उपाए करने वाले हैं। ऐसे में, घबराने की कोई जरूरत नहीं है। यह जरूर है कि रिजर्व बैंक की पहल से गुरुवार को रुपए की गिरावट कुछ थमी है। स्टॉक बाजार ने भी उछाल का रुख दिखाया है। लेकिन, कोई नहीं जानता कि यह ‘इलाज’ स्थाई है या महज फौरी फंडा? 
 
लेकिन, आक्रामक विपक्ष अब वित्तमंत्री पी. चिदंबरम और प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के जुबानी भरोसे पर विश्वास करने को तैयार नहीं है। मुख्य विपक्षी दल भाजपा ने संसद में भारी दबाव बना दिया है। इसी के चलते आज प्रधानमंत्री संसद में ताजा आर्थिक संकट पर अपना बयान देने जा रहे हैं। यूं तो उन्हें कल ही बयान देना था। संसदीय कार्य मंत्री कमलनाथ ने इस आशय की सूचना भी सदन में दे दी थी। लेकिन, ऐन वक्त पर प्रधानमंत्री ने कह दिया कि वे शुक्रवार को अपना पक्ष रखेंगे। राजनीतिक हल्कों में माना जा रहा है कि मनमोहन सिंह ने कुछ और समय लेकर किसी कारगर कार्य योजना की तैयारी जरूर की होगी। ताकि, वे संसद में बता सकें कि सरकार ने इस आर्थिक तूफान से बचने के लिए क्या-क्या तैयारी कर ली है? आगे आने वाले समय में आर्थिक संतुलन ठीक रखने के लिए सरकार कौन से नए कदम उठाने वाली है?
 
दरअसल, बुधवार को रुपए में सबसे बड़ी गिरावट दर्ज हुई थी। डॉलर के मुकाबले रुपए की दर 68.80 के निचले स्तर तक पहुंच गई थी। इससे आशंका बढ़ गई थी कि कहीं एक-दो दिन में ही रुपए की दर 75 की तलहटी न छू ले? सेंसेक्स और निफ्टी में भारी गिरावट दर्ज हो गई थी। जबकि, प्रति 10 ग्राम सोने का भाव 34,500 रुपए तक पहुंच गया था। इससे बड़ा हड़कंप मच गया। इस तरह की चर्चाएं जोर-शोर से शुरू हुर्इं कि हालात और बदतर हुए तो देश बड़ी आर्थिक मंदी की चपेट में आ जाएगा। इसके चलते कर्मचारियों की बड़े पैमाने पर छंटनी होगी। मंदी की चपेट में तमाम उद्योग बंदी की कगार पर पहुंच सकते हैं। इन आशंकाओं को लेकर सरकार के रणनीतिकार भी खासे चौकन्ने हुए। इस संक्रमण काल में केंद्रीय वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा ने अपने एक सुझाव का सुर्रा छोड़कर सरकार की मुश्किलें और बढ़ा दीं। उन्होंने खुले तौर पर इस आशय का सुझाव दे डाला कि सरकार अपने रिजर्व का 500 टन सोना गिरवीं रखकर डॉलर जुटा सकती है। बताया गया कि इस तरीके से सरकार 25 अरब डॉलर जुटाकर आर्थिक संकट की आफत टाल सकती है। 
 
सोना गिरवीं रखने की बात आई, तो विपक्ष ने सड़क से संसद तक कोहराम मचाना शुरू कर दिया। पहले ही कुछ नेता आशंका जता रहे थे कि देश के सामने 1991 की तरह आर्थिक संकट   आ रहा है। जबकि, ऐसी चर्चाओं का सरकार ने जमकर खंडन किया था। उल्लेखनीय है कि 1991 में चंद्रशेखर की सरकार के दौर में देश बड़े आर्थिक संकट में फंसा था। सरकार को विदेशी मुद्रा जुटाने के लिए 67 टन सोना गिरवीं रखना पड़ा था। लंबे समय तक इस मुद्दे पर सरकार की खराब आर्थिक नीति की चर्चा चली थी। यूपीए सरकार के रणनीतिकार अपनी वाहवाही में लगातार कहते आए हैं कि एक दौर में भारत को सोना गिरवीं रखना पड़ा था। जबकि, मनमोहन सरकार की बेहतर आर्थिक नीतियों के चलते देश, दुनियाभर में आर्थिक विकास का नया इतिहास रच रहा है। ये बातें कांग्रेस के नेता भी हाल तक कहते रहे हैं। लेकिन, पिछले एक साल से आर्थिक हालात काफी खराब हुए हैं। देश की विकास दर 5 प्रतिशत से नीचे आ गई है। यह अलग बात है कि इस कमजोर विकास दर के लिए वित्तमंत्री चिदंबरम वैश्विक मंदी को ज्यादा जिम्मेदार मानते हैं। 
 
यूपीए सरकार पिछले वर्षों में तमाम बडे-बड़े घोटालों की वजह से विपक्ष के निशाने पर रही है। आमतौर पर सरकार के रणनीतिकार ऐसी चर्चाओं के दौरान यही कह देते थे कि घोटालों की जांच तो हो जाएगी, लेकिन विपक्ष इतना नकारात्मक रुख न अपनाए। क्योंकि, मनमोहन सरकार की आर्थिक नीतियों के चलते देश में रिकॉर्ड समृद्धि आई है। क्योंकि, कई सालों तक विकास दर लगातार 8 प्रतिशत के ऊपर रही है। जबकि कई वर्षों से दुनिया के तमाम विकसित देश मंदी की चपेट में रहे हैं। 
 
अब मुश्किल यह है कि अमेरिका सहित तमाम विकसित देश मंदी से उबर गए हैं। इन देशों की अर्थ व्यवस्था ने छलांग भरनी शुरू कर दी है। ऐसे में, भारत की अर्थ व्यवस्था संकट में फंसती जा रही है। आर्थिक विशेषज्ञ मान रहे हैं कि अमेरिका के हालात अच्छे होने से विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से अपना निवेश निकाल रहे हैं। क्योंकि, उन्हें निवेश के लिए अब अमेरिकी बाजार फिर से मुफीद लगने लगे हैं। पूर्व केंद्रीय वित्तमंत्री यशवंत सिन्हा सवाल करते हैं कि मनमोहन सरकार के किस तरह के तर्क हैं? जब कुछ साल पहले आर्थिक अव्यवस्था पर बात की जाती थी, तो वित्तमंत्री अमेरिकी मंदी का रोना रोते थे। अब वे अमेरिका में मंदी खत्म हो जाने का स्यापा कर रहे हैं। कह रहे हैं कि वैश्विक हालात ऐसे बने हैं कि बाहर के लोग पैसा भारतीय बाजार से निकाल रहे हैं। इसी से कुछ समय के लिए हमें झटका लग रहा है। सिन्हा कहते हैं कि वित्तमंत्री इस तरह की बातें करके झांसेबाजी ही कर रहे हैं। दरअसल, वे इस तरह की बहानेबाजी करके अपनी दिशाहीन आर्थिक नीतियों को छिपाना चाहते हैं। लेकिन, अब कुछ छिपने वाला नहीं है। 
 
राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरुण जेटली ने कल सदन में आर्थिक मुद्दे पर सरकार पर जमकर निशाने साधे। उन्होंने यहां तक कह डाला कि जो हालात बन रहे हैं, उनसे आर्थिक आपातकाल जैसी स्थिति आती दिखाई पड़ रही है। जरूरी हो गया है कि प्रधानमंत्री देश के सामने सही तस्वीर पेश करें। यह भी जानकारी दें कि वे स्थितियां ठीक करने के लिए क्या-क्या करने वाले हैं? इसी चर्चा के दौरान प्रधानमंत्री ने पहली बार यह स्वीकार किया कि इस दौर में आर्थिक संकट से इनकार नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि इसकी कई घरेलू वजहें हैं। जबकि, इसके लिए कुछ अंतरराष्ट्रीय मुद्दे भी जिम्मेदार हैं। इन दिनों खासतौर पर सीरिया में अमेरिकी हमले की आशंका है। इस फेर में कच्चे तेल की कीमतें काफी बढ़ गई हैं। एक तरफ डॉलर के मुकाबले रुपए का संकट है। दूसरी तरफ, सीरिया प्रकरण के चलते कच्चे तेल में बेतहाशा वृद्धि हो रही है। जाहिर है कि इस संकट के चलते पेट्रो-पदार्थों के दाम बढ़ाने पड़ सकते हैं। इस हकीकत से वे एकदम इनकार नहीं कर सकते। 
 
तेल कंपनियों ने दबाव बनाना शुरू कर दिया है कि भारी घाटे को देखते हुए डीजल के दामों में 3-5 रुपए प्रति लीटर की बढ़ोत्तरी जरूरी है। डीजल-पेट्रोल के दाम बढ़े, तो महंगाई का एक बड़ा झटका आना तय है। हालांकि, पेट्रोलियम मंत्री वीरप्पा मोइली ने यही कहा है कि फिलहाल, डीजल के दाम बढ़ाने का कोई प्रस्ताव उनके पास नहीं है। लेकिन, मंत्रालय इस कोशिश में है कि डीजल की खपत किसी तरह से कम की जाए। ताकि, आयात घाटा कुछ संतुलित हो पाए। भाजपा प्रवक्ता प्रकाश जावडेकर कहते हैं कि देश के लोग जानते हैं कि संसद सत्र समाप्त होते ही डीजल और पेट्रोल के दाम बढ़ा दिए जाएंगे। यह सरकार राजनीतिक मोर्चे की तरह आर्थिक मोर्चे पर भी फ्लॉप हो रही है। अब देशहित में यही अच्छा है कि लोकसभा के जल्दी से जल्दी चुनाव करा दिए जाएं। सीपीएम के वरिष्ठ नेता सीताराम येचुरी कहते हैं कि 22 साल पहले मनमोहन सिंह ने जो आर्थिक सुधार का युग शुरू किया था, अब घूम-फिर कर देश के हालात पहली वाली स्थितियों में पहुंचते लग रहे हैं। इस तरह से मनमोहन सरकार की आर्थिक नीतियां फ्लॉप शो बन गई हैं। इसके चलते देश की आर्थिक सुरक्षा भी खतरे में दिखाई पड़ने लगी है। राजनीतिक क्षेत्रों में इस बात पर नजरें लगी हैं कि मनमोहन सिंह ताजा आर्थिक हालात पर आज क्या बयान देते हैं? अपने भाषण में वे सरकार के नए कदमों के बारे में क्या कहेंगे? इसको लेकर भी कयासबाजी का दौर शुरू हुआ है। फिलहाल, कांग्रेस के दिग्विजय सिंह जैसे बड़बोले नेताओं ने भी इस मुद्दे पर संयम बरतना ही ठीक समझा है। कम से कम वे रुपए के संकट के   लिए भाजपा और मोदी जैसे नेताओं को नहीं कोस रहे हैं। भाजपा के नेता इस तरह की हल्की-फुल्की चर्चाओं में भी मजे लेते देखे गए। 
 
लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क virendrasengardelhi@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।

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