बाबा और सोना (एक) : पत्रकारिता को अंधविश्वास की फैक्ट्री बनाने पर तुल गए ये हिंदी न्यूज चैनल

Nadim S. Akhter : आज एसपी सिंह जिंदा होते तो क्या होता किले में दबे सोने का मोल? आप लोग पहले सोना ढूंढिए. फिर देश के हालात और चुनाव पर चर्चा कीजिएगा. और जिस तथाकथिेत 'साधु' ने किले में सोना होने की बात कही है, वह भी सपने में, उसे आप भारतरत्न दे दीजिए. आखिर एक सनकी साधु की बात पर सरकार के मंत्री और पूरा का पूरा सरकारी अमला, ASI, खुदाई करने पर जो तुला है.

बात यहीं खत्म नहीं होती. साधु बाबा से अनुनय-विनय करिए कि ये बता दे, देश में कहां-कहां पेट्रोल-डीजल है. कहां नैचुलर गैस, कोयला, हीरा है. और सबसे ज्यादा उसकी खुशामद इस बात के लिए करिए कि बाबा ये बता दो, हमारे देश में यूरेनियम कहां हैं. अमेरिका से सिवल न्यूक्लियर डील होने के बाद यूरेनियम पाने के लिए भारत को कई देशों की चमचागिरी करनी पड़ रही है. सो अब यह नहीं करनी पड़ेगी. साधु बाबा अगर बता दें कि यूरेनियम कहां छिपा है, जमीन के अंदर, तो देश उनका ऋणी रहेगा.

बाबा के भक्तों की उन पर अटूट श्रद्धा है. आसाराम के भक्तों की भी थी. आसाराम का हाल तो देख लिया, अब साधु बाबा का देखना है. मंत्रीजी भी साधु बाबा के अनन्य भक्त हैं. खुदाई कराने के लिए सरकार को चिट्ठी लिखी थी. चुनाव में उनका भी हाल देखना है….

अरे मूर्खों, किस दुनिया में जी रहे हो. सनकी-वनकी हो क्या. आज साइंस-टेक्नोलॉजी के जमाने में जब रिमोट सेंसिंग जैसी तकनीक है, आसमान के ऊपर जाकर उपग्रह से जमीन के अंदर की चीज को ताड़ लेते हैं, हम जानवरों के क्लोन बना रहे हैं, उस जमाने में एक पाखंडी साधु की बात पर पूरा का पूरा देश सिर नवाए झुका हुआ है. सरकार और उसके कारिंदे तमाशबीन नहीं बने, इस नौटंकी में साधु और पगलाई जनता का साथ दे रहे हैं. साधु के सपने की बात सच मानकर एक वीरान किले की खुदाई कर रहे हैं. सच में इस देश का कुछ नहीं हो सकता.

और हिदी टीवी चैनल. वे तो वाकई में महान हैं. पत्रकारिता को अंधविश्वास की फैक्ट्री बनाने पर तुले हैं. अरे टीआरपी तो पोर्न दिखाके भी मिल जाएगी, तो क्या आप टीवी न्यूज चैनल पर पॉर्न दिखाना शुरु कर दोगे. आपमें से कइयों ने स्वर्गीय एसपी सिंह के साथ काम किया हुआ है. उनका गुणगान करते नहीं अघाते. सोचिए आज एसपी जिंदा होते तो इस खबर को कैसे दिखाते. कहां प्रहार करते. भूल गए जब सारा देश गणेशजी को दूध पिलाने में बिजी था, तो एसपी ने जनभावनाओं का आदर नहीं किया था. इसका महिमामंडन करके टीआपी नहीं बटोरी थी. एक खांटी पत्रकार की तरह इस अंधविश्वास पर प्रहार किया था. जहां तक मुझे पता है, एक मोची के जूता ठोकने वाले लोहे के औजार को भी दूध पीता दिखाकर इस अंधविश्वास की हवा निकाल दी थी. साइंस का सहारा लेकर जनता को एजुकेट किया था.

और आप लोग क्या कर रहे हैं. एनिमेशन, बड़े-बड़े ग्राफिक्स और वर्चुअल सेट बनाकर जनता को सोना दिखा रहे हैं. बता रहे हैं कि यही है वो सोना. मानो ये सोना, जो खुदाई से निकल गया हो. एक हिंदी न्यूज चैनल तो इतना उत्साहित हुआ कि उसने वर्चुअल सेट बनाकर लिफ्ट से अपनी एंकर को किले की जमीन के नीचे भेज दिया और दिखाया कि वहां कितना सोना है. फिर लिफ्ट से किले की जमीन के ऊपर आ गए. ऐसा लग रहा था कि चैनल का प्रोड्यूसर और न्यूज डायरेक्टर को सब पता है कि जमीन से कितना नीचे कहां-कहां सोना है. ये सब वो अपनी आंखों से देख कर आए हैं और दर्शकों को आंखों-देखा हाल बता-सुना रहे हैं. ये बात भी साफ समझ आ रही थी कि हिंदी न्यूज के दर्शकों को वो कितना गंवार समझते हैं कि उन्होंने बताया, हमने विश्वास कर लिया. जैसे मन ही मन वे हंस रहे हों कि देखों, कैसे हमने दर्शकों को उल्लू बनाया, टीआरपी बटोरी. लेकिन उन्हें ये नहीं पता कि ये तमाशा देखकर दर्शक ही न्यूज चैनल और उसके पत्रकार पर हंसता है. आप ही की क्रेडिबिटलिटी कम होती है. विश्वास ना हो तो किसी भी चाय वाले-रिक्शे वाले को अपना प्रोग्राम दिखाकर फीडबैक ले लीजिएगा. वह कहेगा—-हे हे हे, ही ही ही, हा हा हा, बाबू एतना सोनवा देखा दीए हैं, आप तो जमीनवो में घुस गए, काहे मजाक करते हैं बाबू, हमको बुड़बक समझ रखा है क्या?

खैर, पिक्चर अभी बाकी है. तमाशा अभी शेष है. ये देखना है कि तथाकथित सोना का भंडार पाने के लिए होने वाली खुदाई में हिंदी और अंग्रेजी टीवी न्यूज चैनलों की कवरेज कैसी होगी. उम्मीद है कि हिंदी वाले 'आज कुछ तूफानी करते हैं' टाइप वाली स्टाइल में ही रहेंगे. और हमेशा की तरह अंग्रेजी वाले 'बड़े आराम से' वाली पंचलाइन के साथ खबर बताएंगे. उनसे भी उम्मीद नहीं कि अंधविश्वास से भरे इस घटनाक्रम पर से वो पर्दा उठाएं. उन्हें तो सीमा पर हुई छिटपुट घुसपैठ की टीवी स्टूडियो की जंग में तब्दील करने में मजा आता है.

तमाशा चालू है. तथाकथित साधु बाबा पर पैनी नजर रखिए. अगर सोना नहीं मिला, तो खुदाई पर हुआ सारा सरकारी खर्च और हिंदी टीवी न्यूज चैनलों की कवरेज पर आई लागत उससे वसूलिए. सूद के साथ. और अगर सोना मिल गया तो साधु बाबा को जीता जागता रिमोट सेंसिंग सैटेलाइट घोषित कर दीजिए. उम्मीद है कि तब तो नासा भी उन पर रिसर्च करने को लालायित होगा ताकि जान सके कि मंगल ग्रह पर जीवन था या नहीं और अगर था तो मंगल ग्रह में जमीन के किस हिस्से पर था. बताइए बाबा, बताइए. बिलकुल सही जवाब. आपको मिलते हैं 7 करोड़ रुपये. नहीं नहीं. सोना, आपने देश को दिखाया हजारों किलो सोना. आपके सही जवाब की हवा निकल गई है. आपका समय खत्म होता है अब.!!!!

Umesh Chaturvedi एसपी होते तो बड़ी क्रांति नहीं होती..सोना ही खोजा जाता..क्योंकि जिन्हें उन्होंने अपने हाथों से टेलीविजन न्यूज का कर्ताधर्ता बनाया..टेलीविजन उनके ही हाथों में है और वे सही मायने में क्रांतिकारी हैं..वही करते जो कर रहे हैं..इसलिए अब एसपी-एसपी रटना छोड़ो भाई
 
Nadim S. Akhter उमेश जी, आपके विचारों का स्वागत है. दरअसल मेरा ये सवाल ही काल्पनिक है कि आज अगर एसपी होते तो क्या होता. ये भी हो सकता था और वो भी. या फिर एसपी ही बदल जाते, कौन जानता है. या फिर नहीं बदलते. या फिर कोई और रास्ता खोजते शायद. या फिर कोई और ही परिभाषा गढ़ देते टीवी न्यूज की. लेकिन मेरा मानना है कि मौलिक रूप से एसपी नहीं बदलते. वही एसपी रहते जिसके लिए वे जाने जाते हैं. अगर आप बाजार में अगुआ हैं तो आपको मार्केट का गेम चेंज करने की छूट होती है और बाजार इसे अपनाने को मजबूर होता है. आपको गेम के रूल्स लिखने की आजादी होती है और ये सारी परिस्थितियां एसपी के पक्ष में ही होतीं. भारत में टीवी न्यूज इंडस्ट्री, खासकर हिंदी इंडस्ट्री अभी संक्र्मण के काल से गुजर रहा है और ये उथलृ-पुथल अभी वर्षों तक चलेगी. हर कोई अपना वर्चस्व बनाने की जी तोड़ कोशिश कर रहा है. बाजारी भी और संपादकीय विभाग भी. कई और कारक इनके रिश्ते को प्रभावित कर रहे हैं और मंथन की ये प्रक्रिया अभी लंबी चलेगी. तब जाकर कहीं MUTUAL ACCEPTANCE का एक बिंदु आए शायद, जहां सबके लिए सम्मान होगा. फिलहाल तो बाजार, संपादकीय पर भारी है और टीवी पर सोने की खुदाई उसी का बिम्ब है. उसी संदर्भ में मैं ये कहना चाह रहा था कि एसपी होते तो –सपना देखकर सोने की खुदाई— वाली खबर की धज्जियां उड़ा देते. खबर तो टीवी

नदीम एस. अख्तर
नदीम एस. अख्तर
पर दिखती, लेकिन एक जुदा अंदाज में. एक पत्रकार के अंदाज में, infotainment के अंदाज में नहीं.

Nadim S. Akhter और आपको असहमत होने का पूरा अधिकार है.

Manhar Choudhary माफ करेगें सर शायद एसपी भी सोना तलाशने में लग जाते क्यो उनके चेले ही है जिन्होने सारी गंदगी फैलाई है… बदलते दौड़ में वो भी बदल जाते

लेखक नदीम एस. अख्तर युवा और तेजतर्रार पत्रकार हैं. वे कई न्यूज चैनलों और अखबारों में वरिष्ठ पदों पर कार्य कर चुके हैं. नदीम से संपर्क 085 05 843431 के जरिए किया जा सकता है. नदीम का उपरोक्त लिखा हुआ और उस पर आए कुछ लोगों के कमेंट उनके फेसबुक वॉल से लिया गया है.


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