बाल भी नहीं बांका होगा सहारा का, गहरे तक हैं कंपनी की जड़ें

डॉ. मत्स्येन्द्र प्रभाकर लखनऊ में हैं. वे अपने परिचय में लिखते हैं कि वे आर्थिक मामलों के अध्येता हैं. वे ब्लागिंग से लेकर फेसबुक समेत मीडिया के नए – पुराने सभी माध्यमों पर एक्टिव रहते हैं. उन्होंने सहारा सेबी प्रकरण में एक लेख लिखा है, जो एक तरह से सहारा के पक्ष में है. भड़ास का किसी के प्रति कोई आग्रह-पूर्वाग्रह नहीं रहता, इस कारण हम पक्ष-विपक्ष, दोनों को समान भाव से प्रकाशित करते रहते हैं. इसी के कारण डा. मत्स्येंद्र प्रभाकर का लिखा यह राइटअप हम यहां प्रकाशित कर रहे हैं ताकि दूसरा पक्ष भी सामने रहे. हालांकि आज सहारा ने भी अखबारों में बड़ा-बड़ा विज्ञापन देकर अपनी स्थिति स्पष्ट की है. उस पर बात अलग से करेंगे. -यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया


बाल भी नहीं बांका होगा सहारा का, गहरे तक हैं कंपनी की जड़ें

डॉ. मत्स्येन्द्र प्रभाकर (आर्थिक मामलों के अध्येता)

: सेबी के आदेश से बेअसर रहेगा खेलों को सहारा का समर्थन : अंग्रेजी की कहावत है- “A prophet is not honoured in his own country.” स्वदेश में इसी को -‘घर का जोगी जोगड़ा, आन गाँव का सिद्ध’ कहा जाता है. घोषित तौर पर विदेशी पूँजी आकर्षित करने के लिए देश की आर्थिक, औद्योगिक, कारोबारी और सभी वित्तीय नीतियाँ यही ध्वनि देती हैं. इनके चलते भारत की एक नहीं, अनेक वित्तीय-वाणिज्यिक संस्थाओं और संस्थानों के कामकाजी रास्ते में कांटे बोये जा रहे हैं जबकि विदेशी कम्पनियों तथा संस्थानों के लिए फूल बिछाये जा रहे हैं. देश के भीतर राष्ट्रीय राजभाषा के मामले में अंग्रेजी की तरह ही आधिकारिक मुद्रा के मामले में विदेशी करेंसी, खासकर डॉलर को देश की कामकाजी मुद्रा बना देने पर तुली केन्द्र सरकार का, देश के प्रमुख कॉरपोरेट घराने ‘सहारा इण्डिया परिवार’ के प्रति नज़रिया उपर्युक्त कहावत तथा बातों को साबित करता लगता है. सरकार ने अपने तंत्र की सभी एजेंसियों को सहारा के पीछे छोड़ दिया है जो व्यवस्था को सुधारने व प्रशासनिक-नियामक प्रणाली को दुरुस्त करने के लिए उपकरण या औज़ार के बजाय हथियार की भांति चलायी जा रही हैं. किसी भी व्यवस्था में गड़बड़ी को ठीक किया ही जाना चाहिए किन्तु मिस्त्री की मंशा भी ठीक होनी चाहिए.

प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) के सहारा समूह की दो कम्पनियों के साथ ही साथ, सहारा प्रमुख सुब्रत रॉय सहारा और तीन अन्य निदेशकों के बैंक खातों और उनकी चल-अचल सम्पत्ति को ‘फ्रीज’ करने के लिए जारी किये गये आदेश से कम्पनी के मुश्किलों में घिरने के बाद भारत के कारोबारी जगत में यह सवाल कौंधने लगा है कि क्या इससे सहारा की दशा-दिशा यथावत रह पाएगी. और कि, इसका देश में लाखों लोगों के रोज़ी-रोज़गार पर क्या असर पड़ेगा? मैं सन्दीप पारेख की तरह आर्थिक विशेषग्य नहीं (जो सेबी के आदेश से सहारा के ‘डेड इंड’ का फतवा जैसी भविष्यवाणी कर रहे हैं) और न ही शेयर बाज़ार का सटोरिया-खिलाड़ी हूँ जो अफवाहें उछाल कर शेयरों की कीमत को मन्दी अथवा उफ़ान देते है किन्तु देश की प्रमुख आर्थिक घटनाओं का एक गम्भीर अध्येता होने के नाते यह स्पष्ट तौर पर कह सकता हूँ कि मुश्किलें अवश्य हैं, और देश में इसके पहले किसी वित्तीय संस्थान के साथ ऐसा वाकया पेश नहीं आया है; पर सेबी द्वारा पेश की जा रहीं पेचीदगियां सहारा का बाल बांका नहीं कर सकेंगी. वजह यह कि परिवार की जड़ें बहुत गहरे तक हैं.

कम्पनी के स्वामित्व में देश के विभिन्न अंचलों में भूमि का अच्छा-खासा बैंक है. इसकी समस्त चल-अचल सम्पत्तियां देनदारियों के मुकाबले कहीं बहुत अधिक हैं. और अपनी मज़बूत जड़ों के आधार पर ही सहारा देश के सिर्फ़ खेल जगत में ही हर साल 15 अरब रुपये खर्च करता है. अब जन-मन में इस तरह के ‘निवेश’ का लाभ किसको कौन समझाये? देश के राष्ट्रीय खेल ‘हॉकी’ को पुनर्जीवित करने वाला सहारा हॉकी का प्रमुख प्रायोजक होने के साथ-साथ करीब दुनिया के सबसे धनी (Cash-rich) खेल संगठनों में शुमार, भारतीय किकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) की राष्ट्रीय टीम का दो दशकों से प्रायोजन कर भी लाभान्वित होता है. सहारा इण्डियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) की सबसे महँगी टीम का मालिक है और महाराष्ट्र के पुणे के बाहरी इलाके में नवनिर्मित महाराष्ट्र क्रिकेट स्टेडियम (एमसीए) में भी हिस्सेदार है.

यह अलग बात है कि ‘कुछ शातिर नौकरशाहों की ग़लत मंशा’ से यह सौदा भी पैसों के कथित मामले की वजह से कानूनी दाँव पेंचो में फंसा हुआ है. दो साल पूर्व सहारा ने शराब व्यापारी विजय माल्या की मुश्किलों में फँसी रेसिंग इकाई फॉर्मूला वन टीम ‘फोर्स इण्डिया’ में भी 42.5% हिस्सेदारी खरीदकर उनको संकट से उबारा था तथा वह फोर्स इण्डिया का प्रमुख भागीदार बना. सहारा ने हाल ही में हॉकी इण्डिया लीग में भी एक टीम खरीदी है. यह भारत की पुरुष और महिला हॉकी टीम का प्रायोजन करने के साथ-साथ एक पोलो टीम का मालिक भी है. इसके साथ ही सहारा तीरंदाजी, शूटिंग, कुश्ती और बैडमिंटन जैसे अन्य खेलों को बढ़ावा देते हैं. फुटकर में अनेक राज्यों और ग्रामीण खेलों को बढ़ावा देते हुए यह समूह देश के तन-मन में गहरे पैठ चुका है. जन विश्वास की यह पूँजी देश के किसी भी दूसरे कार्पोरेट घराने के पास नहीं है. खेलों के प्रति अपनी स्वत:स्फूर्त इन प्रतिबद्धताओं के कारण सहारा को सालाना 1500 करोड़ रुपये खर्च करने पड़ते हैं.

देश के प्रमुख समाचार पत्र ‘टाइम्स ऑफ़ इण्डिया’ ने सहारा की दो कम्पनियों और उनके निदेशकों के खाते फ्रीज़ करने सम्बन्धी ‘सेबी’ के आदेश के बाद बीसीसीआई और आईपीएल के कुछ पदाधिकारियों के साथ ही कुछ अन्य लोगों से इस बात पर राय मांगी कि मौजूदा वित्तीय संकट का सहारा की प्रतिबद्धताओं और निवेशों पर क्या असर पड़ेगा? जवाब में बीसीसीआई के एक उच्चाधिकारी ने स्पष्ट कहा- “हमें यह नहीं लगता कि इसका कोई असर पड़ेगा. उन्होंने (यानी सहारा ने) अपनी फ्रैंचाइज़ी फीस जमा कर दी है और राष्ट्रीय टीम के प्रायोजक के रूप में भी वह प्रतिबद्ध है और जिसके लिए उन्होंने बैंक गारंटी भी जमा कर दी है. जहा तक पुणे स्टेडियम की बात है, मामला अभी अदालत में है. इससे हम खेलों सम्बंधित किसी भी बात को लेकर चिन्तित नहीं हैं.” हॉकी के एक प्रमुख राष्ट्रीय खिलाड़ी कहते हैं- “जब नकारात्मक सवालों की झड़ी लगने लगती है तो संशय उठाना लाजिमी है मगर मैंने जितना सहारा को देखा और जाना है, स्वयं मुझे कोई चिन्ता नज़र नहीं आती.”

एक अन्य फ्रैंचाइज़ी मालिक को यह नहीं लगता कि सहारा खेलों के प्रति अपनी प्रतिबद्धताओं से पीछे हटेगा. उन्होंने कहा- ”खेलों के प्रति उनका योगदान काफी बड़ा और पुराना है. इस समय जब कि सब कुछ ग़लत हो रहा है, वे अपने रास्ते से स्वयं इन सभी मुश्किलों से बाहर निकल आएंगे और अगर जरूरत पड़ी तो इन प्रतिबद्धताओं के साथ (जिनके जारी रखने के कारण भी हैं) बाजार में अपनी विश्वसनीयता और साख के बल पर आवश्यक पूँजी जुटाने की सामर्थ्य रखते हैं. क्योंकि यह सालों से होता आया है.” ‘टाइम्स’ के अनुसार, हालाँकि सहारा के लिए सबसे बड़ा समर्थन एक पूर्व हॉकी प्रशासक, से आया जो बताते हैं कि “सहारा भारतीय हॉकी के बचाव के लिए उस समय आया था, जब कोई भी इसे समर्थन करने के लिए तैयार नहीं था. हॉकी इण्डिया लीग हो सके, इसके लिए वे (सहारा) आगे आये और एक टीम भी खरीदी. कई सारे खिलाड़ी ऐसे हैं जिन्हें सहारा वित्तीय स्थिरता देता है.”

इस बीच तटस्थ वित्तीय विशेषज्ञों के बीच भी इस बात को लेकर सुगबुगाहट है. यद्यपि आर्थिक-प्रशासकों का यह तो मानना है कि सहारा के मध्यवर्गीय प्रबन्धकों में तकनीकी और पेशेवराना दक्षता का अभाव है और इसके पीछे ‘अशर्फियाँ लूट, कोयले पर मोहर’ (Penny wise pound foolish) जैसी इसके मालिकों की नीति एक खास वजह हो सकती है. लेकिन सुब्रत रॉय की बहुआयामी प्रवीणता के कायल लोग अंग्रेजी की एक और कहावत- “All lay load on a willing horse” (जो सहता है सब भार उसी पर पड़ता है) का उद्धरण देते हुए कहते हैं- “Fortune Favours the brave”(अर्थात उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मी. ) सुब्रत रॉय सहारा सभी दिक्कतों से पार पाने की सामर्थ्य रखते हैं.”

वे कहते हैं- “देश को विदेशी मुद्रा की ज़रुरत और लालच दिखाकर राष्ट्र की पूँजी को विदेशों में रोपने और फिर दूसरे रास्तों से लाकर उसे भारत में ही भ्रष्ट तरीके से रीयल प्रापर्टी व सोने के रूप में निवेश करने तथा तमाम प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण करते जा रहे वर्ग की दुरभि-सन्धि से देश के नौकरशाहों, नेताओं और विवेकाधिकार के नाम पर अन्य प्रभावी नियामकों का एक तबका यह नहीं समझ पा रहा है कि उसकी मनमानी कार्रवाइयों से देश का कोई भला नहीं होने वाला. बल्कि इसका खमियाज़ा लाखों लोगों के समक्ष रोज़ी-रोटी का संकट पैदा कर सकता है.”

देनदारियां बहुत कम, सेबी में पहले ही जमा हैं सहारा के 51 अरब : इस पूरे प्रसंग का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि सहारा के ऊपर उतनी देनदारियां नहीं हैं जितना प्रचारित किया जा रहा है. अधिकारियों के अनुसार “सहारा बहुत सारी राशि अपने निवेशकों को लौटा चुका है. इसके अलावा उसने 5,120 करोड़ रुपये सेबी के पास पहले ही जमा कर रखे हैं. जिस राशि का अन्तर है उसके बारे सहारा ने और समय चाहा है. सरकार को भी सोचना चाहिए कि न तो उसके किसी वित्तीय संस्थान और न ही सहारा ने जनता का जमा धन किसी एक जगह गाड़ रखा है जो खोद कर के दे दिया जाये. क्या सरकार के बैंक अपने सभी जमाकर्ताओं का जमाधन एक साथ लौटा सकते हैं? सहारा के वकील किशोर लाहिड़ी का कहना है कि “मामले को देखा जा रहा है. हम न्यायिक निर्देशों का पालन करने को प्रतिबद्ध हैं, जरूरत पड़ी तो सहारा समूह इस सम्बन्ध में अन्तरिम राहत के लिए एक अलग याचिका उच्चतम न्यायलय में पेश कर सकता है.”

सेबी-सहारा : जुदा-जुदा राहें

2008-11: सुब्रत रॉय सहारा के नेतृत्ववाले सहारा समूह की दो कम्पनियों- सहारा इण्डिया रीयल इस्टेट और सहारा हाउसिंग इन्वेस्टमेंट ने तीन साल के दौरान 2.96 करोड़ से अधिक निवेशकों से 19,000 करोड़ से अधिक रुपये जमा कराये.

नवम्बर 24, 2010: कुछ लोगों की शिकायतों के बाद सेबी ने सहारा की इन दो कम्पनियों के जमा लेने पर पाबन्दी लगायी.

नवम्बर 26: सेबी के आदेश के विरुद्ध हाईकोर्ट में सहारा की अपील.

दिसम्बर 13: हाईकोर्ट ने सहारा की कम्पनियों पर पाबन्दी के सेबी के आदेश पर स्थगनादेश दिया.

जनवरी 4, 2011: हाईकोर्ट द्वारा सहारा को राहत देने के विरुद्ध सेबी की अपील सुप्रीम कोर्ट ने ठुकरायी.

मई 12: सुप्रीम कोर्ट ने सहारा के मामले में सेबी को आदेश पारित करने को कहा.

जून 23: सेबी ने सहारा की कम्पनियों को धन लौटने क लिए कहा.

जून 27: सहारा की सुप्रीम कोर्ट में अपील.

अगस्त 31, 2012: सुप्रीम कोर्ट ने सहारा की दोनों कम्पनियों को आदेश दिया कि वे निवेशकों का जमा धन वापस करने के लिए 15% ब्याज सहित सेबी को लौटाएं.

सितम्बर 26: सेबी की भी सुप्रीम कोर्ट में याचिका.

अक्टूबर 5: धन वापसी के सम्बन्ध में सहारा का सुप्रीम कोर्ट से अपने आदेश पर पुनर्विचार का आग्रह.

अक्टूबर 19: सुप्रीम कोर्ट ने कहा सेबी सहारा के विरुद्ध कार्यवाही करे.

नवम्बर 2: सहारा के विरुद्ध सेबी का मानहानि का आग्रह.

दिसम्बर 3: सुप्रीम कोर्ट ने सहारा को 24,000 करोड़ रुपये लौटाने को कहा.

फरवरी 13: सेबी ने सहारा की दो कम्पनियों, इसके निदेशकों और प्रोमोटरों की सम्पत्तियों को सीज़ करते हुए इनके खाते फ्रीज किये.


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