बाहर का माहौल तो गंदा था ही, घर के भीतर पिता ने यौन उत्पीड़न करने की कोशिश की : श्वेता

मुंबई के कमाठीपुरा रेड लाइट एरिया में पली श्वेता ने न्यूयॉर्क के बार्ड कॉलेज की छात्रवृत्ति हासिल कर लाखों लड़कियों के सपनों को पंख दे दिए हैं. सेक्स वर्करों के बीच रह कर श्वेता ने कड़े संघर्ष से सपनों को साकार किया है. जिंदगी के पन्ने पलटती श्वेता ने बताया कि उनका बचपन बदनाम कमाठीपुरा में बीता है. श्वेता का कहना है कि उसकी मां को मजबूरी में देवदासी बनना पड़ा था. देवदासी रहते हुए भी उनकी मां एक आदमी से प्यार कर बैठीं और बाद में उनका (श्वेता का) जन्म हुआ. श्वेता ने बताया कि उसके जन्म के कुछ दिनों बाद ही उनकी मां उन्हें लेकर मुंबई आ गईं और यहां वे लिव-इन-रिलेशनशिप में रहने लगीं.

श्वेता बताती हैं कि बचपन की यादें आज भी पीड़ा देतीं हैं, "मेरी मां सेक्स वर्कर नहीं थीं, लेकिन उन्हीं के बीच रहने को विवश थीं. वह सुबह ही काम के लिए निकल जाया करती थीं. ऐसे में पड़ोसी सेक्स वर्कर मुझे तैयार करके स्कूल भेजती और लौटने पर मेरी देखभाल करतीं थीं."  श्वेता बताती हैं कि बचपन में उनके कथित पिता ने यौन उत्पीड़न करने की कोशिश की. शुरुआत में तो इस बारे में कोई समझ नहीं थी लेकिन जब समझ आयी भी तो किसी को बता नहीं पायी.

घर के भीतर पिता की घूरती निगाहों ने असुरक्षा की भावना पैदा कर दी. बाहर का माहौल तो गंदा था ही. बचपन में संघर्ष करने और समाज की कठोरता का शिकार होने के बावजूद श्वेता को समाज से कोई शिकायत नहीं है. वह कहती हैं कि समाज में हर तरह के लोग रहते हैं. बुरे लोगों की वजह से उनकी मां और उनकी जिंदगी नरक बन गयी थी लेकिन अच्छे लोगों की वजह से आज वह खुली हवा में सांस ले रही हैं. गैर सरकारी संगठन "क्रांति" और "अपने आप" के योगदान को जीवन अमृत के समान बताते हुए श्वेता भावुक हो जाती हैं और खुद भी आगे चलकर समाज की सेवा में जीवन बिताना चाहती हैं.

श्वेता बताती हैं कि बचपन में त्वचा का रंग काला होने की वजह से स्कूल और पड़ोस में उन्हें काली कह कर बुलाते थे. उनके कथित पिता का व्यवहार उनके प्रति काफी कठोर था. गालियां देना और बदसलूकी उनकी रोज की आदत थी. श्वेता की मां विवश थी. श्वेता के अन्दर भी हीन भावना आने लगी थी, मगर उनकी मां ने पढ़ाई को लेकर गंभीर रहने को कहा. घर में पढ़ाई का माहौल न होने के कारण श्वेता को सेक्स वर्कर के बच्चों के लिए काम करने वाली संस्था, ‘अपने आप' में जाना पड़ा. इसके बाद गैरसरकारी संगठन 'क्रांति' के संपर्क में आते ही उनकी मुक्ति का रास्ता मिल गया. यह संस्था रेड लाइट एरिया के लड़कियों के पुनर्वास का काम करती है. इसी संस्था ने श्वेता को कमाठीपुरा के गंदे माहौल से मुक्ति दिलवाई.

श्वेता ने बताया कि वे प्रतिष्ठित बार्ड कॉलेज से मनोविज्ञान में डिग्री कोर्स करेंगी. यह कोर्स अगस्त से प्रारंभ होगा. उन्हें एक साल के लिए 50 हजार अमेरिकी डॉलर (करीब 28 लाख रुपये) की छात्रवृत्ति मिली है. श्वेता डिग्री से आगे भी पढाई जारी रखना चाहती है. उनका कहना है कि शिक्षा को हथियार बनाकर समाज में उपेक्षितों के उत्थान के लिए वे कुछ करना चाहती हैं.

12वीं करने के बाद श्वेता ने एक साल पढ़ाई छोड़कर राजस्थान, झारखंड और नेपाल का दौरा किया. इस दौरे में उन्होंने लड़कियों को यौन शिक्षा के प्रति जागरुक किया. इस साल अप्रैल में न्यूजवीक की ''वूमैन इन द व‌र्ल्ड: वूमैन अंडर 25 यंग वूमैन टू वॉच'' में पाकिस्तान की मलाला यूसुफजई के साथ उनका नाम भी शामिल था. उन्हें यह सम्मान उपेक्षित युवा लड़कियों के उत्थान के लिए किए गए प्रयासों के लिए मिला. श्वेता कहती हैं कि जिदंगी के कटु अनुभवों ने ही मुझे उपेक्षित लड़कियों के उत्थान के लिए काम करने की प्रेरणा दी. इसी साल जनवरी में उन्हें अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम सेमेस्टर एट सी में दाखिला मिला, मगर पासपोर्ट समय पर न बन पाने से वे नहीं जा सकीं, लेकिन अब अगला पड़ाव यानी न्यूयॉर्क जाने में कोई बाधा नहीं.

(डीडब्ल्यू के लिए मुंबई से विश्वरत्न श्रीवास्तव की रिपोर्ट)

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