बाहुबली वो है जो पराक्रम से रचनात्मक कार्य करे एवं समाज को बदले: राम बहादुर राय

1950 में हमने जिस लोकतंत्र को अपनाया वह अपना है या नहीं यह बुनियादी सवाल है। 1950 के संविधान में एक नागरिक की परिभाषा है। इस संविधान में एक नागरिक सिर्फ एक वोटर है। भारतीय समाज में नागरिक, एक स्वतंत्र व्यक्ति नहीं, बल्कि जाति, धर्म एवं समुदाय में रहने वाला और उससे प्रभावित होने वाला है। नागरिकता इस बात को ध्यान में रखकर परिभाषित की जानी चाहिए। वरिष्ठ पत्रकार और यथावत पाक्षिक पत्रिका के संपादक रामबहादुर राय ने 27 नवम्बर, 2013 को मालवीय स्मृति भवन, दीनदयाल उपाध्याय मार्ग, नई दिल्ली में ‘साथी’ संस्था द्वारा प्रकाशित हिन्दी मासिक पत्रिका ‘‘पाँचवाँ स्तंभ’’ के वार्षिकोत्सव समारोह के अवसर पर ‘‘लोकतंत्र में मतदाता एवं पांचवां स्तंभ (स्वैच्छिक क्षेत्र)’’ विषय पर आयोजित संगोष्ठी में मुख्य वक्ता के रूप में कहा।
 
उन्होंने कहा कि हमारे जनतंत्र में कई विकृतियां हैं। धन और बल का बोलबाला है। इसका दुरूपयोग कर चुनाव जीतने वाले के लिए अक्सर बाहुबली शब्द का इस्तेमाल किया जाता है। मुझे आश्चर्य होता है क्योंकि बाहुबली तो वही हो सकता है जो पराक्रम से रचनात्मक कार्य करे एवं समाज को बदले। 
उन्होंने आगे कहा कि अभी भी हमारा संविधान विदेशी ही है। इसी से देश चल रहा है। यह आयातित है। हिन्दुस्तान में लोकतंत्र 1950 से नहीं, बल्कि यह दुनिया का सबसे पुराना लोकतंत्र है। क्या हमने अपने पुराने लोकतंत्र को जानने या समझने का प्रयास किया? जयप्रकाश नारायण ने संविधान पूरी बनने से बहुत पहले ही समझ लिया था कि हमारे संविधान द्वारा अपनाया जाने वाला लोकतंत्र हमारे जमीन से उपजा मौलिक लोकतंत्र  नहीं है। यही ढूंढ़ना पांचवां स्तंभ का काम है। 
  
समारोह के मुख्य अतिथि पब्लिक इंट्रेस्ट फाउंडेशन (स्वैच्छिक क्षेत्र) के निदेशक नृपेन्द्र मिश्र ने अपने वक्तव्य में कहा कि अभी तक हम लोकतंत्र के पांचवें स्तंभ (स्वैच्छिक क्षेत्र) की परिभाषा पर एकमत नहीं हो पाए हैं। इसके गुण कुछ पहचाने जा सकते हैं। कार्यपालिका एवं विधायिका समझौता परस्त है। न्यायपालिका बदलाव की दिशा में कुछ आशा जगाती है। मीडिया का कार्य मिला-जुला है। सत्यता आज के व्यावसायिक माहौल में छिप जाता है। ऐरोगेन्स कहीं न कहीं संवेदनशीलता को कम करता है। पारदर्शिता को आने नहीं देता। पाँचवाँ स्तंभ को और अधिक सक्रिय होना है।
 
विषय प्रवर्तन करते हुए कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि विकास भारती संस्था, रांची के अध्यक्ष अशोक भगत ने कहा कि सरकार लोकतंत्र की भावना के अनुकूल नहीं है। जो लोग रांची भी नहीं गए वे लोकतंत्र और दिल्ली को क्या जाने। हम जिनके बीच काम करते थे (आदिवासी क्षेत्र) उन्हें यह भी नहीं मालूम कि सरकार क्या होती है। पंचायती राज नहीं चला। सांसद और विधायक नहीं चाहते कि पंचायत मजबूत हो। जिसे हम निचला स्तंभ कहते हैं उसकी मजबूती नहीं हो पाई। अब बाहुबलियों की सरकार चलने लगी। सबकुछ पैसे की ताकत पर नियंत्रित होने लगा। 
 
उन्होंने कहा कि सबसे बड़ी ताकत है जनता को ताकत देना, वही नहीं हो पा रहा है। यही काम है पांचवें स्तंभ का। जरूरत यह है कि सब मिला के चौखंभा राज्य पंचायती राज कायम होना चाहिए।
 
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए ‘‘पाँचवाँ स्तंभ’’ की संपादक एवं सुप्रसिद्ध लेखिका मृदुला सिन्हा ने कहा कि पांचवां स्तंभ पत्रिका का उद्देश्य लोकतंत्र के पांचों स्तंभों के बीच संबंध और समरसता को खंगालते रहने का है। जिस सत्ता का हम निर्माण करते हैं उसमें मतदाता का बहुत महत्त्व है। मतदाता को जागृत करना बहुत आवश्यक है। पांचवां स्तंभ (स्वैच्छिक क्षेत्र) का भी दायित्व है मतदाता जागरण। 
 
उन्होंने कहा कि आज भी हमारी पाँचवाँ स्तंभ पत्रिका बचपन अवस्था में है। इसे संवारने में सबका सहयोग अपेक्षित है। लेखक, पाठक और विज्ञापनदाताओं का। 
 
कार्यक्रम में पूर्व केन्द्रीय मंत्री डॉ. रामकृपाल सिन्हा, सहित कई जाने-माने राजनेता, वरिष्ठ पत्रकार, वरिष्ठ साहित्यकार एवं समाज के गण्यमान्य लोग उपस्थित थे। कार्यक्रम का कुशल संचालन सुश्री संगीता सिन्हा एवं धन्यवाद ज्ञापन साथी संस्था के समन्वयक अमित कुमार ने किया। 
 
गौरबेश सिंह
 
प्रेस रिलीज

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