बिजनेस भास्‍कर के पांच साल पूरे, संपादक ने गिनाई चुनौतियां

दैनिक भास्कर समूह का 'बिजनेस भास्कर' अपने प्रकाशन के पांच वर्ष पूरे कर चुका है। आज से यह छठे वर्ष में प्रवेश कर रहा है। बिजनेस भास्कर ने हिंदी बिजनेस पत्रकारिता में जब पहला कदम रखा, तभी दुनियाभर में आर्थिक सुस्ती की शुरुआत हुई थी।

इस लिहाज से हमें पहले कदम से ही चुनौतियों का सामना करना पड़ा। हालात अब भी बहुत अच्छे नहीं हैं। बल्कि यूं कहें कि अब तो परिस्थितियां पहले के मुकाबले और जटिल हो गई हैं। अमेरिका में सुधार है तो यूरोप अब भी भंवर में है।

एशिया में निर्यात आधारित अर्थव्यवस्थाएं मुश्किल में हैं लेकिन चीन और भारत अपेक्षाकृत बेहतर अवस्था में हैं। ऐसे ही जटिल हालात में बिजनेस भास्कर की अहमियत बढ़ी। लोगों को जरूरत महसूस हुई एक ऐसे साथी की जो उनका हमकदम बन सके, उनकी आमदनी में इजाफा कर सके। आर्थिक शब्दों के आडंबर से आक्रांत पाठक चीजों को सहज और सरल भाषा में समझना चाहते थे।

बिजनेस भास्कर ने इसमें उनकी बखूबी मदद की। इसका सुबूत पाठकों के वे पत्र हैं जिन्होंने हमारे सुझावों से फायदा उठाने के बाद हमें धन्यवाद के रूप में भेजे। यानी हम गर्व के साथ कह सकते हैं कि बिजनेस भास्कर 'भरोसे का अखबार' बनने में कामयाब रहा है।

बदलाव सृजन का ही एक रूप है। बीते पांच वर्षों में हालात काफी बदले हैं। विश्व अर्थव्यवस्था पर मंदी की छाया दूर जाती दिख रही है, हालांकि सुस्ती बरकरार है। इससे निपटने के लिए भारत में भी सुधारों को नई दिशा देने की कोशिश की गई। इसके लिए फाइनेंशियल इन्क्लूजन को अहम जरिया माना गया। लेकिन बिजनेस भास्कर ने इस जरूरत को बहुत पहले महसूस कर लिया था।

इसीलिए छोटे और मझोले कारोबारियों के रूप में एक नया पाठक वर्ग बनाया गया। बड़ी कंपनियों की बात तो सभी करते थे, लेकिन एसएमई की आवाज कहीं सुनाई नहीं देती थी। हमने एसएमई और आम आदमी से जुड़े मुद्दों और फैसलों को प्रमुखता दी। हमें खुशी है कि इन वर्गों में बिजनेस भास्कर की अच्छी पैठ बनी।

अक्सर कहा जाता है कि अपने देश में नीति निर्माताओं को उन लोगों की हकीकत का पता नहीं होता जिनके लिए वे नीतियां बनाते हैं। इस लिहाज से हमने कई मौकों पर नीति नियंताओं की भी मदद की। मसलन, मल्टीब्रांड रिटेल में विदेशी निवेश के मसले पर हमने जनमत को सरकार तक पहुंचाया।

बिजनेस भास्कर ने शुरूआत से ही पर्सनल फाइनेंस यानी पैसे का हिसाब-किताब या दूसरे शब्दों में कहें तो आमदनी बढ़ाने पर खास ध्यान दिया है। इन पांच वर्षों में इस लिहाज से भी कई बदलाव हुए। शेयर बाजार और म्यूचुअल फंड के साथ कमोडिटी भी निवेश का अहम जरिया बनी।

बांड में लोगों की दिलचस्पी बढ़ी। बीमा की उलझनें कम हुईं और उपभोक्ताओं की जरूरतों के मुताबिक उत्पाद आए। स्टॉक मार्केट में छोटे निवेशकों को लाने की कवायद तेज हुई। हमने इस क्षेत्र के बदलावों से न सिर्फ पाठकों को रू-ब-रू कराया बल्कि उन्हें बेहतर निवेश के गुर भी बताए।

इन पांच वर्षों में बिजनेस भास्कर हिंदी का सबसे बड़ा मौलिक बिजनेस अखबार बनने में कामयाब रहा है। इस अवसर पर हम बिजनेस भास्कर परिवार की ओर से सभी पाठकों का आभार प्रकट करते हैं और उनका शुक्रिया अदा करते हैं। उम्मीद है कि आपके सुझाव हमें पूर्ववत मिलते रहेंगे।

धन्यवाद

एस.के. सिंह
स्थानीय संपादक

साभार : बीबी

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