बिना ड्राइवर की कार अप्रत्यक्ष रूप से भूतों की ही गवाही देकर टीआरपी बटोर रही थी

: भूत तो होते ही हैं, सिर्फ अहसास चाहिये! : भूत और भगवान यानी (अल्ला, खुदा, ईश्वर, वाहे गुरू, गॉड) में कोई बड़ा फासला नहीं है। आपके कर्मो के हिसाब से से एक ही परिस्थिति और एक ही आचरण आपके मन में भूत का डर भी पैदा कर सकता है और ईश्वर में आस्था भी जगा सकता है। मैं कई ऐसे लोगो से मिला हूं जो भूत प्रेत में भरोसा नहीं करते थे, इनमें कुछ अंग्रेज़ यानी ब्रिटिश भी हैं। लेकिन उनके जीवन में कुछ ऐसा हुआ कि वो भूत पर भरोसा करने लगे। आंकड़े गवाह हैं कि दुनिया में सबसे ज़्यादा भूत प्रेत पर फिल्में हॉलीवुड में बनी हैं।

ज़मीन और उस पर बनी बिल्डिंग इतिहास की गवाही देती हैं, वरना कोई भी इमारत मोनुमेंट नहीं होतीं, न ही कब्रगाहों को पूजा जाता। भूत को आप नकार नहीं सकते। कई ईमारते ऐसी होती हैं जो भूतहा होती हैं, और वहां कुछ न कुछ अपशकुन घटता रहता है या कुछ अप्रत्याशित होता है। लाख पूजा करा लें, मगर वो बेअसर साबित होता है। इतिहास कहता है कि बिहार में सोन नदी पर बन रहा कोईलवर का पुल भूतों की वजह से गिर जाता था, करीब 12 साल की मेहनत के बाद अंग्रेज़ो ने भूत का अस्तित्व माना और बली देकर उसका निर्माण पूरा किया। ब्रिटिश गजेट में इस बात का उल्लेख मिलता है (Some divine powers)। भूत प्रेत को लेकर अमरीकी अदालतें भी खामोश ही रहती हैं, क्योंकि उन्हें भी डर रहता है कि कुछ किया तो गड़बड़ हो सकती है। भारत के न्यूज़ टीवी चैनलों में भूत सबसे ज़्यादा बिका है। बिना ड्राईवर की कार अप्रत्यक्ष रूप से भूतों की ही गवाही देकर टीआरपी बटोर रही थी। सच सामने आने पर दर्शकों की गालियां भी मिलीं थी।

अदालत तब भी खामोश थे। रेगुलेटर तब भी नहीं थे न अब हैं। ब्रिटेन में ऑफकॉम ज़्यादा कारगर है।

बंम्बईया फिल्म ओ माई गॉड भी एक मिसाल है कि एक्ट ऑफ गॉड कुछ तो होता है। यही एक्ट ऑफ गॉड जब निगेटिव होता है तो वो भूत का शक्ल ले लेता है। बहरहाल बिल्डिंगे भूतहा होती हैं। इसका सिर्फ अनुभव किया जा सकता है। और जब आप पर कुछ घटित हो जाता है तो दूसरे उस पर चर्चा कर सकते हैं।

कॉलेज की पढ़ाई के दौरान आरा में मेरे सहपाठी अजय पांडे यानी अज्जू के साथ कुछ ऐसा ही हुआ था। सब लोग कह रहे थे थे कि काज़ी हाउस भूतहा है वहां जो भी परिवार शिफ्ट होता है उसके एक सदस्य की मौत हो जाती है। अज्जू के पिता नहीं माने और शिफ्ट हो गये, एक महीने के अंदर अज्जू की कैसे मौत हूई ये मैं जानता हूं और मेरे मित्र संजय सिन्हा जो आजतक में हैं, वो भी जानते हैं।

संजय से मैं पहले भी ग़ुज़ारिश कर चुका हूं कि वो अपनी कहानियों के सिलसिले में अज्जू को भी जगह दे। भूतों का ज़मीन और बिल्डिंगों से रिश्ता होता है, ये मेरा अपना अहसास है। अगर आपका भी है तो शेयर करें।

हर्ष रंजन के ब्लाग Blogs@large से साभार.


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