बिना विचार के पत्रकारिता की शुरुआत ही नहीं होती : अरविन्द मोहन

नई दिल्ली : गांधी शांति प्रतिष्ठान में पत्रकारिता एवं लेखन पर चल रही दस दिवसीय कार्यशाला में वरिष्ठ पत्रकार अरविन्द मोहन ने ‘पत्रकारिता में विचार’ के महत्व समझाये. पत्रकार के अंदर स्पष्ट विचार के महत्व पर बल देते हुए उन्होंने कहा कि किसी भी समाचार पत्र, पत्रिका या टेलीविजन में खबरों का जो चुनाव किया जाता है वहीं से संपादक के विचार का महत्व समझ में आने लगता है. उन्होंने कहा कि हर पत्र का एक दृष्टिकोण होता है और वह संपादक का दृष्टिकोण होता है. बिना विचार के पत्रकारिता की शुरुआत ही नहीं होती.

संपादक के कार्यों पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि संपादक ही खबर का चुनाव करता है और उससे यह अपेक्षा की जाती है कि वह इसमें समाज की भागीदारी और इस पर होने वाले प्रभाव का ध्यान रखे. संपादन का काम केवल खबरों की काट-छांट करना नहीं है. वह खबरों को व्यवस्थित करता है. उन्हें सुन्दर व सरल बनाता है. वह खबरों को ‘ट्रीटमेंट’ देता है. संपादक के लिए सबसे जरूरी होता है कि वह खबर पर अपना दृष्टिकाण रखे, उसकी खबर के बारे में क्या राय है. उसे निर्भीकतापूर्वक अपनी बात रखनी चाहिए.

पत्रकार के ‘एक्टिविज्म’ पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि पत्रकार के मन में एक ‘एक्टिविस्ट’ ही होता है जिसकी वजह से वह समाज से जु़ड़े मुद्दे उठाता है लेकिन हमें पत्रकार और ‘एक्टिविस्ट’ के अंतर को साफ समझना होगा. हमें यह पता होना चाहिये कि हम ‘एक्टिविस्ट’ नहीं पत्रकार हैं. जीवन में कभी ऐसे अवसर भी आते हैं जब पत्रकार समाज के लिये उसके साथ प्रत्यक्ष रूप से खड़ा भी होता है. लेकिन इसका ख्याल रखना होता है कि ऐसा प्रायः न हो. हमें पत्रकारिता और ‘एक्टिविज्म’ के बीच एक स्प्ष्ट अंतर रखना चाहिये.

उनका कहना था कि संपादक का काम केवल खबर दे देना भर नहीं है. कभी-कभी खबर से पाठक या दर्शक को उस मुद्दे पर स्पष्टता नहीं आ पाती कि अमुक विषय पर पत्र की राय ऐसी क्यूं है. इस तरह के विषयों को अपने पाठकों के सामने लेन के लिये वह कभी स्वयं या उस विषय के विद्वान लोगों की राय को पत्र में जगह देता है. संपादक को यह भी ध्यान रखना होता है कि महत्वपूर्ण मुद्दों पर पाठकों तक पत्र की राय पहुंचे.

नये पत्रकारों  के लिये उन्होंने कहा कि उन्हें अखबार का दृष्टिकोण समझने  के लिए हमेशा संपादकीय पढ़ना चाहिए. संपादकीय को संपादक की ही राय माना जाता है. पाठक किसी भी अखबार तक आता तो खबरों के लिए है पर वह उससे जुड़ता तभी है जब उसके संपादकीय से संतुष्ट हो. इसलिए नये पत्रकारों को खबर लिखते समय पत्र  की राय को ध्यान में रखना चाहिए क्यूंकि यह पाठकों को जोड़ती है. लेकिन विचार की पत्रकारिता पर बात करते वक्त यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि वह किसी के विचार को आगे बढ़ाने का काम न करे. वह ‘फोर्स मल्टीप्लायर’ नहीं है. जरूरत पड़ने पर वह दृष्टिकोण से इतर जाकर खबरों का चयन करता है.

सत्र में  प्रतिभागियों ने अरविन्द  मोहन से पत्रकारिता में आने वाली समस्याओं पर अनेक प्रश्न भी पूछे. उन्होंने प्रतिभागियों को, अपने विचारों में सामंजस्य बनाकर बात को बेहतर तरीके से कहने का, मंत्र दिया. ज्ञात हो कि अरविन्द मोहन तीन दशकों से भी ज्यादा समय से पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं. वे जनसत्ता, इण्डिया टु़डे, दैनिक हिन्दुस्तान तथा अमर उजाला के संपादकीय विभाग में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके है.  व्याख्यान के बाद अरविन्द मोहन के हाथों कार्यशाला के सभी प्रतिभागियों को अनुपम मिश्र  की मशहूर पुस्तक ‘आज भी खरे हैं तालाब’ भेंट की गई.

भड़ास के साथ जुड़े और कार्यशाला में प्रतिभागी के रूप में हिस्सा ले रहे युवा पत्रकार विवेक सिंह की रिपोर्ट.

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