बिहार में किस्‍सा वही दोहराया गया, नीतीश से जुड़ी निगेटिव न्यूज को दबाया गया

सौ साल (बिहार शताब्दी वर्ष समारोह) की आड़ में नीतीश सरकार ने एक बार फिर अपने छह साल के ‘उपलब्धियों‘ का बखान करने की पूरी तैयारी कर रखी थी. लेकिन इससे पहले कि 22 मार्च को मुख्य कार्यक्रम शुरू होता सरकार के मुखिया नीतीश कुमार का मूड जरा कसैला हो गया. मंगलवार, 20 मार्च, को उनके करीबी व स्वजातीय और उनके पार्टी के वर्तमान कोषाध्यक्ष विनय कुमार सिन्हा के घर और कार्यालय पर आयकर का छापा पड़ा. छापेमारी के दौरान लगभग 5 करोड़ एक बोरे में ठूंसे हुए मिले.

ये वही विनय कुमार सिन्हा हैं जिनके घर पर नीतीश कुमार अपने पटना प्रवास के दौरान (बिहार के मुख्यमंत्री के सरकारी आवास एक अणे मार्ग में प्रवेश करने के पहले तक) रहा करते थे. आगे की पंक्तियों में विनय कुमार सिन्हा और नीतीश कुमार के संबंधों की पड़ताल करना इस टिप्पणीकार का मकसद नहीं है. इसके बजाय पाठकों को यह बताने की कोशिश करना है कि कैसे एक बार फिर पटना के बड़े हिंदी अखबारों ने नीतीश कुमार के पार्टी के कोषाध्यक्ष और उनके बहुत करीबी नेता सह व्यापारी से जुड़ी खबर को छिपाने की भरसक कोशिश की जिससे कि बिहार के ‘राजा’ की छवि जनता के बीच शायनिंग करती रहे.

सबसे पहले तो यह कोशिश की गयी कि यह खबर पाठकों तक पहुंचे ही नहीं. यह खबर न तो बुधवार के अखबार में आई न ही गुरुवार (बिहार दिवस) के दिन. बिहार दिवस बीतने और अन्य दबावों के कारण अखबारों को अपनी पत्रकारीय जिम्मेवारी याद आई. हिंदी अखबारों ने शुक्रवार को बड़े ‘रोचक ढंग’ से यह खबर पाठकों तक पहुंचाई. शुक्रवार को जहां अंग्रेजी अखबारों (हिंदुस्तान टाइम्स और टाइम्स आफ इंडिया) ने इसे पहले पन्ने की खबर बनाया वहीं हिंदी अखबारों ने इसे अव्वल या तो छापा ही नहीं या फिर संदर्भों से काटते हुए अंदर के पन्नों पर एक आम आयकर से जुड़ी छापेमारी के खबर के रूप में प्रकाशित किया. इन पंक्तियों के लेखक को राष्ट्रीय सहारा और दैनिक जागरण में यह खबर दो-चार बार ढूंढने पर भी नहीं मिली. हिंदुस्तान और प्रभात खबर ने इसे अंदर के पन्नों पर जिस तरह छापा वह नीचे प्रस्तुत है….

हिंदुस्तान : बिहार के लगभग दो-तिहाई पाठकों पर पकड़ रखते हुए ‘सुशासन’ में सच को झूठ और झूठ को सच बनाते हुए राज्य में फील-गुड का अहसास कराने वाले इस अखबार ने अपने दसवें पन्ने पर इस छापेमारी से जुड़ी दो कालम की छोटी सी खबर लगाई. हां शीर्षक चार कॉलम में जरुर फैला था. खबर में यह बताया गया कि कंपनी पूजा फूड प्रोडक्ट ने चार करोड़ रुपये की आयकर की चोरी की है. लेकिन इतना बताने के बाद अखबार बिल्कुल निरीह होकर यह बताने में असफल रहा कि पूजा फूड प्रोडक्ट के मालिक कौन हैं? अपने सूचना तंत्र का उपयोग करने की जगह अखबार ने लिखा ‘आयकर अधिकारियों के विश्वस्त सूत्रों का कहना है कि पूजा फूड प्रोडक्ट एक पूर्व विधान पार्षद समेत दो अन्य लोगों द्वारा संचालित है’. अखबार ने आगे बताया कि कंपनी के पार्टनरों के पास सिर्फ राजधानी में 50 फ्लैट हैं. अखबार यह बताने का साहस नहीं जुटा पाया कि इनमें से ही किसी एक में कभी नीतीश कुमार रहा करते थे.

प्रभात खबर : बिहार के इस ‘सबसे तेजी से बढ़ते अखबार’ ने अपने नौंवे पन्ने पर इस छापेमारी से जुड़ी दो कालम की छोटी सी खबर लगाई. शीर्षक लगाया ‘12 करोड़ की अघोषित आय‘. खबर में विनय कुमार सिन्हा के नाम का जिक्र था. लेकिन जिस अखबार के संपादक आये दिन सुबह-सुबह नैतिकता का मंजन पाठकों के दांतों पर घिसते रहते हैं, उनके अखबार ने यह बताने का नैतिक साहस नहीं जुटाया कि ये विनय कुमार सिन्हा हैं कौन? अभी राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में बने हुए कथित ‘कोयला घोटाले’ का पर्दाफाश करने का दावा करने वाले इस अखबार ने नीतीश कुमार, उनकी पार्टी और विनय कुमार सिन्हा के बीच के संबंधों पर पूरी तरह पर्दा डाल दिया. यहां यह बताना भी दिलचस्प होगा कि आज से छह साल पहले तक लोहिया, जेपी और बाद के दिनों में भूतपूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर (उनका प्रेस सलाहकार बनने के बाद) को सबसे चरित्रवान बताने वाले प्रभात खबर के प्रधान संपादक को अब सिर्फ नीतीश कुमार ही एक मात्र स्टेट्समैन नजर आते हैं. जाहिर है कि जब प्रधान संपादक की दृष्टि ऐसी होगी तो अखबार तो दृष्टिदोष का शिकार होगा ही.

तो पते की बात यह कि छापेमारी से जुड़ी इस राजनीतिक रुप से संवेदनशील खबर को पटना के हिंदी अखबारों ने जिस तरह दबाया उससे यह साफ होता है कि अखबारों का बिहार में किस तरह चाल गड़बड़ाया हुआ है और चरित्र दागदार हो चुका है. अखबारों का यह हाल देखते हुए आपातकाल के समय पत्रकार व भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी द्वारा कहा गया वो मशहूर कथन याद आता है. उन्होंने कहा था ‘इंदिरा गांधी ने तो अखबारों को झुकने भर के लिए कहा था मगर वो तो रेंगने लगे’. बिहार में भी हिंदी अखबार सत्ता के समक्ष दंडवत हैं, रीढ़विहीन हो चुके हैं. ऐसे में यह बताना भी बहुत मौजू होगा कि भारतीय प्रेस परिषद ने बिहार में प्रेस की आजादी की स्थिति और पत्रकारों पर पड़ रहे दबाव की जांच करने की घोषणा की है. आशा की जानी की चाहिए कि भारतीय प्रेस परिषद अखबारों के उपरोक्त ‘छलों’ की भी जांच करेगा.

नोट : लगे हाथ पाठकों को यह भी बताते चलें कि श्री श्री रविशंकर के सरकारी स्कूल संबंधी जिस बयान पर आजकल बवाल मचा हुआ है उसको प्रभात खबर के पटना संस्करण में जगह नहीं मिली थी. ऐसा इसलिए क्योंकि श्री श्री रविशंकर के भक्त हैं पटना संस्करण के स्थानीय संपादक स्वयं प्रकाश और उन पर एक किताब लिखकर लेखक भी बन चुके हैं. इससे भी पता चलता है कि किस तरह व्यक्तिगत संबंध और लगाव के कारण संपादक नाम की संस्था बिहार में कमजोर हुई है.

मनीष

crusade4css@gmail.com

 

 
 

 

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