बुढ़ापे तक मैं इंतजार नहीं कर सकता (कुछ पल यादों के सहारे : शंभूनाथ शुक्ल)

Shambhunath Shukla : यह मेरे संस्मरण हैं जिन्हें मैं लिख रहा हूं कुछ डायरी के सहारे और कुछ याददाश्त के सहारे। कई लोगों का कहना है कि मेरी याददाश्त बहुत अच्छी है। पर ऐसा नहीं है। हर आदमी की याददाश्त अच्छी ही होती है। आदमी जिंदा ही स्मृतियों के सहारे रहता है। अगर स्मृतियां न होतीं तो न दुख होता न सुख। अब इसे मैं फेसबुक पर साझा कर रहा हूं….

उस दौर में शायद मैं अकेला था जो खूब सोच समझकर पत्रकारिता के व्यवसाय में आया। जी हां मुझे उस समय ही लगता था कि मेरे लिए सबसे उपयुक्त व्यवसाय पत्रकारिता ही है। हालांकि उस समय तक पत्रकारिता व्यवसाय नहीं एक ऐसा क्षेत्र था जहां या तो वे जाते थे जो किसी और क्षेत्र में जा नहीं सकते थे अथवा वे जिनके लिए पत्रकारिता एक भौकाली क्षेत्र था जिसके बूते वे अपने आसपास धौंस जमा सकते थे।

कलेक्टर और एसपी के साथ लंच या डिनर कर सकते थे या फिर अपने धंधों को बचाए रख सकते थे। आम तौर पर ठेकेदारों के परिवार से आए लोग, वकीलों के परिवार के लोग ही यहां आते थे बस किसी अखबार के स्ट्रिंगर बन गए और जिंदगी पार। कुछ साहित्यिक किस्म के लोग भी आते थे जिनके लिए आय का स्रोत पत्रकारिता थी और शगल कहानियां या कविता।

यकीनन ये लोग ईमानदार थे पर वे अक्सर दुविधाग्रस्त रहते थे। कुछ ऐसे लोग भी थे जो अपने विचारों की अभिव्यक्ति के लिए कोई छोटा मोटा अखबार या रिसाला निकाल लेते और खुश रहते। लेकिन मैने कानपुर के शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों को काफी निकटता से देखा था और बदलते भारत की एक तस्वीर मैं देख रहा था। इसलिए मैने पत्रकारिता का क्षेत्र चुना लेकिन इसके पहले मैने खूब पापड़ बेले। कई बार घर से भागा बगैर पैसा या कोई सामान लिए। आधा हिंदुस्तान तो मैने पैदल ही घूम लिया। खूब लोगों से मिला और जाना भी।

एक बात तो तय है कि यहां कोई भूखों नहीं मर सकता अगर जरा भी आप में बुद्धि है तो भोजन तो मिल ही जाएगा और ज्यादा की दरकार मुझे कभी नहीं रही। आज भी मुझे अगर यह समझ है तो अपनी उन्हीं यात्राओं के कारण। अगर आपने यात्राएं नहीं कीं तो आप अपने देश के बारे में कुछ भी नहीं जान सकते। और यात्राएं भी बिना पैसे के, लत्ते के और कभी पांवों के सहारे तो कभी रेलगाडिय़ों के सहारे।

साल १९७१। मेरी उम्र रही होगी कोई सोलह साल की उसी साल मैने यूपी बोर्ड की इंटरमीडिएट परीक्षा पास कर वीएसएसडी कालेज में बीएससी में दाखिला लिया था। मैने इंटर में फस्र्ट डिवीजन पाई थी। मैथ्स में मेरे ९८ नंबर थे, हिंदी में ६८, फिजिक्स में ८४, केमेस्ट्री में ४९ और अंग्रेजी में ३१। यानी यूपी बोर्ड की इंटरमीडिएट परीक्षा में मुझे ५०० में से ३३० अंक। इस तरह मुझे कुल ६६ प्रतिशत नंबर मिले थे। १९७१ में यूपी सेकेंड्री एजूकेशन बोर्ड में इतने नंबर वाला बच्चा जहीन ही नहीं अतिशय पढ़ाकू और जीनियस माना जाता था। तब के यूपी के प्रीमियर इंजीनियरिंग कालेज एचबीटीआई में मेरा सीधे चयन हो गया था और वह भी इलेक्ट्रॉनिक्स में।

यानी मैं मजे से इंजीनियर बन सकता था। पर घर की हालत ऐसी कि रोटी ही मिल जाए तो बहुत। मैं बहुत निराश था। न तो पढ़ाई में मन लगता था न कहीं किसी से मिलने जुलने में। मैं चुपचाप घर में पड़ा-पड़ा सोचा करता। लगता मैं क्यों जी रहा हूं क्या सिर्फ इसलिए कि मैं भी अपने अन्य परिचितों की तरह उन्हीं की जिंदगी गुजर करूंगा जिसमें न कोई ऊर्जा होगी न ललक। घनघोर गरीबी में पीएल-४८० खाकर दिन काटूंगा। मैं यह जिंदगी नहीं जी सकता था इसलिए मैने घर छोड़ देने का मन बनाया। नवंबर के दिन थे। जाड़ा हल्का-हल्का पडऩे लगा था। हाफ स्वेटर, एक फुल पैंट और सफेद पीटी शू पहनकर मैं १४ नवंबर की शाम घर से निकल पड़ा।

तब तक यह जरूर हो गया था कि पिताजी को स्वदेशी काटन मिल में फिर से नौकरी फिर मिल गई थी पर साइकिल के कैरियर पर साबुन की पेटी लादकर फेरी लगाने का काम वह जारी किए हुए थे। मुझे लगता कि एचबीटीआई का खर्च उठाना पिता के बूते का नहीं है। दूसरे अच्छे नंबर होते हुए भी मुझे अंग्रेजी हौआ लगती और इंजीनियरिंग की पढ़ाई बगैर अंग्रेजी केसंभव नहीं है इसलिए मैने वीएसएसडी कालेज में बीएससी में प्रवेश ले लिया था। वहां कुल ३५ रुपयों में प्रवेश मिल गया था और महीने की फीस सिर्फ १६ रुपए थी। इसमें से भी एक तो मेरी फीस माफ हो गई दूसरे मुझे पुअर ब्वायज फंड से भी कुछ मिल जाने की उम्मीद थी।

मेरिट स्कालरशिप के लिए कम से कम ७५ प्रतिशत अंक चाहिए होने थे वह मुझे मिल नहीं सकती थी। पुअर ब्वायज फंड से इंतजाम न हो पाने केकारण मुझे महीने की फीस की किल्लत होने लगी। मैं अपने घर से कालेज जो कि वहां से करीब दस किलोमीटर था, अक्सर पैदल ही जाता। साइकिल कभी होती कभी नहीं। आखिर घर में एक ही साइकिल थी। पिताजी भी उसी से चलते।

१४ नवंबर १९७१ को शाम चार बजे के आसपास मैं पैदल ही झांसी रेलवे लाइन के किनारे-किनारे चलते हुए रात आठ बजे के आसपास भीमसेन पहुंचा। जाड़े की रात रेलवे लाइन के किनारे कुछ दिखता नहीं था लेकिन एक धुन थी कि जीवन में कुछ करना है तो घर छोड़ो, मोह छोड़ो कुछ करो। ये नीरस और एकरस जीवन मैं नहीं जी सकता। भीमसेन जंक्शन पर मानिकपुर पैसेंजर खड़ी थी, जो बांदा होते हुए चित्रकूट जाती थी। मैं उसमें चढ़ गया। पैसे तो पास में थे नहीं इसलिए टिकट का सवाल ही नहीं उठता था। तब सोलह-सत्रह के बीच की उमर थी इसलिए ज्यादातर लोग मुझे दसवीं या ग्यारहवीं में पढऩे वाला विद्यार्थी ही समझते। सुबह छह बजे गाड़ी कर्वी पहुंची। यानी चित्रकूट पीछे रह गया था। मुझे एक सहयात्री ने बताया कि चित्रकूट जाना था तो भरतकूप उतरते।

मुझे ताव था कि देश को जानना है तो गांवों को जानो इसीलिए मैं चित्रकूट जा रहा था। कर्वी उतर कर मैं लाइन के किनारे-किनारे भरतकूप की तरफ चल पड़ा। पयस्विनी नदी के किनारे एक जगह मैं निवृत्त हुआ। फिर चल पड़ा। भरतकूप पहुंचकर पता चला कि असली चित्रकूट जाने के लिए सीतापुर जाना पड़ेगा जो काफी पीछे छूट चुका है। मैने अब रेलवे लाइन छोड़कर सड़क पकड़ी और सीतापुर तिराहे पहुंचा जहां से दाएं तरफ जाने पर सीतापुर पहुंचा जा सकता था तथा सीधे जाने पर कर्वी पहुंच जाते। मैं दाएं मुड़ गया और करीब एक घंटे पैदल चलकर मैं पहुंच गया सीतापुर। वहां कामदगिरि नामका एक पहाड़ था। लोगबाग उसकी परिक्रमा कर रहे थे। उसका एक चक्कर करीब सात कोस यानी चौदह मील का था।

मैं भी परिक्रमा के लिए भीड़ में शरीक हो गया फिर लगा कि मैं यह क्या कर रहा हूं। इसका औचित्य क्या है और बस परिक्रमा छोड़कर मैं लौटने लगा। कुछ पदयात्रियों ने पूछा यह क्या कर रहे हो। मैं कुछ नहीं बोला। चित्रकूट के रामघाट पर आया और पयस्विनी नदी पार कर उस पार के सतना जिले में पहुंच गया। पयस्विनी में कमर तक पानी था। नदी के पार भयानक जंगल। मैं नदी के किनारे यूं ही चलने लगा। रास्ते में अमरूद के पेड़ थे मैने अमरूद तोड़े और भूख मिटाई। जंगल में चलते-चलते रात हो आई और कुछ दिखे नहीं। एक जगह कुछ उजाला दिखा मैं उधर ही बढ़ लिया। एक बाबाजी की कुटिया थी।

अंदर घुसा तो देखा कि एक दीपक जल रहा है और एक बाबाजी रात्रि के भोजन की तैयारी कर रहे हैं। मुझे देखकर वे अचकचा गए। बोले- कस बच्चा। मैने कहा बाबाजी भूख लगी है कुछ मिलेगा। उन्होंने हाथ में पानी लगा-लगाकर सेंकी गई दो रोटियां दीं। मिट्टी की बटलोई में बनी बिना हल्दी व नमक वाली दाल दी। खाना अच्छा लगा। बोले- यहां कैसे आया बच्चा। मैने कहा- और कहां जाता? सब कुछ देखने और जानने की इच्छा है। बोले अभी तुम्हारी उमर बहुत कम है। मैंने कहा कि बुढ़ापे तक मैं इंतजार नहीं कर सकता। मेरे चेहरे को एकटक देखकर बोले तू संन्यासी नहीं बनेगा। लेकिन गृहस्थ भी नहीं बन पाएगा और तेरा जीवन बड़ा दुखद रहेगा। पर तू रहेगा मस्त। राजा न होकर भी राज करेगा लेकिन मोह तुझे जीवन भर सालेगा।

पता नहीं बाबा कितना सच बोल रहे थे कितना मुझ पर रौब मार रहे थे। लेकिन मुझे वहां रुकने की इच्छा नहींं हुई। मैने कहा बाबा स्टेशन कितनी दूर है मुझे जाना है। बाबा बोले तीन कोस। रास्ता बता दिया। मैं उस अंधियारी रात में ही चल पड़ा। करीब घंटे भर चलने के बाद एकाएक मुझे बैलों के गले में बंधी घंटियां सुनाई दीं। मैं तेजी से बढ़ा। एक बैलगाड़ी चली जा रही थी। मैने गाड़ीवान से पूछा- स्टेशन अभी कितनी दूर है?

    – बाबूजी आप भटक गए हैं। इस रास्ते तो भुराहरे ही टेशन पहुंच पाएंगे।

    – तुम कहां जा रहे हो? मैने जानना चाहा।

    – हमें तो जारचा तक जानो है। आप ऐसो करो हमाई गाड़ी मां बैठ जाओ। आत्मीयता जताते हुए उसने कहा। रास्ते में उसने बताया कि बाबू जी स्टेशन तो चार कोस से कम न पडि़हे। गाड़ी में एक कथरी पड़ी थी मैने उसीको ओढ़ लिया क्योंकि जाड़ा भी लग रहा था।

गाड़ीवान अहीर था और वह अपनी ससुराल से अपनी बीवी को विदा करा के ला रहा था। मायके से विदाई के वक्त उसकी बीवी खूब रोई थी, अभी भी वह सुबक रही थी। रास्ते में गाड़ीवान ने अपनी बीवी से कहा कि विदाई के लड्डू बाबूजी को भी खवाओ। सेब के लड्डू वाकई अच्छे लगे। जारचा पहुंच कर गाड़ीवान ने अपनी बीवी को घर में उतारा, फिर बोला अब एक कोस पै टेशन है बाबूजी। चला हम तुमका छोड़ के आवत है। एक अनजान व्यक्ति की यह सदाशयता भिगो देने वाली थी। सुबह के पांच बजे हम कर्वी स्टेशन पहुंचे। अब मैं फिर ऊहापोह में। गाडिय़ां आ-जा रही थीं। मैं कहां जाऊं। घर से कुछ सोच के निकला नहीं था। और जीवन में परिवर्तन इतनी तीव्रता से आता नहीं।

पूरा दिन बीत गया मैं स्टेशन पर बैठा रहा। भूख भी लग रही थी लेकिन खाता क्या। एक बेंच से दूसरी बेंच। कभी इससे बतियाता तो कभी उससे। शाम को स्टेशन से बाहर निकला। देखा कुछ लोग लकडिय़ां जलाकर ताप रहे थे। मैं भी उनके बीच बैठ गया। वे पास के गांव से किसी काम से आए थे और अब रात आठ बजे आने वाली झांसी पैसेंजर का इंतजार कर रहे थे। मैं भी उनसे बतियाने लगा। उन्होंने कुछ शकरकंद इस अलाव में गाड़ रखी थीं। कुछ देर बाद उन्हें निकाला और खाने लगे। मुझे भी कस कर भूख लगी थी लेकिन अभी मैं सच्चा सर्वहारा बन नहीं पाया था कि बगैर उनके कहे ही उनके भोजन पर टूट पड़ूं। लेकिन उन लोगों ने मुझे भी अपने इस भोजन में आमंत्रित किया मैं तो चाहता ही था। डटकर शकरकंद खाई। फिर वे मूंगफली लाए उन्हें भी खाया गया।

रात आठ बजे झांसी पैसेंजर आई तो वे उसमें सवार हो गए। मैं भी उसी गाड़ी में चढ़ गया। रागोल और उसके बाद गाड़ी महोबा में रुकी तो मुझे शक हुआ कि पिछली बार तो ये स्टेशन नहीं पड़े थे। मैने सोचा था कि झांसी पैसेंजर भीमसेन स्टेशन होकर जाती होगी। मैं भीमसेन के आगे पामां में उतर जाऊंगा जहां से अपने ननिहाल चला जाऊंगा। लेकिन गाड़ी तो किसी और रूट पर भागी जा रही थी। मैने एक सहयात्री से पूछा कि क्या ये गाड़ी भीमसेन नहीं जाएगी। उसने कहा नहीं तो तुम्हें कहां जाना है। मैने कहा कि कानपुर।

वो बोला कि कानपुर की ट्रेन तो शाम चार बजे जाती है या फिर देर रात को। आपको कानपुर की टिेकट भी कैसे मिल गई। मैं चुप रहा। कुछ देर बाद टीटीई आ गया और मेरे पास तो टिक ट थी नहीं, उसने मुझे अगले जिस स्टेशन पर गाड़ी रुकी। वहीं उतार दिया। सूनसान स्टेशन और घोर अंधेरा। बस तारों भरे आसमान के अलावा और कुछ नहीं दीख रहा था। ठंड भी खूब थी। पता नहीं कहां था मैं।

कुछ देर बाद स्टेशन मास्टर आया और अपने केबिन में ले गया। वहां गुर्राकर बोला- घर से भागा है बे? क्या करता है, पढ़ता है? मुझे उसके बोलने के अंदाज से बड़ा गुस्सा आया मैने कहा- नहीं घास छीलता हूं। तड़ाक से उसने एक चांटा मारा और पास खड़े अपने सहायक से कहा कि इसे बंद कर दो पुलिस बुलवाकर जेल भिजवा देंगे। पुलिस के नाम से मैं डरा। उसका सहायक मुझे बाहर ले आया। बोला कहां फंस गए हो? मैने कहा क्या करता पैसे थे नहीं, गलत गाड़ी में चढ़ गया। उसने कहा यहां कोई गाड़ी रुकती तो है नहीं। बस इसी समय यही गाड़ी कल फिर आएगी। फिर कहा कि अगला स्टेशन निमाड़ी है। वहां चले जाओ वहां शाम पांच बजे झांसी की गाड़ी आएगी उसे पकड़ लेना।

मैने कहा कि रात को इस जंगल में मैं कैसे जाऊंगा। वो बोला- अगर यहां रुके और इस स्टेशन मास्टर ने देख लिया तो पुलिस बुलाकर साला पकड़वा भी सकता है इसलिए मेरी मानो यहां से निकल जाओ। मैं निकल पड़ा। रेल लाइन के किनारे-किनारे चल पड़ा। बस झींगुरों की आवाज थी और तारों से भरा आसमान। ठंड के कारण मैं अकड़ा जा रहा था। इसलिए करीब भागने की तरह मैं चलने लगा।

आगे का दृश्य काफी भयावह था। पटरी दो पहाडिय़ों के बीच से गुजर रही थी। मुझे मोपासां की भुतही कहानियां याद आने लगीं। मुझे लगा कि मैं ईश्वर की सत्ता नहीं मानता। भूत-प्रेत को मानव मन की कल्पना मानता हूं लेकिन अगर हो तो मैं क्या कर सकता हूं। कुछ देर उस गुफा में घुसने से डरा लेकिन फिर उसके अंदर घुस गया। सांप और दूसरे कीड़ों का भी डर था। इसलिए मैं पटरियों के बीच में चलने लगा कुछ भी दिख नहीं रहा था। कई बार पैर स्लीपर से टकरा जाता और मैं गिरते-गिरते बचता। काफी दूर जाने के बाद पटरी उस गुफानुमा दड़बे से बाहर हुई। भूख, थकान, ठंड और नींद के कारण मैं बाहर निकलकर एक

जगह पटरी के पास बैठ गया। कुछ देर बाद गडग़ड़ाहट की आवाज आई तो हड़बड़ाकर उठा तो देखा कोई मालगाड़ी गुजर रही थी। तब तक उजाला फूटने लगा था। मैं उठा और चल दिया। एक छोटी सी नदी दिखी तो उसी के किनारे फ्रेश हुआ। मुंह धोया। बुंदेलखंड की नदियों का पानी बहुत साफ होता है सो वही पानी पिया। आगे एक खेत की रखवाली करता किसान दिखा तो मैने उससे कहा कि भूख लगी है कुछ खाने को मिलेगा क्या? उसने कहा हम तो दाऊ चमार हैं तुम ऐसो करौ कि सामने जा गांव है मुखिया साहब के हियां चले जाओ कुछ मिलि जैहै। मैने कहा नहीं हमहूं चमारै हैं तुम्हाए पास जो हो खिया देव। उसने कहा जा लेव और बाजरे के भुट्टे भूने वही मैने डट कर खाए।

बाजरे का भुट्टा खाना भी एक कला है वर्ना जरा भी गले में फंस जाए तो जान भी जा सकती है। बेचारा वही रखवाला मुझे भुट्टा खाने का तरीका भी बताता रहा। मैं फिर आगे निकल पड़ा। एक सज्जन मिले। सिर पर बुंदेली पाग, ऊनी कुर्ता, सदरी और सफेद झक्कास धोती। मैने उनसे नमस्कार किया और कहा कि मैं कानपुर से आया हूं। गलती से दूसरी गाड़ी में बैठ गया था इसलिए पिछले स्टेशन पर उतार दिया गया। अब निमाड़ी जा रहा हूं। भूखा हूं कुछ खाना मिलेगा कहीं से। उन्होंने कहा कि मैं इस गांव का मुखिया हूं लेकिन अब घर पर होता तो शायद मिल जाता। इस वक्त मेरे पास यह चवन्नी है। और तुम जल्दी से यहां से निकल जाओ यह कहते हुए उन्होंने मेरी तरफ वह चवन्नी यूं फेंकी मानो मैं कोई भिखारी हूं।

मैंने कहा मैने भीख नहीं मांगी थी और मैं बगैर उनकी चवन्नी लिए वहां से चला गया। जब मैं निमाड़ी स्टेशन पहुंचा तब करीब बारह बज रहे थे। निमाड़ी एक छोटा सा कस्बा था। वह शायद ओरछा के आसपास रहा होगा। स्टेशन पर बड़ी गहमा गहमी थी। पता चला कि रेलवे के कोई बड़े अफसर स्टेशन की चेकिंग के लिए आ रहे हैं। उनकेलिए मछली और न जाने क्या-क्या भूना जा रहा था। मुझे बहुत जोर की भूख लगी थी। जेब में एक धेला नहीं। करूं तो क्या करूं। आखिर रेलवे के एक खलासी से मैने कहा कि यार तुम्हारे यहां अफसरों की इतनी खातिरदारी हो रही है कि मुझे तो उनके भोजन की तैयारी देखकर ही भूख लगने लगी है। वो हंसा और बोला बाबूजी आपके लिए भी जुगाड़ कर देंगे। मैने कहा यार मेरे पास न तो पैसे हैं न कुछ सामान जो बदले में तुम्हें कुछ दे सकूंगा। वो मुस्करा कर चला गया। थोड़ी देर बाद आया तो कुछ पूरियां और सब्जी लेकर। मैने छक कर खाया।

शाम को पांच बजे गाड़ी आई। इस दफे मैं तड़े था कि अगर कोई टीटीई नुमा व्यक्ति दिखा तो मैं डिब्बा बदल लिया करूंगा। रात नौ बजे ट्रेन झांसी पहुंची। उन दिनों पाकिस्तान से लड़ाई चल रही थी। इसलिए शहरों में सारी लाइटें बुझाकर ब्लैक आउट कर दिया जाया करता था। गाड़ी झांसी केआउटर पर खड़ी हो गई। मैं झट से उतरा और पैदल चलकर स्टेशन आ गया। मैं बचपन से ही झांसी का किला देखने की तमन्ना पाले था। झांसी से ही रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों के विरुद्घ तलवार उठाई थी। रात मैने स्टेशन की एक बेंच पर काटी। सुबह स्टेशन से ही फारिग होकर मैं किले की तरफ निकल पड़ा। राजा वीरसिंह देवजू का बनवाया किला।

झांसी पहले बुंदेले राजपूतों की थी फिर छत्रसाल का बारहवां बेटा बनकर पेशवा बाजीराव ने उनसे झांसी की रियासत ले ली थी। तबसे झांसी मराठों के कब्जे में आ गई। झांसी केआखिरी शासक राजा गंगाधर राव थे जो रानी लक्ष्मीबाई के पति थे। किले में खूब घूमता रहा। वह स्थान भी देखा जहां से रानी अपने घोड़े की पीठ पर बैठकर किले की प्राचीर से कूदी थीं। अंग्रेजों ने किला राजा गंगाधर राव की मृत्यु के बाद अपने अधिकार में ले लिया था और रानी को पांच हजार रुपए सालाना की खिराज देकर उन्हें एक छोटे से मकान में भेज दिया था। लेकिन यहीं अंग्रेज भूल कर बैठे थे। रानी ने उस मकान से ही अपने दत्तक पुत्र दामोदर राव का जनेऊ किया जिसमें लगभग सभी रजवाड़ों ने हिस्सा लिया। उसी मौकेपर बगावत की रूपरेखा बनाई गई और जल्दी ही रानी ने गदर के मौके पर अपनी फौज लेकर किले पर फिर से अधिकार कर लिया। यह अलग बात है कि अंग्रेजों ने वह विद्रोह दबा दिया। लेकिन आजादी की उस चिनगारी की आंच को अंग्रेज खत्म नहीं कर सके।

किला देखने के बाद बाहर आया तो जोरों से भूख लगी थी। गांव होता तो जुगाड़ हो भी जाता पर यहां कहां। मैं किसी तरह फिर स्टेशन आया। वहां प्लेटफार्म पर एक बेंच पर बैठा था। वहीं पास एक सज्जन आकर बैठे। बातचीत चलने लगी तो पता चला कि वे कानपुर में गोविंद नगर केहैं और भोपाल से लौटे हैं। वे अपने साथ कुछ पूरियां लिए थे। मुझे भी खिलाईं। रात को दस बजे कानपुर फास्ट पैसेंजर जाने वाली थी उसी से वे लौट रहे थे। मैने कह दिया कि मैं भी उसी से जाऊंगा। रात को हम उसी ट्रेन में सवार हुए। गाड़ी सुबह चार बजे पामां पहुंची।

पामां के करीब ही मेरा ननिहाल था। मैने वहीं जाने की ठानी। पामां में जैसे ही उतरा तो सामने ही स्टेशन मास्टर खड़ा था। उसने कहा- टिकट। मैने उसकी बात अनसुनी कर दी और प्लेटफार्म से बाहर की तरफ चल दिया। वो चिल्लाया अरे कहां जा रहे हो टिकट दिखाते जाओ। वो फिर भागते हुए मेरे पीछे आ गया। मैं बाहर आकर खड़ा हो गया और दूसरी तरफ मुंह कर पेशाब करने लगा।

अब वह मेरे पीछे। पेशाब करने के बाद मैं मुड़ा और बोला क्यों ऐसी क्या जल्दी है। और कोई पैसेंजर नहीं उतरा क्या जो मेरे पीछे पड़े हो। मेरे पास तो टिकट है भी नहीं। बोला पढ़ते हो? मैने कहा हां। अब घर आना था और पैसे थे नहीं तो क्या करता। वो बोला पैसे तो तुम लोग सिनेमा में उड़ा डालते हो। क्यों मां-बाप का पैसा बर्बाद कर रहे हो। वह मुझे स्टेशन में अपने केबिन में ले आया। वहां एक दरोगाजी बैठे थे। उन्होंने स्टेशन मास्टर से कहा कि छोड़ो श्रीवास्तवजी क्यों लड़के को तंग कर रहे हो जाने दो बेचारे को। पैसे नहीं रहे होंगे तो टिकट कहां से लेता। बहरहाल उन्होंने मेरा नाम पूछा और मुझे मेरी ननिहाल तक अपनी मोटरसाइकिल से छोड़ दिया।

मैं फिर कानपुर लौट आया। अबकी मुझसे कोई कुछ नहीं बोला। सब सोचते कि इनका मन अब घर पर नहीं लगेगा। कानपुर में तब छात्र राजनीति चरम पर थी। समाजवादी छात्रों की अलग राजनीति थी तो संघ से जुड़ा विद्यार्थी परिषद भी आंदोलन कर रहा था।

लेकिन इन सब के बीच मुझे सीपीआई (एमएल) के नारों ने खूब लुभाया। संसद सुअरों का बाड़ा है, चीन का चेयरमैन हमारा चेयरमैन, कामरेड माआत्सेतुंग जिंदाबाद। चलो गांव की ओर, सभी बुर्जुआ प्रतीकों को तोड़ दो या जला दो, आदि नक्सली नारे अपनी तरफ ज्यादा खींच रहे थे। गांधी, नेहरू, सुभाष ही नहीं आजादी के कई लड़ाकों की नए सिरे से व्याख्या हो रही थी। तमाम बुर्जुआ नेताओं की मूर्तियां तोड़ी जा रही थीं। बुर्जुआ सलीका या सामंती परंपराओं के विरुद्घ उस वक्त वाम नौजवानों में ऐसा गुस्सा था कि कई नौजवानों ने पिता के पैर छूना या किसी बुजुर्ग को नमस्ते करना भी बंद कर दिया था। माना जा रहा था कि नई पीढ़ी को सारे बुर्जुआ प्रतीकों से लडऩा है। सब कुछ बदल डालना है।

शंभूनाथ शुक्ला के फेसबुक वॉल से.

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