बेडरूम और रसोई से अलग औरतों की उपस्थिति किसी को याद नहीं रहती है!

: लिंगभेद भी भ्रष्‍टाचार ही है : कितना शुक्र है कि कुछ दुआएं, प्रार्थनाएं, आशीर्वाद इस देश में फल नहीं रहे। वर्ना ना तो इन पंक्तियों को लिखने वाली ही पैदा होती और ना ही उसके जैसी अन्य तमाम। ‘दूधो नाहाओ पूतो फलो‘, ‘तेरे बेटे-पोते बने रहें‘ पुत्रवती भव‘, ‘दूध,पूत, धन्य-धान से वंचित रहे ना कोय‘ और ऐसी ही तमाम दुआएं, प्रार्थनाओं और आशीर्वादों को बेफलित करती हई बेटियां पैदा हो रही हैं। ना सिर्फ पैदा हो रहीं हैं बल्कि हर गली-नुक्कड़, यहां-वहां, काम और बेकाम की जगहों पर उपस्थित हो रही हैं। हालांकि ऐसी तमाम दुआओं के समर्थन में विज्ञान, तकनीक, चिकित्सा और चिकित्सक भी उतर आए हैं कि बेटियां पैदा ना हों। लेकिन कुछ नेकदिल माता-पिताओं के कारण लड़कियां अभी भी हैं और रहेंगी पूरी धमक के साथ।

दूर देश आस्ट्रिया से एक खबर उम्मीदों और आशाओं का तोहफा लाई है। ऑस्ट्रिया के राष्ट्रीयगान में एक पंक्ति थी ‘हाईमाट बिस्ट ग्रोएसर जोएने‘ यानि के ‘महान पुत्रों का देश‘। देश में महिलाओं की उपस्थिति को ही यह राष्ट्रगान नकार रहा था। महिलाओं के समान अधिकार के तहत इस भेदभाव पर काफी समय से विवाद चल रहा था। आखिरकार महिलाओं को समान दर्जा देते हुए इस राष्ट्रगान में बदलाव किया गया। आस्ट्रियाई संसद की मोहर के बाद अब इस राष्ट्रगान में वहां की महान बेटियों को भी जगह दी जा रही है। हालांकि इस बदलाव से राष्ट्रगान की धुन, में मुश्किलें आ रही हैं और आएंगी। लेकिन शब्द, सुर, ताल, लय सिर्फ पुरुषों की बपौती तो नहीं। आस्ट्रिया में लड़कियों, स्त्रियों की खातिर देश के राष्ट्रगान के शब्दों, लय-ताल में बदलाव हुआ है। यह महज कुछ शब्दों का बदलाव भर नहीं है। यह अपने देश की आधी आबादी के अस्तित्व को स्वीकारने की बहुत बड़ी पहल है।

प्रसूति गृह, बेड़रूम और रसोई से अलग औरतों की उपस्थिति ना तो किसी को याद रहती है ना ही कहीं दर्ज होती है। औपचारिकतावश दर्ज की गई उपस्थिति अलग है। असल बात तो यह है कि स्त्रियों को अभी भी पूरी तरह अहसास ही नहीं कि कैसे शब्द-दर-शब्द, विचार-दर-विचार, साल-दर-साल उन्हें खारिज किया जाता रहा है। हर एक दुआ, प्रार्थना, धर्मग्रंथ, उपदेश, नीतियां स्त्रियों की जिंदगी पर खतरे की तरह मंडराती हैं! (अपवाद हैं, पर वे जीने के लिए काफी नहीं!) यहां तक कि मुहावरे, लोकोक्तियां, कहावतें, चुटकुले भी स्त्रियों के अस्तित्व के विरुद्ध हैं, उनका मजाक उड़ाते हैं। और तो और हमारी भाषा भी लिंगभेदी है। वैज्ञानिक खोजें तक पितृसत्ता की कैद में हैं। तभी तो उत्तेजना बढ़ाने वाली दवाइयों की खोज बढ़-चढ़ कर हुई। लेकिन पूरी दुनिया की बच्चियां, लड़कियां, स्त्रियां पुरुषों की जिस अति यौनेच्छा (यौन हमलों) से हद दर्जे तक त्रस्त हैं, उस यौनेच्छा को नियंत्रित करने वाले किसी इजेंक्शन, गोली, कैप्सूल, या ट्यूब की खोज अभी तक क्यों नहीं हुई?

स्त्रियां दो तरह के व्यवहार की शिकार हैं। या तो उनकी उपस्थिति को खारिज किया गया है या फिर पुरुष सत्ता ने उन्हे मनचाहे तरीके से दर्ज किया है। ये दोनों ही तरीके सख्त आपत्तिजनक हैं। सवाल यह है कि आपत्ति कहां-कहां और किस तरह से दर्ज की जाए? क्या सिर्फ आपत्ति दर्ज कराना और कराते जाना ही पर्याप्त है? लेकिन ये बाद के सवाल हैं। फिलहाल तो ऐसी आपत्तियों का बहुत बड़ा और संगठित रूप ही कहीं नजर नहीं आ रहा। आए कैसे? ‘दूधो नहाओ पूतो फलो‘ का आशीर्वाद स्त्रियों को भीतर तक भिगो देता है, आनंदित करता है। यह ‘चिरयौवन‘ होने का आशीर्वाद पाने जैसा अहसास कराता है स्त्रियों को। यह आशीर्वाद सुना नहीं कि गर्भ में नर भ्रूण होने की सी मुस्कान चेहरे पर छा जाती है। हो भी क्यों ना? स्त्री जीवन की चरम सफलता बेटों की मां बनते जाने में ही तो है! बेटियों की मांओं को स्वर्ग तो क्या जीवन भी नसीब नहीं होता! बेटियों की मांओं से पूछो, अस्पताल में देखने तक नहीं आता कोई। ऐसी जच्चाओं के लिए मन से सेवा और डिब्बे से घी ऐसे गायब होते हैं जैसे कभी थे ही नहीं। फिर कौन बेवकूफ होगी जो कहे कि ‘पुत्रवती भवः‘ जैसी तमाम घोर लिंगभेदी दुआओं, आशीर्वादों, प्रार्थनाओं, श्लोकों, ग्रंथों को बदल डालों या जला डालो! पहले ही पितृसत्ता की मारी स्त्रियां भला कैसे खुद अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मारे। मारे भी तो क्यों और कैसे?

असल में पितृसत्ता जैसा कुशलतम प्रबंधन अभी तक दुनिया की सफलतम कंपनी ने भी नहीं किया है। यह पुरुष सत्ता का प्रबंध कौशल ही तो है कि जाति, धर्म, नस्ल, रास्ट्र, खान-पान, पहनावा, संस्कृति, परंपराओं, भौगोलिक सीमा और परिस्थिति से अछूती यह पूरी दुनिया की स्त्रियों को अपना शिकार कर रही है। युग बदले, राज बदले, व्यवस्थाएं बदली, मूल्य बदले,  हर बदलाव को अपनाता हुआ पुरुष सत्ता का अजगर टस से मस नहीं हुआ। स्त्रियों के लिए बनाए गए मापदण्ड, मूल्य, आशीर्वाद, भाषा, तय किया गया व्यवहार, जिम्मेदारियां, काम, सभी कुछ आपस मे बेहद बुरी तरह से गुंथा हुआ है। पहले कौन सी गांठ, कौन सा बंद, कौन सी रस्सी काटी जाए समझना बेहद मुश्किल है।

अपने आप को आधुनिक और तरक्की पसंद कहलाने वाले समाज का भीतरी सच कुछ और ही है। एक तरफ ‘बेटी बचाओ‘ और ‘बेटा-बेटी एक समान जैसे नारे उछाले जा रहे हैं। माता-पिता भी यह कहते हुए दिखाई पड़ने लगे हैं कि हम ‘बेटे-बेटी‘ में कोई फर्क नहीं करते। लेकिन ध्यान से देखने पर पूरी सामाजिक संरचना में बेटियों के लिए अनिच्छा, उपेक्षा, घृणा, अपमान गहरे तक पसरा हुआ दिखाई पड़ता है। स्त्रियों के मसले में समाज का रवैया सदा से दोगला रहा है। बोलचाल में उपाधि उन्हें देवी, काली, दुर्गा, लक्ष्मी की जाती है और व्यवहार में दो कौड़ी की इज्जत भी उन्हें नहीं दी जाती। बेटी के जन्म के लिए कहावत तो बना दी कि ‘लक्ष्मी आई है‘ लेकिन स्वागत तो उसका भिखारियों जैसा भी नहीं होता (अपवाद जरुर हैं)। क्या लक्ष्मियों का और उन्हें पैदा करने वालियों का ऐसे ही स्वागत होता है जैसा कि अक्सर देखने-सुनने को मिल रहा है? सचमुच की लक्ष्मी का स्वागत भी क्या लोग ऐसी ही मनहूसियत से कौन करेगे?

कहने को स्त्री देवी है और पुरुष साधारण इंसान है कोई देवता नहीं। पर जसके लिए स्वयं देवियां (पत्नियां और मांए) भूखी-प्यासी रहें, कठोर व्रत करें वह कोई इंसान कैसे हो सकता है? नहीं वह ‘परमईश्वर‘ ही हो सकता है, होता है! घर-परिवार में सबसे छोटे भाई को बड़ी-बड़ी बहनों से ज्यादा तवज्जों दी जाती है। निखट्टू और आवारा भाई भी काबिल और हुनरमंद बहनों से ज्यादा प्यार, सम्मान, पौष्टिक भोजन, आजादी और तवज्जो पाते हैं। क्यों भला?

देश, समाज, परिवार, स्त्री-पुरुष आधुनिकता को अच्छा मूल्य मानते हैं। बेटे-बेटी में फर्क को व्यवहार में सबसे छिपाना चाहते हैं। लड़की-लड़के की समानता का मौखिक रूप से डंका बजाते हैं, तो निश्चित तौर पर बेटा-बेटी समानता में कुछ तो ऐसा है जो अच्छा माना जाने योग्य है, जो अच्छी छवि दिखाने के लिए जरुरी है। इस बात को इस तरह से समझा जा सकता है जैसे करोड़ों-अरबों की चोरी, गबन, घोटाले करने वाले भी सार्वजनिक रूप से यही कहते हैं कि उन्होंने चोरी नहीं की है वे ईमानदार हैं। सिर्फ सजा पाने से बचने के लिए वे झूठ नहीं बोलते। वे झूठ इसलिए भी बोलते हैं, क्योंकि समाज में ‘ईमानदारी‘ का मूल्य और सम्मान आज भी ज्यादा है। वे दोनों हाथ में लड्डू चाहते हैं। बेहसिाब धन-दौलत भी और ईमानदार की अच्दी छवि भी। इसी तर्ज पर लोग बेटा है तो जीवन सफल वाली सोच में डूबे रहकर तर जाना चाहते हैं। साथ ही बेटा-बेटी में फर्क नहीं करते दिखाकर बेटियों और समाज की नजरों में उंचे भी उठना चाहते हैं। लेकिन इस दोगले व्यवहार में बहुत सारी उर्जा बेकार जाती है, जिसका कि रचनात्मक उपयोग किया जा सकता हैं और किया जाना चाहिए परिवार, समाज ओर राष्ट्र के हित में।

भ्रष्टाचार सिर्फ रुपये-पैसे की हेराफेरी भर नहीं होता। भ्रष्ट विचार भी होते हैं भ्रष्ट आचरण भी होता है। विचार और व्यवहार में लिंगभेद करना और मौखिक रूप से इसका विरोध करना भी भ्रष्टाचार (भ्रष्ट आचार) ही है। सिर्फ आर्थिक भ्रष्टाचार को खत्म करके कोई भी परिवार, समाज, देश तरक्की नहीं कर सकता। लिंगभेद एक बहुत बड़ा, व्यापक और गहरा भ्रष्टाचार है। इस भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए किसी बड़े आंदोलन की भी जरुरत नहीं। अपने-अपने घर-परिवार में हर कोई लिंग समानता को व्यवहार में ला सकता है। ऑस्ट्रिया जैसे छोटे से देश से इस विशाल देश को सीख लेनी चाहिए। बेटियों को नकारने वाले उनकी उपेक्षा करने वाले और बेटों को ज्यादा प्यार, सम्मान व स्थान देने वाले तमाम आशीर्वादों, प्रार्थनाओं, दुआओं को तत्काल प्रभाव से बदलने की जरुरत है। लिंगभेद के भ्रष्टाचार में लिप्त पाये जाने के हम सब दोषी हैं। अपनी बच्च्यिों, बहनों, प्रेमिकाओं, जीवनसंगनियों, मांओं, दादी-नानी के प्रेम के कि खातिर, लिंगभेद से ग्रसित हर एक शै का दिल से विरोध करना ही चाहिए। स्त्री-पुरुषों के साझे सहयोग से ही यह संभव हो सकता है।

लेखिका गायत्री आर्य स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।

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