ब्राह्मणवादी गुलामी में सिसकती आधी आबादी और मल्टीनेशनल नौटंकी

कल एक कार्यक्रम में महिलाओं को समझने का अवसर मिला। स्थानीय एएन सिन्हा सामाजिक अध्ययन शोध संस्थान में एक मल्टीनेशनल एनजीओ के सहयोग से एक मल्टीनेशनल संगठन ने कार्यक्रम का आयोजन किया था। चूंकि कार्यक्रम महिलाओं पर केंद्रित था और इसे बिहार के नजरिए से देखने की बात कही गयी थी। इसलिए मेरी दिलचस्पी अधिक थी। चूंकि सारा मामला मल्टीनेशनल था तो सब कुछ मल्टीनेशनल के जैसा ही था। दिल्ली से पत्रकारों की टीम किराये पर लायी गयी थी। ठीक वैसे ही जैसे शादी-विवाह में भाड़े पर लोग लाये जाते हैं।

जब मैं कार्यक्रम में पहुंचा तब एक स्थानीय महिला नेता जो एक राजनीतिक दल के विशेष संगठन का राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिनिधित्व करती हैं, बोल रही थीं। फ़ूल और मालाओं से गुलजार सजाया गया मंच किसी विवाह के मंडप के जैसा प्रतीत हो रहा था। खैर, वह बोल रही थीं कि महिलाओं के संघर्ष का इतिहास रहा है। आजादी की लड़ाई से लेकर जमीन की लड़ाई तक में महिलाओं ने अपनी भागीदारी निभायी। इतिहासकारों ने महिलाओं के साथ सौतेलापन व्यवहार किया। यह आरोप भी लगाया गया। कार्यक्रम चल रहा था। एक के बाद एक वक्ता मंच पर आयीं और बोल रही थीं। कोई यह संदेश देती नजर आयीं कि महिलाओं को अपने अंदर मुक्ति की भावना जगानी चाहिए। जबतक यह भावना जाग्रत नहीं होगी तबतक कुछ भी नहीं होगा। फ़िर दिल्ली से बुलायी गयीं बिहार की पूर्व महिला राजनीतिज्ञ ने अपने अनुभव साझा किये। बताया कि उन्होंने कैसे संघर्ष किया। कितना लिखा और कितना पढा। सब कुछ बताया। फ़िर जब मैंने उनसे विशेष साक्षात्कार किया तब उन्होंने कहा कि पालिटिक्स में भी महिलाओं का यौन शोषण होता है। ठीक वैसे ही जैसे फ़िल्म जगत, खेल या कारपोरेट घरानों में हुआ करता है। मुझ जैसे अबुझ के लिए यह वाकई एक बड़ी बात थी। पहली बार किसी महिला ने अधिकारिक तौर पर इस सच को स्वीकारा था। बाद में जानकारी मिली कि उन्होंने अपनी आत्मकथा में यह सारा किस्सा सुनाया है कि कैसे उन्हें एमएलसी बनाया गया।

खैर, कार्यक्रम का दूसरा सत्र शुरु होना था। जानकारी मिली कि दूसरे सत्र में पत्रकार भाग लेंगे। मेरी दिलचस्पी का पारा चढ़ने लगा। लेकिन जल्द ही सारा जोश ठंडा पड़ गया जब जानकारी मिली कि अब इसका उद्घाटन सत्र शुरु होगा। मैं सोच में पड़ गया। हैरानी भी हुई। मालूम हुआ कि डिप्टी सीएम सुशील मोदी 4 बजे आने वाले थे, वे अभी आ रहे हैं। इसलिए पत्रकारों के सत्र को बाद में शुरु किया जायेगा। मेरे बगल में बैठे एक बड़े पत्रकार जिन्हें वक्ता की भूमिका निभानी थी, उठकर चले गये। मैं भी चला जाना चाहता था। लेकिन फ़िर यह सोचकर कि यदि डिप्टी सीएम का भाषण नहीं सुनूंगा फ़िर न्यूज कैसे लिखूंगा। इसलिए रुक गया। तब तक अपने महिला मित्रों से विचार साझा करता रहा। फ़िर डिप्टी सीएम आये। फ़िर उद्घाटन की नौटंकी की गयी। फ़िर परंपरा के अनुसार भाषणबाजी भी हुई। मोदी जी बोलने लगे। तमाम तरह की बातें कहीं उन्होंने। आरक्षण से लेकर दिल्ली गैंगरेप तक की बातें। खास बात यह रही कि उन्होंने आरक्षण को पाजिटिव डिस्क्रीमिनेशन कहा। यानी न्याय के साथ शोषण। जब वे यह बात कह रहे थे तब निश्चित तौर पर उनके चेहरे का रंग सामान्य नहीं था। फ़िर फ़ुले ताई का जिक्र करना यह साबित कर रहा था कि देश में दलित और पिछड़ा साहित्य अब असर दिखा रहा है। वैसे इसकी भी राजनीतिक मजबूरी ही रही, वर्ना दुर्गा और सरस्वती के नाम की कसमें खाने वाले लोग यूं ही फ़ुले ताई की वंदना नहीं कर सकते। ऐसा मैं दावे के साथ कह सकता हूं।

खैर, उद्घाटन सत्र के बाद खाने का दौर चला। खाना स्वादिष्ट और भीड़ बहुत अधिक थी। एक आयोजक प्रतिनिधि ने बताया कि उन्होंने 200 लोगों को बुलावा भेजा था, सब के सब चले आये। अमूमन ऐसा नहीं होता है। वैसे भीड़ के चरित्र के हिसाब से उनका यह कथन वाजिब ही था। भूख मुझे भी लगी थी, इसलिए थोड़ी मशक्कत की तब 4 पूरियां और चिकन के मजे लेने के बाद वापिस सभागार में प्रेस रिलीज लेने पहुंचा। जानकारी मिली कि प्रेस रिलीज टाइप हो रही है। मैं बिहार के बाहर से आये मेहमानों की सूची चाहता था ताकि न्यूज में उनका नाम जोड़ सकूं। इसलिए रुकना पड़ा। कार्यक्रम शुरु हुआ और एक वरिष्ठ पत्रकार महोदय बोलने लगे। मुझे उनमें और सुशील मोदी के भाषण में कोई अंतर नहीं सुनने को मिला। लगा जैसे मोदी जी ही अभी भी बोल रहे हों एक नये टोन में। बात-बात में “ठीक है” कहने का उनका अंदाज निराला है। इसलिए कभी-कभी भ्रम टूटता भी था।

मेरे सब्र का बांध टूट चुका था। मैं निकल पड़ा। बाइक स्टार्ट की तो देखा वही वरिष्ठ पत्रकार महोदय खड़े थे। शायद उन्हें भी जल्दी थी। मैंने अनुरोध किया कि सर आप कहें तो मैं आपको पहुंचा दूं। वैचारिक मतभेद होने के बावजूद मैं उनका सम्मान करता हूं। उन्होंने मेरा निवेदन स्वीकार किया और बैठ गये। रास्ते में उन्होंने अपने भाषण के बारे में पूछा। वे खुद को संतुष्ट होना चाहते थे कि उन्होंने दस मिनट की दिये गये अवधि में जो कुछ कहा, वह पर्याप्त था। मैंने पूरी ईमानदारी से हां कहा। फ़िर कोतवाली के पास वे उतर गये और मैं आगे निकल पड़ा।

कोतवाली से मेरे आफ़िस की दूरी बमुश्किल एक किलोमीटर की है, लेकिन जाम के कारण मुझे सोचने का पर्याप्त समय मिल गया कि आधी आबादी की गुलामी की मुख्य वजह कुछ और नहीं केवल ब्राह्मणवाद है। आधी आबादी यानी महिलाओं के लिए गुलामी कोई नई बात नहीं है। पश्चिम के देशों में महिलाओं ने जंजीरों को तोड़ने में सफ़लता जरुर हासिल की है, लेकिन मध्य एशियाई देशों में अभी भी यह दिवास्वप्न से अधिक कुछ भी नहीं। देवी-देवताओं के देश भारत में आधी आबादी की हालत आज भी गुलाम से अधिक कुछ भी नहीं। असलियत तो यही है कि भारत की महिलायें आज भी ब्राह्म्णवादी मानसिकता की गुलाम हैं। फ़िर चाहे वह उच्च वर्ग की महिला हो या मध्यम वर्ग या फ़िर वंचित वर्ग की। कहीं कोई खास अंतर नहीं है। वैसे पुरुष भी इसी मानसिकता के गुलाम हैं। लेकिन बलशाली होने के कारण उन्हें इस गुलामी का दंश कम झेलना पड़ता है।

लेखक नवल किशोर बिहार के पत्रकार हैं. अपना बिहार नामक पोर्टल का संचालन करते हैं.

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