ब्रेकिंग न्‍यूज ने रुकवा दी सरबजीत की रिहाई?

विदेश मंत्रालय सोता रहा और नींद के आगोश में हमारे विदेश मंत्री एसएम कृष्णा ने पाकिस्तान को सरबजीत की रिहाई पर बधाई भी दे दी. सवाल ये है कि अगर हमारी सरकार को पाकिस्तानी सरकार की तरफ से सरबजीत की रिहाई के बारे में कोई आधिकारिक सूचना नहीं थी, तो विदेश मंत्री को बधाई देने की जल्दी क्यों थी? सरबजीत पाकिस्तान के लाहौर की कोटलखपत जेल में मनप्रीत नाम के किसी शख्स की सज़ा काट रहा है. अपने आप में ये बेहद हैरान कर देने वाला मामला है जिसमें एक शख्स किसी दूसरे के नाम से सज़ा काट रहा है. पाकिस्तानी सरकार और वहां का सुप्रीमकोर्ट सरबजीत को सरबजीत मानने के लिए ही तैयार नहीं है. वो तो उसे मनप्रीत मान कर सजा दे चुका है. तो फिर कैसे बदला सारा घटनाक्रम… कैसे अचानक हुई सरबजीत की रिहाई की घोषणा.. और उसके छह घंटे बाद कैसे पाकिस्तान पलट गया?

अगर इस मामले में भारतीय मीडिया ने जल्दबाजी ना दिखाई होती तो शायद पाकिस्तान पलटी नहीं खाता. हुआ यूं कि बीते दिनों भारत ने एक चर्चित पाकिस्तानी कैदी की रिहाई की थी, जिसके बाद से ही पाक राष्ट्रपति आसिफ अली ज़रदारी पर भी एक कदम आगे बढ़ाने का अंतर्राष्ट्रीय दबाव काम कर रहा था. ज़रदारी ने काफी सोच विचार के बाद सरबजीत की रिहाई का ये ऐतिहासिक फैसला लिया था. ज़रदारी ये अच्छी तरह जानते थे कि अन्तराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित सरबजीत के केस में रिहाई का फैसला उन्हें पश्चिमी देशों ख़ास कर अमेरिका में खासी वाह-वाही दिलाएगा. लेकिन उन्हें इस बात का भी डर था कि घरेलू स्तर पर कट्टरपंथी उनके इस निर्णय से नाराज़ भी हो सकते हैं. इसके अलावा उन्हें आईएसआई और सेना की भी नाराज़गी झेलनी पड़ सकती है. पाकिस्तान का सुप्रीम कोर्ट सरबजीत को फांसी की सजा सुना चुका है और आईएसआई के साथ पाकिस्तानी सेना भी सरबजीत की रिहाई के पक्ष में नहीं है. फिर भी ज़रदारी ने इन बड़ी ताकतों पाकिस्तानी सेना, सुप्रीम कोर्ट और आईएसआई को नजरअंदाज़ कर जोखिम उठाया. जिससके बाद पाक कट्टरपंथी जमात की भौंहे तन गईं थी.

इसे सरबजीत और उसके परिवार की बदकिस्मती ही कहेंगे कि सरबजीत की रिहाई की आधिकारिक घोषणा होने के पहले ही ये खबर लीक हो गई. सरबजीत का केस बेहद चर्चित होने की वजह से ये खबर जंगल में आग की तरह फ़ैल गई. पाकिस्तानी मीडिया में इस पर मिली जुली प्रतिक्रया आई. लेकिन वहां के मीडिया ने सरबजीत की रिहाई पर सवाल भी उठाया. पाकिस्तानी मीडिया ने कट्टरपंथियों की भावनाओं के मुताबिक़ सरबजीत का इकबालिया बयान वाला टेप भी दिखाया. इधर पाकिस्तानी मीडिया की खबरों के आधार पर भारत में भी सरबजीत की रिहाई की खबर ब्रेकिंग न्यूज़ बना दी गई. बधाई और खुशियों के सन्देश बांटे जाने लगे. पंजाब सहित देश के कईं हिस्सों में खुशी की लहर दौड़ गई. दोनों देशों के बीच सम्बन्ध मजबूत होने का पुराना राग अलापा जाने लगा. ये बात भला पाकिस्तान की कट्टरपंथी जमात को कैसे रास आ सकती थी?

सबसे बड़ी बात… ज़रदारी ने ये फैसला उस वक्त लिया था जब वो प्रधानमंत्री यूसुफ़ राजा गिलानी को खो चुके थे. ज़रदारी को बचाने के फेर में गिलानी का पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट ने तख्ता पलट कर दिया था. इसलिए ज़रदारी पहले से ही बेहद दबाव में थे. इस नाजुक वक्त में वो पाकिस्तान की तीन बड़ी ताकतों (सेना, सुप्रीम कोर्ट और आईएसआई) को नाराज नहीं कर सकते थे. अगर पाकिस्तानी सरकार सरबजीत की रिहाई की कोई आधिकारिक घोषणा कर देती तब ज़रदारी के लिए अपने कदम पीछे खींचना मुश्किल था. लेकिन चूंकि ऐसा कुछ भी नहीं हुआ था, इसलिए पाकिस्तान के लिए पलटी मारने के लिए पूरा मैदान खाली था. और मौके की नजाकत को भांपते हुए ज़रदारी ने इसमें ज़रा भी देर नहीं की. निष्कर्ष ये कि अगर सरबजीत की रिहाई की खबर की आधिकारिक पुष्टि होने तक हम संयम बरतते और उसे प्रसारित नहीं करते तो ज़रदारी के लिए अपने कदम पीछे खींचना नामुमकिन हो जाता… और सरबजीत की रिहाई निश्चित मानी जा सकती थी.

लेखक योगेश गुलाटी टीवी पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

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