ब्लैकमनी और बंदी के साए के बीच जनसंदेश टाइम्स की नोएडा में दाखिल होने की योजना

लखनऊ, गोरखपुर, वाराणसी, इलाहाबाद, कानपुर से प्रकाशित होने वाले हिंदी दैनिक जनसंदेश टाइम्स की योजना अब दिल्ली-एनसीआर में भी दुकान खोलने की है. यूपी के स्वास्थ्य घोटाले के पैसे से शुरू किया गया यह अखबार इन दिनों कई जगह स्टाफ को सेलरी न देने के कारण बंदी की चर्चाओं से घिरा हुआ है. वहीं दूसरी तरफ इसके कर्ताधर्ता ब्लैकमनी का इस्तेमाल कर अखबार के लगातार नए एडिशन निकाल रहे हैं. जनसंदेश टाइम्स के चीफ जनरल मैनेजर अनिल पांडे का दावा है कि जनसंदेश टाइम्स को पंद्रह अगस्त से नोएडा से प्रकाशित किया जाएगा और पूरे दिल्ली-एनसीआर में वितरित किया जायेगा.

उधर, एक ताजी चर्चा यह है कि प्रबंधन अखबार के एमडी अनुज पोद्दार को हटाने के मूड में है. पोद्दार की कार्यप्रणाली के चलते अखबार की रही सही साख भी खत्म हो गई है. पहले सुभाष राय ने इस्तीफा दिया और अब ज्ञानेंद्र शर्मा ने अखबार को गुडबाय बोल दिया है. अखबार में कोई कायदे का कंटेंट लीडर न होने के कारण यह अखबार अब लायजनिंग का अड्डा बनता जा रहा है. लगातार बदतमीजी करने वाले एमडी अनुज पोददार की अब छुट्टी तय मानी जा रही है. जनसंदेश अखबार शुरू करने वालों ने अनुज से मुक्ति की प्रक्रिया शुरू कर दी है. वैसे भी पोददार के एमडी बनने पर गोरखपुरिए चकरा गए थे कि तीन वर्ष पूर्व अनुज के पिता दो बैंकों के दिवालिया होने के बाद लखनउ में एक पूर्व मंत्रीं के गो-शाला की देख भाल करके जीवन यापन कर रहे हैं, ऐसे में अचानक अनुज के पास इतना पैसा कहां से आ गया.

अनुज के हटाए जाने की प्रक्रिया की चर्चा जैसे ही आम हुई है तो हर जुबान पर बस एक ही शब्द गूंज रहा है कि यह तो एनएचआरएम घोटाले का धन है. एनएचआरएम घोटाले के मुख्य आरोपी पूर्व मंत्री सितंबर और अक्टूबर माह में दो बार गोरखपुर आए थे तब उनको होटल में रोकने का इंतजाम अनुज ने ही किया था. उसी दौरान जागरण के प्रभारी शैलेन्द्र मणि को पूर्व मंत्री से बरहज के पूर्व विधायक राम प्रसाद चौधरी ने मिलवाया था. उसी समय से श्री मणि को जनसंदेश में जाने की अटकलें शुरू हो गई थीं. गोरखपुर के संपादक शैलेन्द्र मणि को ही पूरे ग्रुप का संपादक बनाने पर भी विचार चल रहा है. इन्ही कारणों से अब तक कर्मचारियों में सैलरी का वितरण भी नहीं हो सका है. पुराने कर्मचारी जिन्होंने कार्य छोड़ दिया या जिन्हें छुड़ा दिया गया, उनको उनका बकाया न देना पड़े, इसके लिए शैलेन्द्र मणि को तरकीब ढूंढने की जिम्मेदारी दी गई है. शैलेन्द्र मणि की कोर कमेटी के प्रमुख साधू से पत्रकार बने उपेन्द्र पांडेय और अपने हवाला के धंधे को बचाने के लिए पत्रकार बने विनोद शाही कल ही से बकाया न देना पड़े का जुगाड़ तलाश रहे हैं.

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *