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बड़े खतरे को भांप कर: कांग्रेस ने मोदी के खिलाफ बनाई ‘आपात’ रणनीति!

नौ में से चार चरणों का मतदान हो गया है। इस दौरान चुनावी रुझान को देखकर कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने अपने लिए बड़ा खतरा भांप लिया है। 10 अप्रैल को तीसरे चरण के चुनाव में 14 राज्यों की 91 सीटों पर मतदान हुआ। इस दौरान जिस तरह से ज्यादातर चुनाव क्षेत्रों में मोदी मुहिम का जादू चलता महसूस किया गया, उससे कांग्रेस नेतृत्व की बेचैनी बढ़ गई है। राजनीतिक खतरा सिर के ऊपर खड़ा देखकर राहुल गांधी ने अपने कोर ग्रुप के सहयोगियों से विमर्श का दौर शुरू किया है।

नौ में से चार चरणों का मतदान हो गया है। इस दौरान चुनावी रुझान को देखकर कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने अपने लिए बड़ा खतरा भांप लिया है। 10 अप्रैल को तीसरे चरण के चुनाव में 14 राज्यों की 91 सीटों पर मतदान हुआ। इस दौरान जिस तरह से ज्यादातर चुनाव क्षेत्रों में मोदी मुहिम का जादू चलता महसूस किया गया, उससे कांग्रेस नेतृत्व की बेचैनी बढ़ गई है। राजनीतिक खतरा सिर के ऊपर खड़ा देखकर राहुल गांधी ने अपने कोर ग्रुप के सहयोगियों से विमर्श का दौर शुरू किया है।

इन निर्णायक क्षणों में यही तय किया गया है कि अब भाजपा और नरेंद्र मोदी के खिलाफ आक्रामक रणनीति अपनाई जाए। चुनावी रैलियों में खुले शब्दों में लोगों को अगाह किया जाए कि नरेंद्र मोदी केंद्र की सत्ता में आ गए, तो देश के सामने क्या-क्या बड़े खतरे खड़े हो जाएंगे? लोगों को यह भी बताया जाए कि मोदी मुहिम में भले खुले तौर पर विकास के एजेंडे की बात की जा रही हो, लेकिन सत्ता इनके हाथ लग गई, तो ये लोग संघ का ‘हिडेन’ एजेंडा लागू करने की कोशिश करेंगे। ऐसे में, देश की सामुदायिक एकता के लिए भी एक बड़ा खतरा पैदा हो जाएगा।

कांग्रेस सूत्रों के अनुसार, तीसरे चरण के मतदान के बाद टीम राहुल ने पिछले दिनों यहां दो दौरों में विमर्श किया है। इस बीच केंद्रीय खुफिया एजेंसियों ने भी सरकार को चुनाव के बारे में गोपनीय ‘इनपुट’ दिया है। जो जानकारियां विभिन्न स्त्रोतों से नेतृत्व को मिली हैं, वे आशंकाओं से भी ज्यादा ‘जोखिम’ भरी हैं। तीसरे चरण में दिल्ली की सभी सातों सीटों और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की 10 सीटों पर चुनाव हो गया है। पिछले चुनाव में राष्ट्रीय राजधानी में कांग्रेस ने सभी सातों सीटें जीत ली थीं। इससे भाजपा को खासा झटका लगा था। पश्चिमी उत्तर प्रदेश की इन 10 सीटों में भाजपा का ‘कमल’ भी ज्यादा नहीं खिल पाया था। लेकिन, इस बार मुजफ्फरनगर दंगों के ‘साइड इफेक्ट’ का भाजपा को साफ-साफ फायदा मिलता दिखाई पड़ा। नेतृत्व ने दंगों के बहाने सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का ‘हिडेन’ कार्ड भी चलाया। रही-सही कसर भाजपा के चर्चित महासचिव अमित शाह ने बिजनौर और शामली की जनसभाओं में पूरी कर दी थी। उन्होंने चुनावी सभाओं में हिंदुत्व कार्ड की राजनीति का खेल खेला। लोगों से कह दिया था कि प्रदेश सरकार ने दंगों में एक समुदाय का पक्ष लिया है। बाकी सब को अपमानित किया गया है। चुनाव एक बड़ा मौका है। लोगों को चाहिए कि अपमान का बदला ले लें। चुनाव में सही जगह बटन दबाकर बदला लेने की जरूरत है।

यह अलग बात है कि इस जहरीले बयान को लेकर अमित शाह की कुछ मुश्किलें बढ़ गई हैं। लेकिन, उनकी वाणी ने, जो काम करना था वो तो कर दिया। माना जा रहा है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बड़े हिस्से में चुनावी सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति का बोलबाला है। इस चक्कर में जहां ‘कमल’ खिल रहा है, वहीं पर सपा-बसपा के साथ कांग्रेस को भारी झटका लग रहा है। कांग्रेस नेतृत्व को उम्मीद रही है कि गाजियाबाद में राज बब्बर, मेरठ में नगमा व सहारनपुर में इमरान मसूद का चुनावी बेड़ा जरूर पार हो जाएगा। रणनीति यही थी कि अल्पसंख्यक वोट गाजियाबाद में राज बब्बर के साथ चले जाएंगे। फिल्म अभिनेत्री नगमा के बारे में अनुमान था कि उनका ग्लैमर काम करेगा, तो मुस्लिम वोट बैंक भी उन्हीं के साथ हो जाएगा। सहारनपुर के उम्मीदवार इमरान मसूद अपने एक विवादित बयान के चलते जेल भी चले गए थे। उन्होंने एक बयान में कहा था कि जरूरत पड़ने पर वे मोदी की बोटी-बोटी कर देंगे।

इस बयान के बाद भी राहुल गांधी ने सहारनपुर में इमरान मसूद के लिए वोट मांगे थे। उम्मीद यही थी कि सेक्यूलर वोट बैंक मसूद के पक्ष में लामबंद हो जाएगा, तो कांग्रेस उम्मीदवार की जीत आसानी से हो जाएगी। लेकिन, मतदान के बाद जो सूचनाएं आई हैं, उससे नेतृत्व सन्न रह गया है। सूत्रों के अनुसार, कांग्रेस को अहसास हो गया है कि इन 10 सीटों में शायद एक भी पार्टी के हाथ न आए। दिल्ली में पार्टी का अनुमान यही था कि कम   से कम 7 में से 3-4 सीटें निकल जाएंगी। लेकिन, मतदान के बाद जो विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है, इसके अनुसार पार्टी को मुश्किल से एक सीट मिलने के आसार बने हैं। एक सीट की भी पक्की उम्मीद नहीं मानी जा रही। इसके बाद यह तय किया गया है कि रणनीति यही रहे कि यदि कांग्रेस के नेतृत्व में सरकार बनने की स्थिति नहीं पहुंचती है, तो कोई बात नहीं। लेकिन, कोशिश की जाए कि ‘मिशन मोदी’ का खेल बिगाड़ दिया जाए। यह तभी हो सकता है कि जबकि भाजपा का आंकड़ा 150 से ज्यादा न पहुंच पाए।

योजना यह भी है कि जरूरत पड़ने पर ‘देवगौड़ा’ जैसा राजनीतिक प्रयोग दोहरा दिया जाए। इससे एक तीर से दो निशाने सध सकते हैं। एक तो यही कि ऐसा होने से ‘मोदी मिशन’ हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा। दूसरा, तीसरे मोर्चे के नेतृत्व में कोई लुंज-पुंज सरकार बनी, तो वह कांग्रेस की कृपा पर ही चलेगी। इसकी अवधि दो-तीन साल से ज्यादा नहीं होगी। लेकिन, कांग्रेसी नेताओं के सामने चुनौती यह है कि वे कैसे पक्के तौर पर भाजपा के चुनावी उभार को थाम लें? ऐसे में, तलाश की जा रही है कि इन निर्णायक क्षणों में कोई ऐसा मुद्दा हाथ लग जाए, जिसको लेकर आक्रामक प्रचार शुरू किया जाए। इस बीच मोदी की पत्नी का मामला मिला है। शुरू में लगा था कि ये चुनाव के लिए ‘गर्म मसाला’ साबित हो सकता है। लेकिन, मुश्किल यह है कि इस मुद्दे को लेकर कांग्रेस के अंदर ही शंकर सिंह वाघेला ने ‘बगावत’ कर दी है।
दरअसल, मोदी ने वड़ोदरा से चुनावी नामांकन किया, तो उन्होंने हलफनामे में अपनी पत्नी का जिक्र कर दिया है। जबकि, इसके पहले वे पत्नी वाला कॉलम खाली छोड़ देते थे। लेकिन, चुनाव आयोग के नए नियमों के तहत कहा गया कि कोई कॉलम खाली नहीं छोड़ा जा सकता।

शायद, इन्हीं कानूनी मजबूरियों के चलते मोदी को अपनी पत्नी जसोदाबेन का नाम दर्ज करना पड़ा। यह अलग बात है कि राजनीतिक हल्कों में सबको पता था कि मोदी की शादी बचपन में हो गई थी। लेकिन, वे संघ के प्रचारक बने, तो उन्होंने घर-बार छोड़ दिया था। सो, पत्नी भी सदा के लिए मायके चली गईं। बाद में, उनकी पत्नी ने शिक्षिका की नौकरी की। वे दो साल पहले रिटायर हो चुकी हैं। शादी के बाद वे मोदी के घर में मुश्किल से महीने-दो महीने रही थीं। कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह ने बड़े जोश से यह सवाल किया था कि मोदी देश को बताएं कि उन्होंनें अभी तक अपनी शादी के बारे में खुलासा क्यों नहीं किया? महिला कांग्रेस की अध्यक्ष शोभा ओझा ने सवाल उठाया कि जो शख्स पतिधर्म नहीं निभा सकता, वह भला सबसे ऊंची कुर्सी पर बैठकर राजधर्म कैसे निभा सकता है?

शुरुआती दौर में लगा था कि कांग्रेस इस मुद्दे पर मोदी को जमकर घेरेगी। लेकिन, यह मुहिम दम तोड़ती हुई दिखाई पड़ने लगी। यूं तो राहुल गांधी ने भी इस मुद्दे पर मोदी पर तीखे कटाक्ष किए थे। लेकिन, कांग्रेस की आक्रामक धार को पार्टी के वरिष्ठ नेता शंकर सिंह वाघेला ने अप्रत्याशित ढंग से कुंद कर दी है। वे गुजरात के ही हैं। एक दौर में वे मोदी के राजनीतिक गुरू भी रह चुके हैं। कई साल पहले वाघेला भाजपा की राजनीति से ही कांग्रेस में आए थे। मोदी की पत्नी के मुद्दे पर वाघेला ने कह दिया कि वे मोदी को बहुत करीब से जानते हैं। इसीलिए इस व्यक्तिगत मुद्दे को ज्यादा तूल देने की जरूरत नहीं है। क्योंकि, मोदी की शादी बचपन में हो गई थी। पति-पत्नी साथ रहे भी नहीं। ऐसे में, इस पर राजनीति करने की जरूरत नहीं है। वाघेला ने ये तेवर दिखाए, तो कांग्रेस की रणनीति ठंडी होने लगी। वैसे भी, मोदी की पत्नी जसोदाबेन पूरी तौर पर ‘मोदीभक्त’ हो गई हैं। मोदी ने भले उन्हें संग न रखा हो, लेकिन वे तो मोदी को प्रधानमंत्री के पद पर देखने के लिए तीर्थ यात्राएं करती घूम रही हैं। यह पक्ष भी कांग्रेस के सपनों पर कुछ पानी डाल रहा है। इस बीच भाजपा नेताओं ने भी अल्टीमेटम दिया कि यदि मोदी की पत्नी का मामला कांग्रेस ने बढ़-चढ़कर उठाया, तो वे लोग भी नेहरू-गांधी परिवार के तमाम अंदरूनी किस्से उछालेंगे। इस पलटवार की रणनीति के बाद मोदी का वैवाहिक प्रकरण ठंडा होने लगा है।

   इस बीच प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार रहे संजय बारू की नई किताब खास चर्चा में है। इस किताब का नाम ‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर- द मेकिंग एंड अनमेकिंग आॅफ मनमोहन सिंह’ है। संजय बारू यूपीए की पहली पारी में 2004 से 2008 तक मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार रहे हैं। उन्होंने अपनी जानकारियों के अनुसार, इस किताब में कई विवादास्पद खुलासे किए हैं। बारू का दावा है कि यूपीए सरकार में मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री के रूप में सोनिया गांधी की कठपुतली की हैसियत से ही काम कर सके हैं। मंत्रीगण प्रधानमंत्री के बजाए, सोनिया गांधी के प्रति वफादारी जताते रहे हैं। सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाले नेशनल एडवाइजरी काउंसिल, सरकार के समांनतर काम करती रही है। इसका भी दबाव प्रधानमंत्री पर रहा है। प्रधानमंत्री, सी. रंगराजन को वित्तमंत्री बनाना चाहते थे। लेकिन, सोनिया गांधी ने मनमोहन सिंह से बिना विमर्श किए प्रणब मुखर्जी का नाम तय कर दिया था। दावा किया गया है कि महत्वपूर्ण नियुक्तियां ‘7, रेसकोर्स रोड’ के बजाए ‘10 जनपथ’ से तय होती रही हैं।

हालांकि, प्रधानमंत्री के मौजूदा मीडिया सलाहकार पंकज पचौरी ने इस किताब में लिखे तथ्यों को गलत   ठहराया है। यह भी कहा गया है कि एक विशिष्ट पद के जरिए हासिल की गई जानकारियों का गलत व्यवसायिक इस्तेमाल किया गया है। यह हर तरह से गलत है। लेकिन, संजय बारू का दावा है कि उन्होंने जो लिखा है, वह सच की कसौटी पर कसकर ही लिखा है। अभी तो उनके पास बहुत ऐसी जानकारियां हैं, जिन्हें इस किताब में समाहित नहीं किया गया है। चुनावी मौके पर इस किताब के खुलासे ने भी कांग्रेस नेतृत्व की खासी किरकिरी करा दी है। गनीमत यही है कि तमाम कयासों के बावजूद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इस मौके पर कांग्रेस आलाकमान का खुलकर साथ जारी रखा है। शनिवार को लखीमपुर खीरी की एक चुनावी सभा में प्रधानमंत्री ने भाजपा के खिलाफ जमकर आक्रामक भाषण किया। उन्होंने मतदाताओं से अपील की है कि भाजपा को सत्ता में आने से रोकना एक राष्ट्रीय कर्तव्य बन गया है। क्योंकि, ये लोग सत्ता में आए, तो देश को ही बांटने का काम करेंगे।

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है।

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