‘भंगू चिटफंड घोटाले’ की रकम ‘टूजी स्पेक्ट्रम’ और ‘कोल ब्लाक घोटाले’ से कम नहीं

चंडीगढ़ : जयपुर स्थित पर्ल्स एग्रोटैक कार्पोरेशन लिमिटड व पर्ल्स गोल्डन फोरेस्ट के प्रमोटर निर्मल सिंह भंगू तथा कंपनी के निदेशक सुखदेव सिंह द्वारा देश के लाखों लोगों के साथ किया गया घपला अब 2 जी स्पेक्ट्रम तथा कोल ब्लॉक घोटाले के समीप पहुंच चुका है. इन कंपनियों की योजनाओं से करीब पांच करोड़ निवेशक ठगे गए हैं.

सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों पर सीबीआई ने भंगू और सुखदेव सिंह के खिलाफ केस दर्ज कर जो छापेमारी और पड़ताल की है, उससे जांच एजेंसी को जब्त किए गए रिकार्डों की छानबीन करते हुए पता चला है कि कृषि भूमि के आवंटन से जुड़ा यह घपला करीब 45,000 करोड़ के समीप पहुंच चुका है. एजेंसी ने यह भी पाया कि कैसे इन दोनों आरोपियों ने देश में कृषि भूमि के विकास की आड़ में देश के करीब पांच करोड़ लोगों से विभिन्न योजनाओं के अंतर्गत करोड़ों रुपये ऐंठे थे.

ज्ञात हो कि निर्मल सिंह भंगू बहुत पहले मनीमाजरा स्थित ‘गोल्डन फॉरेस्ट कम्पनी’ में नौकरी करते थे. धांधली के चलते गोल्डन फॉरेस्ट विजीलेंस के छापे के बाद बंद हो गयी थी. तत्पश्चात एनएस भंगू मनीमाजरा में ही पर्ल्स नाम से एग्रोटेक कम्पनी शुरू की. उसकी मार्फत लोगों से मिले अकूत धन से पूरे देश में लैंड बैंक स्थापित किया. आज पर्ल्स कम्पनी ने देश ही नहीं विदेशों में भी भारी निवेश कर रखा है.

सीबीआई ने कंपनी के निदेशकों तथा अन्यों के दिल्ली, चंडीगढ़, पंजाब और हरियाणा स्थित कार्यालयों में छानबीन की, जिसमें जांच अधिकारियों ने बड़ी मात्रा में लोगों का रिकार्ड और डाटा जब्त किया, जो इन कंपनियों में पूंजी निवेश कर चुके हैं. सीबीआई ने इस बीच भारी पूंजी को खातों में हस्तांतरण करना, अवैध रूप से उसका उपयोग करने से संबंधित दस्तावेज भी अपने कब्जे में ले लिये.
जांच में यह भी सामने आया कि भंगू और सुखदेव सिंह ने मिलकर पिरामिड स्कीम के तहत पूरे देश में इस कंपनी के एजेंटों के जरिये लोगों से पैसे लेकर उन्हें सस्ती भूमि मुहैया कराने का झांसा देते हुए लोगों से पैसे ऐंठे और बदले में उन्हें फर्जी कृषि भूमि से जुड़े अलॉटमेंट लैटर्स थमा दिये.

एजेंसी के मुताबिक एजेंटों को भूमि देखने आने वालों को कंपनी के झांसे में लाने के लिए भारी कमीशन भी दी जाती रही. सीबीआई ने प्राथमिक जांच में पाया कि कंपनियों का कारोबार इस लिए बढ़ रहा था कि वे लोगों को भूमि से जुड़ा फर्जी अलॉटमेंट लैटर बना कर देती थीं, जिसकी आड़ में वह व्यक्ति से मोटी रकम ऐंठ लेती थीं. जांच में यह भी साफ हो गया कि इससे पूर्व पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने भी पर्ल्स एग्रोटेक की योजनाओं को बंद करने के आदेश जारी करते हुए इन योजनाओं के तहत पूंजी निवेश करने वाले लोगों को उनकी राशि सूद समेत लौटाने के लिये कहा था.

मगर संचालकों ने इन्हीं योजनाओं को अन्य कंपनियों के माध्यम से भी जारी रखा. सिक्योरिटी एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया (सेबी) ने पल्स एग्रोटैक के अवैध रूप से व्यवसाय बढ़ाने पर आपत्तियां जताई थीं, जिसमें एक रियल इस्टेट कंपनी की आड़ में चलाई जा रही योजनाओं के अंतर्गत भूमि हड़पने की बात सामने आयी.

पीएसीएल एक ऐसी कंपनी है जिसका कारोबार बताया जाता है हजारों करोड़ में, पीएसीएल एक ऐसी कंपनी है जो बताती है कि उसके पास हजारों एकड़ जमीन है, पीएसीएल एक ऐसी कंपनी है जो बताती है कि उसके पास सैंकड़ों करोड़ रुपए की संपत्ति है… लेकिन मजेदार तथ्य यह है कि इस कंपनी को महज 17.40 करोड़ रुपए का कर्ज एक बैंक से लेना पड़ता है. पीएसीएल कंपनी ने 17.40 करोड़ रुपए का कर्ज 29 मार्च 2010 को पंजाब नेशनल बैंक से लिया था. इस कंपनी ने कथित तौर पर भूखंड बेचने के नाम पर जो 20,035.72 करोड़ रुपए की कमाई आम जनता से की है, वह पूरी तरह से जनता का निवेश भर है. कंपनी के खातों की पड़ताल से जानकारी मिलती है कि खातों में 10,076.87 करोड़ रुपयों की जमीन है लेकिन यह सारी की सारी विवादित बताई गई है.

कंपनी के खाते यह साफ करते हैं कि उसका कारोबार घाटे में चल रहा है. कंपनी का कारोबार चूंकि सही नहीं चल रहा है और उसके पास इतना भी पैसा नहीं है कि वे जमीनों का विकास कर सकें इसके कारण ही उसे बैंक से कर्ज लेने पर मजबूर होना पड़ा है. इस एकमात्र छोटी सी बात से यह साफ हो जाता है कि कंपनी किस कदर झूठ और फरेब का सहारा लेकर तमाम निवेशकों को बेवकूफ बना रही है.

सीबीआई ने पर्ल ग्रुप द्वारा निवेशकों के साथ 45 हजार करोड़ रूपए का घोटाला किए जाने के आरोप में द्ज केस के बाद पर्याप्त सबूत जमा कर लिए हैं. इस कंपनी ने जोत भूमि की बिक्री एवं विकसित करने के नाम पर करीब 5 करोड़ भोले भाले निवेशकों से पैसा ऎंठ लिया. इस मामले में शिकायत मिलने तथा सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद की गई प्रारंभिक जांच और पिछले कई दिनों से मारे गए छापे से खुलासा हुआ कि कंपनी द्वारा करीब 45000 करोड़ के घोटाला किया गया है.

पर्ल ग्रुप लंबे समय से मीडिया, रियल स्टेट कारोबार से जुड़ी रही है. पर्ल रॉयल गार्डन के नाम से इसका ट्यूरिज्म के फील्ड में भी काम है. यह कंपनी पीएसीएल और पीजीएफ के नाम से दो इंनवेस्टमेंट कंपनी चलाती रही है. साल 2002 में सेबी ने पर्ल की इन दोनों कंपनियों के रिकार्ड की जांच की और करोड़ों रूपए फायनेंशियल नियमों का उल्लंघन करते हुए जमा करने का पता लगाया.

जमीन के नाम पर निवेशकों की चेन बनाकर सब्जबाग दिखाए. सेबी की इस रिपोर्ट के खिलाफ पर्ल ग्रुप ने राजस्थान हाईकोर्ट की शररण ली तथा हाईकोर्ट ने सेबी की रिपोर्ट को निरस्त करते हुए पर्ल के पक्ष में फैसला दिया. बाद में सेबी ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में फैसले के खिलाफ अपील. जून 2013 में सुप्रीमकोर्ट ने राजस्थान हाईकोर्ट का फैसला खारिज करते हुए सीबीआई की दिल्ली शाखा को मामला दर्ज कर जांच करने के आदेश दिए.

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